हाल में हुए विधानसभा चुनावों में ‘बाहरी’ और ‘अवैध घुसपैठिये’ का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान का मुख्य हथियार था। भाषण दर भाषण नौकरियां छीनने का डर, संस्कृति पर हमले और संसाधनों के खत्म होने का भय दिखाया गया। यह सब दूसरे मुद्दों पर हावी गए। सियासी मंच पर सिर्फ इसी बात का शोऱ था।
और अब चुनाव खत्म हो गए हैं और यह दिखावा करना बेकार है कि भारत के भीतर रहने वाले वैध लोग यानी उसके नागरिक, आराम की जिंदगी जी रहे हैं। पश्चिम एशिया में जंग जारी है। कच्चे तेल के वैश्विक दाम बेलगाम हो रहे हैं। सरकार और तेल कंपनियों ने कच्चे तेल के कम दाम के कारण जो मुनाफा कमाया था उसके कारण अब पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर थे। लेकिन बीते हफ्ते भर में पेट्रोल डीजल के दाम दो बार बढ़ाए जा चुके हैं। पहले पेट्रोल और डीजल के दामों में प्रति लीटर तीन रूपये की बढ़ोतरी की गई थी। इसके बाद मंगलवार को इसमें 90 पैसे की और बढ़ोतरी कर दी गई। इसी तरह सीएनजी के दाम दो रुपये बढ़ गए हैं। तेल कंपनियों ने इसी महीने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) के दामों में बढोतरी कर दी थी।
परिवारों पर पड़ रहा यह आर्थिक बोझ भारी पड़ रह है और रसोई तक पहुंच गया है। 14 मई से दूध के दाम भी दो रुपये लीटर बढ़ चुके हैं। लागत और माल ढुलाई बढ़ने से रोजमर्रा के सामानों के दाम बढ़ रहे हैं। रेस्तरां में खाना महंगा हो गया है। तनाव सिर्फ बाहरी नहीं है, यह घर के भीतर भी पसर चुका है।
दूसरी ओर चुनावों के खत्म होते ही फिजूलखर्ची पर रोक और सादगी की बात होने लगी है। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से कहा है कि वे पेट्रोलियम उत्पाद की खपत कम करें, सोना न खरीदें। वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग जैसे कोविड काल की आदतें डालें। और तो और खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती करें। उन्होंने पश्चिम एशिया के संकट को ‘इस दशक के सबसे बड़े संकटों में से एक’ करार दिया।
यह चुनौतियां अचानक नहीं आई हैं। दरअसल चुनावों के मौसम में हमने उन्हें सुना नहीं। हालांकि मार्च, 2026 में तेल सप्लाई में बाधा आने के समय से ही पूरे एशिया में आम नागरिक आने वाले संकट को महसूस करने लगे थे। जापान में अप्रैल की शुरुआत में ही लोगों से हीटिंग, कूलिंग और निजी कार के इस्तेमाल में कटौती के लिए कह दिया गया। दक्षिण कोरिया में अप्रैल मध्य में सार्वजनिक वाहनों के लिए ऑड-ईवन योजना लागू कर दी गई, बसों और सबवे में रियायतें दी गईं, ताकि लोग उनका इस्तेमाल करें, परिवारों से कहा गया कि वे पीक ऑवर में बिजली की खपत में कटौती करें। इन उपायों पर पालन भी शुरू हो गया। ठीक इसी समय चीन ने ईंधन निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर, खुदरा कीमतों पर कैप लगाकर, गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को हतोत्साहित करके और कोयला उत्पादन बढ़ाते हुए नागरिकों को बिजली की कटौती सहन करने का संदेश दिया। मई की शुरुआत तक आसियान देश भी इसमें शामिल हो गए।
इन उपायों के साथ ही एशिया की कई सरकारों ने कोविड दौर के वर्क फ्रॉम होम को अपनाया है और कर्मचारियों से कहा है कि वे घर पर रहे हैं और दफ्तर आने जाने में खर्च हो रहा ईंधन बचाएं।
पांच राज्यों के विधासभा चुनाव खत्म होने के साथ ही ईंधन की बढ़ती कीमतें, आयात का बढ़ता बोझ, कमजोर होता रुपया और घटते विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर चिंताएं सतह पर आ गई हैं। हालांकि, सरकार की अपील आम लोगों तक सीमित रही है। आम लोगों से सामूहिक जिम्मेदारी उठाने और छोटे-छोटे त्याग करने की अपील की गई है, बजाय कॉर्पोरेट टैक्स पर छूट पर फिर से विचार करने या अमीर लोगों पर कर लगाने जैसे उपायों के।
हालांकि अति-अमीर लोग कम सोना खरीद सकते हैं और विदेशी छुट्टियों या डेस्टिनेशन वेडिंग पर कम खर्च कर सकते हैं (जो कुल मिलाकर सिर्फ 16 से 18 अरब डॉलर है), लेकिन हकीकत तो यही है कि कीमतों में बढ़ोतरी का असली बोझ गरीबों पर ही पड़ेगा। आखिरकार, देश में कितने लोग वास्तव में घर से काम करने का खर्च उठा सकते हैं? गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी (CFA), ने हाल ही में अपने एक ब्लॉग में यह सवाल उठाया है।
