बिहार और पश्चिम बंगाल में भाजपा की राजनीतिक बढ़त के बाद सीमांचल (Seemanchal) एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। सीमा सुरक्षा, जनसांख्यिकी और प्रशासनिक पुनर्गठन को लेकर चल रही बहसों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या पूर्वी भारत की राजनीति में कोई बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव आकार ले रहा है। हालांकि सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने को लेकर अब तक कोई आधिकारिक प्रस्ताव, नीति दस्तावेज या संसदीय पहल सार्वजनिक नहीं हुई है।
ओडिशा में सत्ता हासिल करने और बिहार तथा पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के बाद भाजपा के पूर्वी भारत में विस्तार को नई राजनीतिक दृष्टि से देखा जा रहा है। इसी क्रम में सीमांचल को लेकर राजनीतिक अटकलों और सुरक्षा विमर्श ने भी गति पकड़ी है।
सीमांचल बिहार का पूर्वोत्तर क्षेत्र है, जिसमें किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया जिले शामिल हैं। नेपाल, बांग्लादेश और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट होने के कारण यह इलाका सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। सीमा पार आवाजाही, तस्करी, नकली दस्तावेजों और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से इस क्षेत्र को संवेदनशील मानती रही हैं। हालांकि सीमांचल को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले कई दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और इस विषय पर आधिकारिक आंकड़े सीमित हैं।

सीमांचल में अमित शाह की सक्रियता
2024 के लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीमांचल क्षेत्र से की थी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने सीमांचल में कई बैठकें की थी। इन बैठकों में सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी।
कुछ मीडिया रिपोर्टों और विपक्षी नेताओं ने दावा किया था कि सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर अलग प्रशासनिक इकाई बनाने पर चर्चा हुई थी।
राजद नेता रणविजय साहू ने आरोप लगाया था: ‘सीमांचल और बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की तैयारी चल रही है। अमित शाह इसी पर चर्चा करने बिहार आ रहे हैं।’
वहीं मार्च 2026 में लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) को बिहार और आर. एन. रवि को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया था। तब सीमांचल के कद्दावर नेता और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने बयान दिया था कि “सीमांचल और मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज दिनाजपुर आदि जिलों को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाने का खेल बीजेपी करने वाली है। नीतीश जी को हटाने और लेफ्टिनेंट जनरल राज्यपाल लाने के पीछे का यह खेल है।”
वहीं सीमांचल के रहने वाले विकास आदित्य समाजसेवी के साथ राजनीति से भी जुड़े हुए है। वह बताते हैं कि,”बॉर्डर इलाका होने के कारण स्थानीय कुछ लोग जानबूझकर ऐसी अफवाह फैलाते हैं। इसके पीछे का कोई आधार नहीं है। हालांकि इसका फायदा भाजपा को जरूर मिल जाता है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने की वजह से यहां स्थानीय पार्टी का दबदबा ज्यादा रहता है। ऐसे में अगर इन जिलों को अलग किया गया तो राज्यों का चुनावी समीकरण बदल सकता है।”
सोशल मीडिया पर इसको लेकर लगातार पोस्ट किया गया। इसके बाद सरकार की आधिकारिक एजेंसी प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी की सरकार की तरफ से ऐसा कोई प्रस्ताव न तो तैयार किया गया है और न ही विचाराधीन है. यानी बिहार और पश्चिम बंगाल के जिलों को मिलाकर कोई नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।
स्थानीय पत्रकार धीरज कुमार के मुताबिक इन दिनों सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार लगातार सक्रिय दिख रही है। आने वाले समय में सरकार जरूर कुछ पर एक्शन लेगी। हालांकि सरकार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। वहीं किसी आधिकारिक दस्तावेज में इस तरह की किसी योजना का जिक्र सामने नहीं आया है। भाजपा ने भी इस आरोप को राजनीतिक बयानबाजी बताया था।
गृह मंत्री अमित शाह ने सीमांचल दौरे के दौरान कहा था कि ‘बिहार को घुसपैठियों से मुक्त कराने का अभियान सिर्फ मतदाता सूची तक सीमित नहीं रहेगा। भारत की भूमि से एक-एक घुसपैठिए को बाहर किया जाएगा।’ उन्होंने यह भी कहा था कि सीमा सुरक्षा और मतदाता सूची को लेकर केंद्र सरकार गंभीर है।
क्यों महत्वपूर्ण है सीमांचल?
