आरक्षण-विरोध की ताज़ा लहर एक ऐसी जगह से उठी है, जहाँ इसकी उम्मीद कम थी – NEET पेपर लीक के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों से। मूल शिकायत बिल्कुल सीधी थी। जिस परीक्षा के लिए युवाओं ने वर्षों तैयारी की, उसकी शुचिता से समझौता हुआ। जिस प्रतिस्पर्धा को राज्य ने स्वयं खड़ा किया था, उसी की निष्पक्षता की रक्षा करने में वह विफल रहा।
लेकिन इस जायज़ शिकायत के साथ एक दूसरा तर्क भी चल पड़ा। कहा जाने लगा कि पेपर लीक से जितने अवसर छीने गए, वे जाति-आधारित आरक्षण के कारण स्थायी रूप से छिनने वाले अवसरों के सामने बहुत कम हैं।
यह तुलना इसलिए बहुत कुछ उजागर करती है क्योंकि विश्लेषण की कसौटी पर दोनों को एक तराजू पर रखना ही कठिन है। पेपर लीक एक सहमत व्यवस्था को आपराधिक तरीके से विकृत करना है; आरक्षण स्वयं उसी व्यवस्था का हिस्सा है – सीमित सार्वजनिक अवसरों के बँटवारे को लेकर लिया गया एक संवैधानिक निर्णय।
यह कहना कि आरक्षण पेपर लीक से अधिक सीटें ‘छीनता’ है, उसी बात को पहले से सच मान लेना है जिसे साबित किया जाना है कि खुली प्रतिस्पर्धा से आवंटित न होने वाली हर सीट किसी का अनुचित नुकसान है। इसलिए असली बहस संख्या की नहीं है। असली सवाल यह है कि अवसरों के बँटवारे की मौजूदा व्यवस्था कितनी वैध है।
कौन विरोध कर रहा है, और किसका?
जंतर-मंतर पर सबसे अधिक दिखाई देने वाले और पेपर लीक से सीधे प्रभावित अभ्यर्थियों में सवर्ण युवाओं की हिस्सेदारी अधिक दिखती है। कोचिंग तक पहुँच और लीक हुआ पेपर खरीद सकने के लिए जरूरी आर्थिक-सामाजिक पूँजी भी पहले से मौजूद विशेषाधिकारों से जुड़ी होती है।
उनकी तात्कालिक शिकायत पूरी तरह जायज़ थी भ्रष्ट हो चुकी परीक्षा, भरोसा खो चुकी परीक्षा एजेंसी और एक ऐसा राज्य जो अपनी सबसे बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा लेकिन कुछ ही हफ्तों में ऑनलाइन दुनिया में इस विरोध के समानांतर एक दूसरा, असंबद्ध अभियान खड़ा हो गया। उसमें कहा जाने लगा कि असली ‘चोरी’ पेपर लीक नहीं, आरक्षण है।
इस तरह “परीक्षा व्यवस्था ने हमारे साथ अन्याय किया” का सवाल धीरे-धीरे “कोटे ने परीक्षा व्यवस्था को भ्रष्ट कर दिया है” में बदल गया। इस बदलाव का एक नतीजा यह भी हुआ कि वास्तविक भ्रष्ट तत्व निगाह से ओझल होने लगे, जबकि इससे कहीं बड़ी मैनेजमेंट-कोटा अर्थव्यवस्था लगभग अछूती रही।
इसका एक हिस्सा देर से सामने आई प्रतिक्रिया भी है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारतीय सार्वजनिक विमर्श पर ऐसी प्रगतिशील सहमति का प्रभाव रहा, जिसमें खुले तौर पर सामाजिक पदानुक्रम की वकालत के लिए बहुत कम जगह थी। 2014 को व्यापक रूप से उस मोड़ की तरह देखा जाता है, जब यह सहमति टूटी और लंबे समय तक खुलकर न कही जा सकने वाली नाराज़गियों को एक नई भाषा मिली।
लेकिन इस दिशा बदलती नाराज़गी के नीचे कुछ और भी है, जिसे ईमानदारी से समझना जरूरी है। जिस युवा को लगता है कि आरक्षण ने उससे उसका हक छीन लिया, वह जरूरी नहीं कि किसी काल्पनिक अन्याय से लड़ रहा हो। उसे सचमुच लग सकता है कि आधुनिक व्यवस्था ने उससे जो कुछ करने को कहा, उसने सब किया पढ़ाई की, मेहनत की, परीक्षा दी, प्रतिस्पर्धा की। लेकिन आरक्षण से जुड़ी उसकी बेचैनी संभवतः आरक्षण से कहीं बड़ी है।
