इस नफरत का अंत होना चाहिए

Nashik TCS controversy

नासिक के टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज से जुड़े विवाद में नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए बनी संस्था एपीसीआर की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला। टीम ने पाया कि यौन उत्पीड़न और काम के माहौल से जुड़ी शिकायतें गंभीर हैं, जिनकी जांच होनी चाहिए। लेकिन संगठित या व्यवस्थित धर्मांतरण के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले।

मीडिया ने इसे पहले ही कॉर्पोरेट जिहाद या लव जिहाद का ठप्पा लगा दिया था, खासकर कर्मचारी निदा खान के नाम को उछालकर। एपीसीआर रिपोर्ट में कहा गया कि एफआईआर में कुछ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बातें हैं, लेकिन व्यापक साजिश का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

यह घटना अकेली नहीं है। देश की मीडिया और सोशल मीडिया पर एक खास समुदाय, विशेष रूप से मुस्लिमों के खिलाफ बिना पूर्ण जांच-पड़ताल और पुख्ता सबूत के मुहिम चलाने का एक पैटर्न दिखाई देता है। तबलीगी जमात को 2020 में कोरोना फैलाने का कोरोना जिहाद बताकर बदनाम किया गया। बाद में कोर्ट ने कई मामलों में आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 70 लोगों के खिलाफ चार्जशीट्स खारिज करते हुए इसे कानूनी दुरुपयोग बताया। फिर भी सामूहिक चेतना पर उसका असर बना रहा।

यूपी में 2015 में दादरी में भीड़ ने अखलाक की हत्या भी धर्म विशेष के खिलाफ नफरत को दिखाता है। बीते एक दशक से अधिक समय में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में मारे गए ज्यादातर मुस्लिम थे। 

लखनऊ के लूलू मॉल के उद्घाटन से पहले कॉर्पोरेट जिहाद और लव जिहाद का शोर मचाया गया। मॉल के मालिक मुस्लिम हैं, इसलिए हिंदू कर्मचारियों को लव जिहाद का शिकार बनाए जाने का दावा किया गया। बाद में मॉल प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों में हिंदू बहुमत में हैं।

हाल में लेंसकार्ट के शोरूम में ड्रेस कोड विवाद हुआ, जहां बिंदी-तिलक पर पाबंदी और हिजाब की अनुमति का आरोप लगा। कंपनी ने बाद में नीति संशोधित कर सभी धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में क्रिसमस पर एक मॉल में झांकी लगाई गई थी। गैर-ईसाई धार्मिक कट्टर संगठन के कुछ लोगों ने इसे पसंद नहीं किया और तोड़फोड़ कर दी। 

इन घटनाओं का दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है। बिहार के मधुबनी में रोशन खातून हत्या मामले में आरोपी को जमानत पर रिहा होने पर फूल-माला पहनाकर स्वागत किया गया। ऐसी घटनाएं हिंसा को सामान्य बनाने का संकेत देती हैं।

इन घटनाओं का समयकाल गौर करने योग्य है। गौ-रक्षा, लव जिहाद, लैंड जिहाद जैसे नैरेटिव तेज हुए। एक तरफ अल्पसंख्यकों के खिलाफ मॉब लिंचिंग और हमलों के आंकड़े बढ़े, दूसरी तरफ शिक्षा संस्थानों, मानवाधिकार संगठनों और सौहार्द की बात करने वालों पर हमले हुए।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, घृणा भाषण और हमलों पर चिंता जताई है। हालांकि भारत सरकार इन रिपोर्ट्स को पक्षपाती बताती रही है।

यह सामूहिक चेतना में गिरावट को साफ दिखाती है। सोशल मीडिया पर वायरल नैरेटिव्स तथ्यों से पहले फैलते हैं। जहां गलती साबित नहीं होती, वहां भी धर्म विशेष के खिलाफ कार्रवाई को जरूरी मान लिया जाता है। अखलाक मामले में हत्या के बाद कुछ लोगों ने इसे न्याय बताया। रोशन खातून मामले में आरोपी का स्वागत इसी सोच को दर्शाता है।

यह प्रवृत्ति इंसानियत की गिरावट दर्शाती है। हिंसक सोच आसान हो गई है क्योंकि भावनात्मक उत्तेजना तर्क से आगे निकल जाती है। मीडिया ट्रायल में सबूतों की जगह नैरेटिव हावी है। इससे समाज दो खेमों में बंटता है, एक तरफ नफरत की मुहिम, दूसरी तरफ पीड़ित समुदाय में असुरक्षा।

सामाजिक रूप से यह खतरनाक है क्योंकि यह सामूहिक संवेदना को कमजोर करता है। आर्थिक रूप से भी चिंताजनक कॉर्पोरेट नौकरियों का भी माहौल प्रभावित होता है। निवेशक और प्रतिभाएं स्थिरता चाहती हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स धार्मिक आधार पर नफरत को भारत के लोकतंत्र के लिए जोखिम बताती हैं।

देश के हर घर, हर परिवार, हर विचारधारा और हर तबके के लिए यह चिंता का विषय है। बार-बार लिखने, बोलने और चर्चा के बावजूद सुधार न होना और गंभीर है। हमने एक बड़े जनसमूह को ऐसे मनोविज्ञान से जोड़ दिया है जहां विवेक की आंखों पर नफरत की पट्टी बंधी है। यह स्थित समाज को सिर्फ प्रतिगामी ताकतों का बंधक ही बना कर रख छोड़ेगी। इस विवेक शून्यता पर प्रहार जरूरी है। जरूरी है कि राज कानून का हो,नफरत का नहीं !

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