तीन तिलंगे : Three Musketeers

Three Musketeers
अभिषेक श्रीवास्तव, पत्रकार और लेखक

अभिषेक श्रीवास्तव

आज नियुक्त काक्रोच वाले तीन प्रवक्ताओं का मामला बड़ा दिलचस्प है भाई। एक लड़का सौरव दास है जो कुछ साल तक आरटीआई करता रहा है और उसके जवाब के आधार पर यहां-वहां कहानियां लिखता रहा। उसकी अपनी वेबसाइट सहित हर जगह उसे investigative journalist बताया जा रहा है, लेकिन पत्रकारिता में कायदे का उसका खाली एक काम यदि है तो कारवां पत्रिका में जस्टिस चंद्रचूड़ पर लिखी कवर स्टोरी।

अब इसके साथ संकट ये है कि इसे ‘2024 के चुनाव को रूपांतरित करने वाले 30 युवा भारतीयों’ का एक पुरस्कार यंग इंडिया फाउंडेशन नाम की एक संस्था से मिला था। संकट इसलिए क्योंकि इस संस्था का जो प्रायोजक है, वही गुजरात में नरेंद्र मोदी द्वारा उनके कार्यकाल में शुरू किये कुख्यात वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन का मेजबान भी है। नाम है मारवाड़ी यूनिवर्सिटी, जो खुद को गुजरात की सबसे बड़ी निजी यूनिवर्सिटी बताती है। खैर, संयोग का क्या, लेकिन एक और दिक्कत यह चर्चा है कि इस लड़के को पिछले दिनों बोस्टन, अमेरिका की एक लेखा फर्म से कुछ लाख रुपये “नागरिक स्वतंत्रता” और “जन स्वास्थ्य” के मद में मिले हैं। बीते पाँच-छह साल में उभरे नए पत्रकारों को विदेश से अंडबंड फेलोशिप या धर्मार्थ दान के मद में खतरनाक एजेंडों के लिए पैसे मिले हैं ये सच है। हो सकता है सौरव को लेकर ये केवल चर्चा हो, लेकिन सेहतमंद नहीं है, हालांकि कुछ लोग स्क्रीनशॉट भी लगाए पड़े हैं। बोस्टन की फर्म का नाम है वाल्टर शुफैन। अब अकाउंट संभालने वाली कंपनी किसके सौजन्य से किसी को पैसा दे रही है, कौन जाने!

बहरहाल, दूसरी नियुक्ति ज्यादा खतरनाक है। नाम है आशुतोष रंका। ये लड़का दुनिया की बिग 4 में शामिल लेखा कंपनी मैकिंसी में काम कर चुका है। मैकिंसी के बारे में आप बहुत कुछ गूगल कर के जान जाएंगे। यह कंपनी बकायदे सरकारें पलटने का काम करती है ठेके पर। मैकिंसी एंड कंपनी को अक्सर सरकारों के साथ घनिष्ठ संबंधों, हितों के टकराव और निरंकुश सत्ताओं के लिए काम करने के कारण राजनीतिक विवादों का सामना करना पड़ा है। दक्षिण अफ्रीका में सत्ता पर कब्ज़ा, कनाडा में गैर-प्रतिस्पर्धी संघीय अनुबंध, फ्रांस में सलाहकारों पर निर्भरता और चीनी सेना से कथित संबंधों के लिए फर्म की जांच की जा चुकी है।

तीसरा प्रवक्ता विजेता दहिया नाम का युवा है। इसके बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता। कहते हैं कि ये ध्रुव राठी की स्क्रिप्ट लिखता है। क्या जाने! हां, एक बागी हरयानवी को मैं इंस्टा पर फॉलो करता हूं, शायद उसका दोस्त है। एक बार देखा था दोनों नाच रहे थे धंदा न्योलीवाला के एक लोकप्रिय गाने पर: you have to raise your voice bro, there is no alternative choice bro! अब ये गाना तो मुझे भी पसंद है, लेकिन पता नहीं था कि इसकी कहानी इतनी लंबी हो जाएगी। बेहतर जानकारी ही दे पाएगा इनके बारे में।

क्या जाने 6 जून को दिल्ली में क्या होगा, जब काक्रोच प्रमुख आवेगा, लेकिन दूध के जलों को छाछ फूंक फूंक के ही पीना चाहिए। हर पीढ़ी का खून उबाल मारता है, लेकिन हर पीढ़ी एक जैसी ही गलती भी करती है। दिलचस्प ये है कि पिछली पीढ़ी वाले अपने समय से सबक नहीं लेते और ट्रैप में फंस जाते हैं। जैसे आज आजमगढ़ के किसान पुलिसिया उत्पीड़न के खिलाफ काक्रोच का पोस्टर लेकर सड़क पर उतर गए भाई राजीव यादव के नेतृत्व में। जाने या अनजाने, नई और वाइरल परिघटनाओं से थोड़ा बचना जरूरी है जमीनी आंदोलनकारियों के लिए। 2011 का अन्ना आंदोलन अभी इतनी भी पुरानी बात नहीं हुई। याद रखना चाहिए और अपने आसपास के जेन जी वालों को कहानियाँ सुनानी चाहिए कि भाई, ऐसे ही लोकप्रियतावादी उफान के चक्कर में देश दक्खिन लग गया था। अब तक लगा हुआ है। नहीं मानो तो थोड़ा नेपाल टहल आओ। साल भर पहले की ही कहानी है। एकदम ताजा ताजा!

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