सीमांचल केवल सामरिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बिहार का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया सहित सीमांचल की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं।
इसी वजह से भाजपा, जदयू, राजद, कांग्रेस और AIMIM जैसे दल इस क्षेत्र में लगातार राजनीतिक सक्रियता बनाए रखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीमांचल का चुनावी प्रभाव उत्तर-पूर्व बिहार की कई सीटों के परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
सीमा सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा
सीमांचल और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठ, तस्करी और अवैध आवाजाही का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। भाजपा और उससे जुड़े संगठन इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बताते रहे हैं, जबकि विपक्ष कई बार इस मुद्दे के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाता रहा है।
सुपौल निवासी भोला कुमार, जो किशनगंज में काम करते हैं, कहते हैं: ‘सीमावर्ती इलाकों में बाहरी लोगों की मौजूदगी को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार चर्चा होती रहती है।’
वहीं पूर्णिया कोर्ट के अधिवक्ता बृजेश झा कहते हैं: ‘शेरशाहबादी समुदाय सीमांचल और बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय से निवास करता रहा है और इसकी विशिष्ट भाषाई-सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है।’
2023 की जातीय गणना के अनुसार शेरशाहबादी समुदाय की आबादी लगभग 13 लाख से अधिक बताई गई है, जो बिहार की कुल आबादी का करीब 0.99 प्रतिशत है।
आरएसएस से जुड़े रजनीश तिवारी कहते हैं: ‘भाजपा को इस मुद्दे पर केवल राजनीति नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।’
हाल के वर्षों में सीमा सुरक्षा बल (BSF) और अन्य एजेंसियों ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर तस्करी और अवैध आवाजाही के खिलाफ कई अभियान चलाए हैं। हालांकि उपलब्ध अधिकांश आंकड़े व्यापक पूर्वी सीमा क्षेत्र से जुड़े हैं, सीधे सीमांचल क्षेत्र से नहीं।
The Economic Times की एक रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2025 में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में BSF ने 95 किलो गांजा और 510 बोतल प्रतिबंधित कफ सिरप जब्त किया था।
वहीं Times of India की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल से जुलाई 2025 के बीच मेघालय सीमा पर BSF ने 116 बांग्लादेशी नागरिकों और 34 भारतीय नागरिकों को हिरासत में लिया था। इस दौरान छह करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के मवेशी और 1.3 करोड़ रुपये से अधिक का अन्य प्रतिबंधित सामान भी जब्त किया गया।
Times of India की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार असम सरकार ने 2024 के बाद से 450 से अधिक कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का दावा किया था। हालांकि मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि ‘घुसपैठ’ और ‘जनसांख्यिकी बदलाव’ जैसे मुद्दों का इस्तेमाल कई बार राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए भी किया जाता है। विपक्षी दलों ने अमित शाह के बयान को भी राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा था।
बंगाल सीमा पर बाड़बंदी तेज
पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी की प्रक्रिया तेज होने की खबरें भी सामने आई हैं।
Times of India की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने BSF को सीमा बाड़बंदी के लिए 75 एकड़ जमीन हस्तांतरित की है, जिससे 27 किलोमीटर लंबे हिस्से में फेंसिंग का काम आगे बढ़ेगा।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर 24 परगना जिले में लगभग 150 किलोमीटर लंबे सीमा क्षेत्र में अब भी 51 किलोमीटर हिस्सा बिना बाड़ के है, जहां BSF निगरानी बढ़ा रही है।

जनसंख्या वृद्धि और प्रजनन दर पर बहस