आधुनिकता ने उस चीज को खत्म किया जिसे जाति-व्यवस्था ने लगभग बिना शर्त उपलब्ध कराया था – जन्म से प्राप्त सामाजिक हैसियत। एक समय प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान विरासत में मिलते थे। उन्हें हर पीढ़ी को नए सिरे से अर्जित नहीं करना पड़ता था। आधुनिक नागरिकता और प्रतिस्पर्धी संस्थाओं ने इस सिद्धांत को बदल दिया। अब हैसियत अर्जित करनी पड़ती है और बार-बार सिद्ध भी करनी पड़ती है।
पुरानी व्यवस्था में ऊँचे पायदान पर रहे लोगों के लिए यह अपने आप में एक गहरा नुकसान है। कोई भी व्यक्तिगत उपलब्धि—चाहे उसे दुनिया भर में कितनी ही मान्यता क्यों न मिले – उस चीज को वापस नहीं ला सकती जो चली गई क्योंकि जो समाप्त हुआ, वह केवल ऊँची हैसियत नहीं थी; वह इस बात की गारंटी थी कि ऊँची हैसियत अर्जित नहीं करनी पड़ेगी।
इसीलिए आरक्षण नाराज़गी का एक असाधारण रूप से सुविधाजनक निशाना बन जाता है। वह दिखाई देता है, गिना जा सकता है, उसका नाम लिया जा सकता है। भारतीय समाज में हुए उससे कहीं बड़े परिवर्तन के साथ ऐसा नहीं है।
आरक्षण वंशानुगत प्रभुत्व वापस नहीं ला सकता। आरक्षण समाप्त कर देने से भी वह प्रभुत्व वापस नहीं आएगा। इस तरह एक खास सुधार को उस व्यापक सामाजिक परिवर्तन के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है जिसे उसने पैदा ही नहीं किया और जिसे पलट देने से वह परिवर्तन भी वापस नहीं होगा।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
आरक्षण का सबसे मजबूत बचाव यह नहीं हो सकता कि आज के नागरिक अपने पूर्वजों के हर अन्याय की भरपाई आज के लाभार्थियों को करें। इतिहास के पास हिसाब बंद करने की कोई स्वाभाविक तारीख नहीं होती। यदि गणराज्य हर ऐतिहासिक अन्याय का ऋण विरासत में लेता है, तो यह तय करने का कोई सिद्धांतसम्मत तरीका नहीं बचेगा कि वह कर्ज़ आखिर कब चुक गया।
सिर्फ गरीबी भी पर्याप्त आधार नहीं है। यदि समस्या आर्थिक अभाव है, तो उसका उचित साधन भी आर्थिक कसौटी ही होनी चाहिए। इतना कहना भी पर्याप्त नहीं कि आरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि भेदभाव आज भी मौजूद है। भेदभाव के बहुत से रूपों से कानून के जरिए निपटा जाना चाहिए लेकिन जाति केवल कुछ व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले भेदभाव का नाम नहीं है। वह रिश्तों, संपर्कों, भरोसे और अवसरों तक पहुँच की एक सामाजिक संरचना भी है। उसका असर इस बात से भी तय होता है कि राजनीतिक सत्ता किनके हाथों में है। केवल कानून के सामने समानता घोषित कर देने से यह संरचना अपने आप समाप्त नहीं होती।
आरक्षण के अस्तित्व का एक और अधिक बुनियादी कारण है। भारतीय गणराज्य किसी ऐसे समाज से पैदा नहीं हुआ था जो पहले ही एक आधुनिक राष्ट्र बन चुका हो। भारत का प्राथमिक सामाजिक संगठन आधुनिक राष्ट्र-राज्य जैसा नहीं था। लोग गाँवों, जातियों, क्षेत्रों और धर्मों के जरिए अपना सामाजिक जीवन जीते थे।
आधुनिक भू-क्षेत्रीय राष्ट्र एक राजनीतिक निर्माण था। उपनिवेश-विरोधी आंदोलन के सामने ब्रिटिश शासन को हराने से भी कठिन एक चुनौती थी – यह स्थापित करना कि इतने विविध और विभाजित समाज में रहने वाले लोग मिलकर एक राजनीतिक समुदाय हैं और संप्रभुता के अधिकारी हैं।