व्यापक आर्थिक हालात गंभीर हैं। विदेशी मुद्रा भंडार पश्चिम एशिया में तनाव फैलने औऱ कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच जाने के साथ ही पिछले दो महीने के दौरान 38 अरब डॉलर कम हो गया। एशिया में भारतीय रुपये का प्रदर्शन सबसे खराब है। 10 मई, को तेलंगाना में प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश से ‘कमर कसने’ की अपील की। उन्होंने कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने और वर्क फ्रॉम होम की अपील की ताकि ईंधन की मांग कम हो। उन्होंने लोगों से सालभर तक सोना न खरीदने, विदेश यात्रा न करने की भी अपील की ताकि विदेश मुद्रा भंडार को बचाया जा सके। खाने के तेल में कटौती करने के साथ ही मोदी ने किसानों से रासायनिक खादों में कटौती की अपील भी की है, ताकि इनका 50 फीसदी आयात घटाया जा सके और सब्सिडी का बोझ कम किया जा सके। अंत में उन्होंने स्वेदशी उत्पाद को अपनाने की बात करते हुए इन सात उपायों को पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध से उत्पन्न वैश्विक अशांति के खिलाफ सामूहिक ‘आर्थिक आत्मरक्षा’ बताया।
बड़ा सवाल फिर भी कायम हैः इन उपायों का बोझ कौन उठाएगा? किसानों से रासायनिक उर्वरकों की खपत आधा करने की मोदी की अपील से मुझे पिछले महीने राजस्थान के भरतपुर में किसानों से हुई बातचीत याद आ गई। एक गेहूँ किसान ने मुझे बताया कि वह उर्वरक की कमी से डरा हुआ है और सरसों और आने वाले खरीफ मौसम के लिए “स्टॉक” कर रहा है। निक्की एशिया की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत, वियतनाम और थाईलैंड के चावल किसान रोपाई के मौसम की शुरुआत के साथ उर्वरक झटके की पूरी मार झेलने के लिए पहले से तैयार हो रहे हैं। दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक होने के बावजूद (लगभग 15 करोड़ टन सालाना), भारत इस बार कुछ ज्यादा प्रभावित होगा। देश अपनी उर्वरक की लगभग 40 फीसदी मांग खाड़ी देशों से आयात करता है।
हालांकि सरकार किसानों को इनपुट सब्सिडी देती है, लेकिन यदि होर्मुज में लंबे समय तक बाधा रही तो इस सब्सिडी का वित्तीय दबाव सरकार की क्षमता की परीक्षा ले सकता है।
आम भारतीयों के घर में न तो डेस्टिनेशन वेडिंग होती है और न ही उनके पास फिलहाल सोना खरीदने के लिए अतिरिक्त पैसे होते हैं। वे बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच बस गुजर बसर करने में लगे हुए हैं।
एक ऐसे देश में, जहां 80 फीसदी से अधिक कामगार अनौपचारिक क्षेत्र में हैं और लाखों लोग सड़क पर या निर्माण, गिग वर्क जैसी बाहरी गतिविधियों पर निर्भर हैं, उनमें से कितनों के पास घर से काम करने का विकल्प है?
एक ऐसे देश में जहाँ 10 फीसदी से भी कम परिवारों के पास कार है, कारपूलिंग की अपील का वास्तव में क्या मतलब है? वैश्विक ऊर्जा संकट के समय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग अच्छा विचार है, लेकिन क्या हम आखिरी मील की कनेक्टिविटी, बस स्टॉप या मेट्रो स्टेशन तक जाने वाले रास्ते की भी बात करेंगे — खासकर उन शहरों में जहां महिलाओं के लिए शाम को देर से बाहर निकलना सुरक्षित नहीं होता?
मैं दिल्ली की एक मध्य वर्गीय महिला हूं और पूरी तरह से अपनी कार छोड़ने को तैयार हूं। लेकिन ऐसे फुटपाथ और सड़कें कहां हैं, जो महिलाओं और आम पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित हैं? जो लोग किफायत की बात कर रहे हैं, वे इस मुद्दे पर क्यों चुप हैं? सड़कों को सुरक्षित और फुटपाथों को चलने लायक बनाने के लिए जरूरी सार्वजनिक नीतियां और संसाधन कहां हैं?
आम भारतीयों के पास कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सरकार के निर्देश के बिना या उसके साथ — अपनी कमर कसने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन निश्चित रूप से, नए भारत में हमें यह कड़ा सवाल पूछने की जरूरत है, कि आखिर कौन बलिदान देगा और कौन अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगा। चुनाव खत्म हो चुके हैं। अब फिर से ‘बाहरी’ नहीं, बल्कि ‘भीतरी’— यानी औसत भारतीय नागरिक की स्थिति — पर ध्यान देने का समय है।
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