विश्व बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार बना बैठा है भारत

World Bank debt to India

भारत विश्व बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार है। नंबर वन। विश्व बैंक से भारत ने 2023 के अंत तक करीब 39.3 अरब डॉलर (रुपयों में करीब 3 लाख 28 हजार करोड़) का कर्ज इंटरनेशनल बैंक फॉर रीकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD) और इंटरनेशनल डेवलपमेंट असोसिएशन (IDA) की मदद से ले रखा है। हम कर्ज लेने के उस्ताद हैं।

दूसरे नंबर वाला इंडोनेशिया है। मजेदार बात यह है कि यहां नंबर वन और टू के बीच गहरी खाई है। भारत 39. 3 अरब डॉलर, इंडोनेशिया हमसे बहुत पीछे 22. 2 अरब डॉलर। यह कर्जा 15 से 40 साल की मियाद का है। तीसरे पर अगर पाकिस्तान नहीं होता, तो उसकी नाक कट जाती। उस पर भी करीब 20 अरब डॉलर का कर्ज है।

एक और खास बात यह है हम सबसे बड़े कर्जदार के रूप में 1970 से ही टॉप पर हैं। बड़ा देश, बड़ी इकॉनमी, बड़ा कर्जा। पर रुकिए, यह तो विदेशी कर्ज है। देश में भी सरकार ने इससे लगभग दस गुना कर्जा (166.57 लाख करोड़ रूपये) आरबीआई, एसबीआई, एलआईसी, प्रोविडेंट फंड, पीपीएफ, एनआईसी, सरकारी बॉन्ड्स, ट्रेजरी बिल्स और बाजार से उधार ले रखा है।

विश्व बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार बनने की प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है, जो मुख्य रूप से देश की तेज आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढांचे के विकास, गरीबी उन्मूलन और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की आवश्यकता से जुड़ी है। विश्व बैंक के लोन मुख्य रूप से विकास परियोजनाओं (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा और ऊर्जा) के लिए दिए जाते हैं, जो भारत की प्राथमिकताओं से मेल खाते हैं।

भारत ने 1949 में स्वतंत्रता के ठीक दो साल बाद विश्व बैंक से अपना पहला लोन (रेलवे विकास के लिए) लिया। 1991 के आर्थिक संकट के बाद, संरचनात्मक सुधारों और उदारीकरण के दौरान विश्व बैंक के लोन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे अर्थव्यवस्था स्थिर हुई और निर्यात-आधारित वृद्धि को बढ़ावा मिला। उसके बाद, भारत ने बुनियादी ढांचे (जैसे सड़कें, बिजली), ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए लगातार उधार लिया।

भारत की तेज जीडीपी वृद्धि (2025 में 6.5% अनुमानित) के कारण उधार सीमा बढ़ गई है, जिससे अधिक फंडिंग उपलब्ध हुई। विश्व बैंक के लोन कम ब्याज दरों वाले और लंबी अवधि (15-40 वर्ष) के होते हैं, जो विकासशील देशों के लिए आकर्षक हैं। 2025 तक, भारत ने 39.3 अरब डॉलर (लगभग ₹3.3 लाख करोड़) के आउटस्टैंडिंग लोन जमा कर लिए हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर (60% से अधिक) और सामाजिक कार्यक्रमों पर खर्च हो रहे हैं।

यह स्थिति भारत की मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को दर्शाती है, जहां बड़े निवेश की जरूरत बढ़ी है।भारत विश्व बैंक का नंबर वन कर्जदार कब से है? भारत 1970 के दशक से विश्व बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार बना हुआ है, यानी 50 वर्षों से अधिक समय से। यह स्थिति दशकों पुराने वितरणों (disbursements) के कारण बनी हुई है, क्योंकि लोन की परिपक्वता अवधि लंबी होती है। हाल के वर्षों में भी, भारत ने पिछले 10 वर्षों में से छह में सबसे अधिक उधार लिया है।