एक बार यह दावा कर दिया गया, तो अगला सवाल अनिवार्य था – जिन लोगों से भारतीय बनने को कहा जा रहा है, उस राष्ट्र के पास उन्हें देने के लिए क्या है? इस संक्रमण में सवर्ण जातियाँ भारी संरचनात्मक बढ़त के साथ दाखिल हुईं। शिक्षा और औपनिवेशिक संस्थाओं तक उनकी पहुँच अनुपात से कहीं अधिक थी। इसलिए यह खतरा वास्तविक था कि स्वतंत्रता का अर्थ राज्य का ब्रिटिश हाथों से निकलकर उन्हीं भारतीय समूहों के हाथों में चले जाना होगा जो पहले से उसे संभालने की सबसे बेहतर स्थिति में थे।
अधीन और वंचित समुदायों को केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं चाहिए थी। उन्हें यह भरोसा भी चाहिए था कि स्वतंत्रता विदेशी शासक वर्ग की जगह लगभग अपरिवर्तित घरेलू पदानुक्रम को स्थापित करने का दूसरा नाम नहीं होगी।
यहीं पूना पैक्ट का महत्व चुनावी व्यवस्था के संकीर्ण प्रश्न से कहीं आगे जाता है।
आंबेडकर ने पृथक निर्वाचक मंडलों की माँग की थी, ताकि दलित वर्गों के पास अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज हो। गांधी के पृथक निर्वाचक मंडलों के विरोध में किए गए अनशन ने अंततः साझा निर्वाचक मंडल के भीतर समझौते की राह बनाई।
इसे बराबरी की ताकत रखने वाले दो पक्षों के बीच हुआ सौदा कहना कठिन है। आंबेडकर वास्तविक रूप से कमजोर स्थिति से बातचीत कर रहे थे। बाद में कांग्रेस से उनका अलगाव भी उस व्यक्ति की कहानी कहता है जो उस समझौते को अपर्याप्त मानता रहा, भले ही उसने उसका सम्मान किया।
फिर भी यही असमानता उस प्रसंग को महत्वपूर्ण बनाती है। जाति-हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से ने उन शर्तों को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वे उसे न्यायसंगत लगी थीं। उसके पीछे गांधी के अनशन से निर्मित नैतिक दबाव भी था, जिसे उन्होंने हिंदू धर्म के सबसे बड़े पाप के प्रायश्चित के रूप में प्रस्तुत किया। 1948 में उनकी हत्या ने उस नैतिक ऋण को स्वतंत्र भारत के राजनीतिक समझौते में और गहराई से दर्ज कर दिया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि मूल समझौता स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं बनाया गया था। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षित सीटों की अवधि दस वर्ष रखी गई थी। उसके बाद हर विस्तार एक नया राजनीतिक निर्णय रहा है।
इसलिए उसकी निरंतरता का स्रोत मूल दावे की किसी असीमित प्रकृति में नहीं, बल्कि सात दशकों से अधिक समय में बार-बार किए गए राजनीतिक नवीनीकरण में है।
संक्षेप में, समझौता यह नहीं था—“तुमने हम पर अत्याचार किया, इसलिए अब तुम्हें हमें मुआवजा देना है।”
वह इसके अधिक करीब था—“आप हमें एक साझा राजनीतिक राष्ट्र का हिस्सा बनने के लिए कह रहे हैं; बदले में इस राष्ट्र के भीतर हमारी हैसियत पूरी तरह उसी सामाजिक पदानुक्रम के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती, जिसे पीछे छोड़ने को हमसे कहा जा रहा है।”
इस अर्थ में आरक्षण न दान है, न दंड। वह राजनीतिक समावेशन की उस संरचना का हिस्सा है जिसके सहारे भारतीय राष्ट्र का निर्माण हुआ। यही कारण है कि केवल ‘मेरिट’ का तर्क इसका पर्याप्त प्रतिवाद नहीं बनता।
किसी सवर्ण विद्यार्थी में वास्तविक प्रतिभा और योग्यता हो सकती है। लेकिन व्यक्तिगत योग्यता अपने आप उस राज्य की संस्थाओं पर उसका विशिष्ट नैतिक अधिकार स्थापित नहीं करती, जिसकी वैधता की बुनियाद ही उन समुदायों को साथ लेकर चलने पर रखी गई थी जो आधुनिक व्यवस्था में समान शर्तों पर दाखिल नहीं हुए थे।
