संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का निधन, CAA को लेकर सरकार को आगाह किया था

नई दिल्ली। जाने माने संविधान विशेषज्ञ और पद्म भूषण से अलंकृत Dr. Subhash Kashyap का चार जून को निधन हो गया। पहले आम चुनाव के कुछ समय बाद 1953 से देश की संसद से जुड़ने वाले सुभाष कश्यम भारतीय संविधान के इनसाइक्लोपिडिया की तरह थे। उन्होंने भारतीय संविधान और उसके विविध आयामों और भारतीय राजनीति पर तकरीबन सौ किताबें लिखीं।

डॉ. सुभाष कश्यप का जन्म 10 मई, 1929 को हुआ था। 1984 से 1990 के दौरान वे सातवीं, आठवीं, और नौवीं लोकसभा के दौरान लोकसभा सचिवालय में महासचिव के रूप में काम किया था। उन्होंने 1983 तक जिनेवा स्थित अंतर्राष्ट्रीय संसदीय प्रलेखन केंद्र (आईपीयू) का नेतृत्व भी किया। वे किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन का नेतृत्व करने वाले पहले भारतीय थे।

डॉ. कश्यप नई दिल्ली स्थित नीति अनुसंधान केंद्र (सीपीआर) में मानद शोध प्रोफेसर थे। उन्होंने संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग के सदस्य और उसकी मसौदा एवं संपादकीय समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई। डॉ. कश्यप ने भारतीय राष्ट्रीय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।

हाल के दशक में उनकी दो भूमिकाओं को रेखांकित किया जा सकता है। एक तो यह कि वह एक राष्ट्र, एक चुनाव के न केवल समर्थक थे, बल्कि उन्हें मोदी सरकार ने इससे संबंधित उच्च स्तरीय समिति में प्रमुख सदस्य के रूप में भी शामिल किया था। इस समिति के बनने से काफी पहले ही सुभाष कश्यप ने एक देश एक चुनाव को असाधारण कदम बताया था।

दूसरा यह कि डॉ. कश्यप ने नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया था और कहा था कि हर देश को यह तय करने का अधिकार है कि नागरिकता के लिए कौन पात्र है और कौन नहीं है।

उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि नागरिकता संशोधन कानून उन लोगों को नागरिकता प्रदान करेगा, जो धार्मिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं और पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हैं। यह विवादास्पद हो गया, क्योंकि इसमें कुछ समुदायों को निर्दिष्ट किया गया है।

डॉ.कश्यप ने 2017 में नागरिकता संशोधन विधेयक के निर्माण के दौरान उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को चेतावनी दी थी कि कानून में विशिष्ट धर्मों (जैसे हिंदू, सिख, पारसी आदि) के नाम शामिल करने से बचना चाहिए और इसके बजाय केवल ‘उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों’ शब्दावली का उपयोग करना चाहिए। हालांकि सरकार ने उनकी राय नहीं मानी।

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