भारत का कुल कर्ज दो भागों में बंटा है : एक्सटर्नल डेट (विदेशी) और डोमेस्टिक डेट (देशी)। 2025 के मध्य तक (जून 2025), कुल सरकारी कर्ज लगभग ₹181.68 लाख करोड़ ( 2.09 ट्रिलियन डॉलर) है।

कुल एक्सटर्नल डेट: 747.2 अरब डॉलर (जून 2025), जीडीपी का 18.9%। लॉन्ग-टर्म डेट: 611.7 अरब डॉलर (82%)। शॉर्ट-टर्म: 18%।

मुद्रा ब्रेकडाउन: अमेरिकी डॉलर (54%), भारतीय रुपया (31%), जापानी येन (6%)।

डोमेस्टिक डेट (देशी कर्ज): मार्च 2025 तक ₹166.57 लाख करोड़ ( 1.92 ट्रिलियन डॉलर), जो जीडीपी का ~58% है। यह मुख्य रूप से सरकारी बॉन्ड्स, ट्रेजरी बिल्स और घरेलू बैंकों से आता है। कुल कर्ज का 90% से अधिक डोमेस्टिक है, जो विदेशी मुद्रा जोखिम कम करता है।

क्या इतना कर्ज लेना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सही है? कम डेट-टू-जीडीपी रेशियो: 82% (उभरती अर्थव्यवस्थाओं में औसत से कम; जापान 250% से अधिक)। विश्व बैंक और एनसीएईआर के अनुसार, उच्च वृद्धि दर (6.5%) और अधिकांश कर्ज रुपये में होने से स्थिरता बनी हुई है।

भारत के वित्त मंत्रालय के अनुसार यह कर्ज इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे ग्रीन एनर्जी) और विकास पर खर्च हो रहा है, जो भविष्य की वृद्धि बढ़ाएगा। एफआर15 के तहत, सरकार 2031 तक डेट-जीडीपी को 50% करने का लक्ष्य रख रही है। आर बी आई का कहना है कि शॉर्ट-टर्म डेट केवल 18%, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (652 बिलियन डॉलर) मजबूत। डेट सर्विस केवल 6.6% निर्यात आय का।

भारत का कर्ज प्रबंधन मुख्य रूप से वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। कर्ज चुकाने की प्रक्रिया को डेट सर्विसिंग कहा जाता है, जिसमें मूलधन (प्रिंसिपल) की वापसी और ब्याज भुगतान शामिल हैं। कर्ज वापसी की प्रक्रिया कर्ज के प्रकार पर निर्भर करती है: देशी कर्ज मुख्य रूप से नए उधार से रोलओवर होता है, जबकि विदेशी कर्ज विदेशी मुद्रा भंडार से सीधे चुकाया जाता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार नए उधार से रोलओवर कराती रहती है। पुराने बॉन्ड्स या ट्रेज़री बिल्स की मैच्योरिटी पर, सरकार नए बॉन्ड्स या ट्रेज़री बिल्स जारी करके पुराने कर्ज का भुगतान करती है।

उदाहरण: 2025-26 बजट में ₹11.37 लाख करोड़ की ट्रेजरी बिल्स की चुकौती का प्रावधान है, जो मुख्य रूप से नए जारी बॉन्ड्स से चुकाया जाएगा। सरकार महंगे यानि ज्यादा ब्याजवाले कर्ज को काम ब्याजवाले कर्ज से रिप्लेस कराती रहती है। टैक्स राजस्व, डिविडेंड्स (RBI से), और अन्य गैर-ऋण राजस्व से ब्याज और मूलधन चुकाया जाता है। इस सब का असर विकास पर पड़ता है क्योंकि विकास का बजट काम करना पड़ता है।

यह भी देखें: भारत के पाले में अभी नहीं आया नेपाल

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे Thelens.in के संपादकीय नजरिए से मेल खाते हों।

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