OBC आरक्षण का इतिहास इससे जुड़ा हुआ जरूर है, लेकिन अलग भी है। उसे उसी संस्थापक समझौते में समेट देना उचित नहीं होगा। वह बाद में आया। मंडल आयोग की रिपोर्ट लगभग एक दशक तक ठंडे बस्ते में रही। 1990 में उसे कार्यपालिका के आदेश से लागू किया गया और 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने पचास प्रतिशत की सीमा और ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखने की शर्त के साथ उसे संवैधानिक मान्यता दी।
उससे पहले कोई अनशन नहीं हुआ। उसके विरोधियों को मनाने के लिए किसी नेता ने अपना जीवन दाँव पर नहीं लगाया।
वह किसी नैतिक समझौते से अधिक लोकतांत्रिक संख्याबल के इस्तेमाल का परिणाम था। इसलिए SC/ST आरक्षण को जिस ऐतिहासिक नैतिक संरचना का सहारा मिला, OBC आरक्षण को वह विरासत नहीं मिली।
इसका अर्थ यह नहीं कि पिछड़ी जातियों का सामाजिक नुकसान कम वास्तविक था। फर्क इतना है कि उस व्यवस्था को अंतःकरण की भाषा से अधिक संख्या की राजनीति के जरिए स्थापित किया गया। संख्या अनुपालन पैदा कर सकती है, लेकिन हारने वाले पक्ष में वैसी नैतिक बाध्यता जरूरी नहीं पैदा करती।
हिंदुत्व और उसके अंतर्विरोध
हिंदुत्व एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन के रूप में इसलिए काम कर पाया है क्योंकि उसके अलग-अलग घटकों के लिए उसके अलग-अलग अर्थ रहे हैं और वे अर्थ हमेशा एक-दूसरे से सीधे नहीं टकराते। आरक्षण वह बिंदु है जहाँ यह अनुकूलता टूटने लगती है। सवर्णों के एक हिस्से के लिए हिंदुत्व ऐसी शास्त्रसम्मत सामाजिक व्यवस्था की वापसी का संकेत हो सकता है जिसमें सामाजिक वरीयता उनके पास हो।
कई पिछड़े और दलित समुदायों के लिए, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हिंदू समाज के भीतर पूर्ण बराबरी का दर्जा नहीं मिला, हिंदुत्व ने एक अलग संभावना पेश की है हिंदू पहचान के राष्ट्रीयकरण के जरिए समावेशन की।
यहाँ सदस्यता की परिभाषा हिंदू समाज के भीतर की जातिगत दूरी के बजाय बाहर मौजूद किसी दूसरे धार्मिक समुदाय के बरक्स होने लगती है।
मुसलमानों के लिए यही आंदोलन राजनीतिक अधिकारों और प्रभाव को सीमित करने वाली परियोजना के रूप में दिखाई दे सकता है।
ये अलग-अलग अर्थ तब तक साथ रह सकते हैं, जब तक ‘हिंदू एकता’ को किसी दुर्लभ और गिनी जा सकने वाली वस्तु के बँटवारे की कसौटी पर नहीं कसना पड़ता। आरक्षण ठीक ऐसी ही कसौटी है।
जैसे ही सवाल यह बनता है कि सीट किसे मिलेगी, हिंदू राजनीतिक एकता का सामना हिंदू समाज के भीतर मौजूद उस पदानुक्रम से हो जाता है, जिसे एकता की भाषा आम तौर पर अनकहा छोड़ देती है।
आरक्षण खत्म करने का सवर्ण अभियान हिंदुत्व की उस पिछड़ी-दलित व्याख्या के लिए सीधा खतरा बन जाता है, जिसमें उसे अधीनता के बजाय समावेशन का रास्ता माना गया था। यही वह असली परीक्षा है जिसमें तय होगा कि यह राजनीतिक गठबंधन उस मुद्दे का सामना कर पाता है या नहीं, जिसे प्रतीकात्मक एकता की भाषा हल नहीं कर सकती।
सामाजिक समझौता आज कहाँ खड़ा है
आरक्षण-विरोध का एक सवाल अपनी जगह समझने योग्य है—मैं उस कर्ज़ का भुगतान क्यों करूँ, जिस पर मैंने कभी दस्तख़त ही नहीं किए?