सीमांचल को लेकर जनसंख्या वृद्धि और प्रजनन दर का मुद्दा भी लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। भाजपा के कई नेताओं ने सीमांचल में जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिंता जताई है, जबकि स्थानीय लोग और कुछ शोधकर्ता इन दावों को अतिरंजित बताते हैं।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बिहार के मधेपुरा जिले की जनसंख्या वृद्धि दर किशनगंज और अररिया की तुलना में अधिक थी।
2001 और 2011 की जनगणना के तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार: किशनगंज की प्रजनन दर 2001 में 5.3 और 2011 में 5.2 रही। अररिया की प्रजनन दर 2001 और 2011 दोनों में 4.9 रही। यदि राष्ट्रीय स्तर पर तुलना करें तो मेघालय के वेस्ट खासी हिल्स जिले में 2001 और 2011 में प्रजनन दर क्रमशः 5.8 और 5.5 दर्ज की गई थी। वहीं जैंतिया हिल्स में यह दर 2001 में 5.4 और 2011 में 5.6 रही।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) 2019-21 के अनुसार: किशनगंज की कुल प्रजनन दर 3.50,अररिया की कुल प्रजनन दर 3.91 और खगड़िया की कुल प्रजनन दर 4.00 दर्ज की गई।
NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार सीतामढ़ी, पूर्णिया और सुपौल जैसे जिलों की प्रजनन दर भी किशनगंज के बराबर या उससे अधिक रही। जनसांख्यिकी विशेषज्ञ आशीष गुप्ता ने सोशल Media पर लिखा था कि दुनिया के कई देशों की प्रजनन दर बिहार के कई जिलों से अधिक रही है और सीमांचल को लेकर किए जाने वाले कई राजनीतिक दावे उपलब्ध आंकड़ों से मेल नहीं खाते।
स्थानीय लोगों की राय
किशनगंज निवासी शाहीन कहते हैं:‘सीमांचल को अक्सर सांप्रदायिक नजरिए से प्रस्तुत किया जाता है, जबकि यहां की वास्तविक समस्याएं गरीबी, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी हैं।’
वहीं किशनगंज निवासी सिकंदर पटेल कहते हैं:‘यहां का बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ से प्रभावित होता है। विकास और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे राजनीतिक बहस में पीछे छूट जाते हैं।’
दूसरी ओर कुछ स्थानीय लोग सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ को गंभीर मुद्दा मानते हैं और सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हैं।
क्या नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बन सकता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नया राज्य बनाने या राज्यों की सीमाओं में बदलाव करने का अधिकार है। हालांकि इसके लिए संसद की मंजूरी और संबंधित राज्यों से राय लेना आवश्यक होता है।
पटना हाई कोर्ट के वकील अंशुमन बताते हैं कि,”सांसद का बहुमत और राष्ट्रपति का हस्तक्षेप दोनों जरूरी है। इसके अलावा यदि प्रस्ताव किसी राज्य की सीमा या क्षेत्र को प्रभावित करता है तो वह भी समर्थन या विरोध दर्ज करा सकती है, लेकिन राज्य की राय बाध्यकारी नहीं होती। ऐसे में अभी की परिस्थिति में सीमांचल को अलग राज्य बनाना बहुत आसान है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर नई प्रशासनिक इकाई बनाना भाषाई, प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से आसान प्रक्रिया नहीं होगी। फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक प्रस्ताव सार्वजनिक नहीं है और यह मुद्दा मुख्य रूप से राजनीतिक चर्चा और अटकलों तक सीमित माना जा रहा है।
सीमांचल का मुद्दा केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, जनसांख्यिकी, विकास और सामाजिक संतुलन जैसे कई जटिल प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। जहां एक ओर भाजपा और उसके समर्थक सीमा सुरक्षा तथा अवैध घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बताते हैं, वहीं विपक्ष और स्थानीय संगठन इस विषय के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते हैं।
ऐसे में सीमांचल को लेकर किसी भी दावे या प्रस्ताव का मूल्यांकन राजनीतिक आरोपों के बजाय आधिकारिक दस्तावेजों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर किया जाना अधिक उचित होगा।