लेकिन संभवतः यह कभी किसी व्यक्ति का निजी कर्ज़ था ही नहीं। गणराज्य अलग-अलग व्यक्तियों के बीच हुए निजी अनुबंधों का जोड़ नहीं होता। वह एक राजनीतिक समझौता है जो किसी भी एक नागरिक से पहले अस्तित्व में आता है।
हममें से किसी ने संविधान पर दस्तख़त नहीं किए। फिर भी हम उसके अधिकारों और दायित्वों दोनों के उत्तराधिकारी हैं।
भारतीय राज्य इस बुनियादी मान्यता पर बना था कि गहरी असमानताओं में बँटे समुदाय मिलकर एक राजनीतिक समुदाय बन सकते हैं। इसके लिए केवल यह घोषणा पर्याप्त नहीं थी कि कानून की नजर में सब बराबर हैं।
ऐसी संस्थागत व्यवस्थाएँ भी चाहिए थीं जो उस बराबरी को राजनीतिक रूप से विश्वसनीय बना सकें। आरक्षण उन्हीं व्यवस्थाओं में से एक था।
इसका अर्थ यह नहीं कि आरक्षण हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय है। कोई व्यवस्था केवल पुरानी हो जाने से हमेशा के लिए वैध नहीं हो जाती। आरक्षण की समीक्षा हो सकती है, उसका पुनर्गठन किया जा सकता है, उसका दायरा बदला या सीमित किया जा सकता है।
उसके अलग-अलग रूपों का मूल्यांकन भी उनके अलग-अलग इतिहास के आधार पर होना चाहिए, न कि उन्हें एक ही अविभाजित शिकायत में समेटकर लेकिन वैध पुनर्विचार और आक्रोश एक ही चीज नहीं हैं। किसी असंबद्ध परीक्षा घोटाले पर सवार मीडिया अभियान किसी सामाजिक समझौते की पुनर्वार्ता नहीं है।
यदि इस समझौते को बदलना है, तो असली सवाल यह होगा कि उसकी शर्तों को समाप्त घोषित करने का अधिकार किसे है?
और ऐसी कौन-सी प्रक्रिया होगी जिसमें उनसे सबसे अधिक प्रभावित लोगों की बराबर की आवाज हो—ऐसी प्रक्रिया जो ऑनलाइन आक्रोश या न्यायिक जोड़-तोड़ के बजाय मूल राजनीतिक संवाद और समझौते के अधिक करीब हो?
आज न गांधी का नैतिक बल उपलब्ध है, न आंबेडकर का। और उनकी जगह लेने वाला कोई सर्वमान्य मध्यस्थ भी अब तक सामने नहीं आया है।
पेपर लीक नियमों की विफलता था। आरक्षण स्वयं एक नियम है। पहला अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई और अभियोजन की माँग करता है। दूसरा राजनीतिक बहस की और वह बहस इस पूर्वधारणा से शुरू नहीं हो सकती कि प्रतियोगिता में जीतने वाला व्यक्ति उस संस्था पर स्वतः अधिकार प्राप्त कर लेता है जिसके लिए प्रतियोगिता हो रही है।
उससे पहले पूछना होगा कि वह संस्था बनी किसलिए है- और वह कौन-सा राजनीतिक समझौता था जिसने जन्म की इतनी विशाल असमानताओं के बावजूद हम सबके लिए एक ही राज्य को ‘अपना’ कहना संभव बनाया।
1950 का सबसे गहरा अधूरा सवाल यह नहीं है कि एक जाति पर दूसरी जाति का कोई ऐतिहासिक कर्ज़ बाकी है या नहीं।
असली सवाल यह है कि क्या भारत ने अब तक वह कहीं कठिन यात्रा पूरी कर ली है—विरासत में मिले समुदायों के समाज से बराबर नागरिकों के राजनीतिक राष्ट्र तक की यात्रा ।











