अयोध्या। अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में एक बड़ी खबर आ रही है। खबर यह है कि मंदिर ट्रस्ट से डॉ.अनिल मिश्रा और चंपत राय के बाद अब आरएसएस के बड़े पदाधिकारी भैयाजी जोशी ने भी राम मंदिर के पालक पद से इस्तीफा दे दिया है।दूसरी तरफ राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह नई एसआईटी के सामने सनसनीखेज खुलासा किया है कि पूर्व में जिस राम मंदिर के निर्माण की लागत 22 सौ करोड़ बताई गई उस मंदिर के निर्माण में दरअसल खर्च सिर्फ 8 सौ करोड़ रुपये हुए हैं।
इन दोनों ही घटनाओं से हड़कंप मचा हुआ है।कहा तो यह भी जा रहा है कि आने वाले दिनों में दान चोरी से जुड़े कुछ ऐसे खुलासे हो सकते हैं जिनके तार ऊपर तक जुड़ सकते हैं।
इस ताज़ा घटनाक्रम से आरएसएस से लेकर भाजपा सरकार तक में खलबली मची है। चिंता इस बात को लेकर अधिक है कि अगली तलवार किस पर गिरेगी, अभी और कितनों की गर्दन नपेगी। लेकिन ऊपर से सब सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही है।
भारत में हिंदू आस्था की सबसे बड़ी धार्मिक परियोजना अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद का नाम सीधे तौर पर सामने नहीं आया है, लेकिन जितने भी बड़े चेहरों ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से इस्तीफा दिया, वे संघ परिवार से ही जुड़े हुए थे।
अयोध्या मंदिर से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस्तीफों की कड़ी में ताजा नाम भैयाजी जोशी का है। भैयाजी जोशी राम मंदिर के पालक पद से हटा दिए गए हैं। यह खबर एक अखबार में छपने के बाद सार्वजनिक हुई। हालांकि संघ से जुड़े आरएसएस के लोग कह रहे हैं कि भैयाजी जोशी ने स्वास्थ्य कारण से खुद को इस दायित्व से अलग कर लिया है। इस मामले की यह रिपोर्ट लिखे जाने तक संघ की तरफ से भी कोई बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है। इससे पहले ट्रस्ट डॉ. अनिल मिश्रा और महासचिव चंपत राय इस्तीफा दे चुके हैं।
वहीं कर्नाटक में आरएसएस के बड़े चेहरे गोपाल राव राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में घोषित तौर पर कुछ भी नहीं थे, लेकिन ऐसा बताया जाता है कि तूती उन्हीं की बोलती थी।
गोपाल राव बीते कई हफ्तों से अयोध्या में सार्वजनिक तौर पर दिखे नहीं हैं। बताया जा रहा है कि वे कर्नाटक लौट चुके हैं या उनसे अयोध्या से दूरी बनाकर रहने को कह दिया गया।
चंपत राय एसआईटी जांच के बीच ही अयोध्या में रहकर चातुर्मास कर रहे हैं। साथ ही साथ निजी तौर पर स्थानीय संतों से भी मेल-मुलाकात कर रहे हैं। वहीं डॉ. अनिल मिश्रा की सार्वजनिक उपस्थिति भी न के बराबर है।
इस बीच यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी ऐसा कोई ताजा बयान नहीं दिया है, जो जांच प्रक्रिया से जुड़ा हो। उनका पुराना बयान, जिसमें उन्होंने 15 दिन के अंदर दूध का दूध पानी का पानी होने की बात कही थी, वही है।
मामले की जांच के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने जिस एसआईटी का गठन किया था, उसने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यूपी सरकार को दूसरी एसआईटी का गठन करना पड़ा, जिसने जांच शुरू कर दी है।
ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी है कि पहले वाली एसआईटी की जांच रिपोर्ट का क्या होगा? और क्या वह रिपोर्ट दूध का दूध पानी का पानी कर चुकी है, जिसकी जानकारी सिर्फ योगी आदित्यनाथ को ही है।
महिपाल सिंह ने नई एसआईटी को क्या बताया?
महिपाल सिंह राम मंदिर ट्रस्ट में 2021 से 2022 तक अकाउंट्स (हिसाब-किताब) के प्रभारी रहे थे। वे इस मामले के मुख्य व्हिसलब्लोअर माने जाते हैं। उन्होंने पहले सार्वजनिक इंटरव्यू में और हाल ही में (जुलाई 2026 के अंत में) एसआईटी को ईमेल के जरिए अपना बयान भेजा।
एक यूट्यूब चैनल टॉप सीक्रेट की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें कहा गया है कि चढ़ावा गिनती के दौरान नकदी की चोरी नियमित रूप से होती थी। चंपत राय के पूर्व ड्राइवर और गिनती स्टाफ टिन्नू यादव (रामाशंकर यादव) नकदी के बंडलों में से हर 11वें, 12वें और 13वें बंडल निकाल लेते थे।
यह भी खुलासा हुआ कि नकदी के अलावा अन्य चढ़ावा सामान भी गिनती कक्ष से निकालकर फोटो खिंचवाकर चंपत राय को भेजे जाते थे। उन्होंने 2021 में ही चंपत राय और ट्रस्ट सदस्य गोपाल राव को इसकी शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई की बजाय उन्हें हटा दिया गया।
महिपाल सिंह के जिस बयान से खलबली मची वह था मंदिर निर्माण में हुए खर्च की हकीकत। एस आई टी को दिए गए इस बयान के मुताबिक मंदिर निर्माण पर अनुमानित 800 करोड़ रुपये के बजाय करीब 2,200 करोड़ रुपये खर्च हुए।इस बात की चर्चाएं तो पहले ही थीं पर महिपाल सिंह के बयान ने इन चर्चाओं पर एक तरह से मोहर लगा दी।इसी तरह बताते हैं कि कुछ विवादित संपत्तियां ट्रस्ट के नाम पर खरीदी गईं, जिन पर अभी कब्जा नहीं हुआ। सोना-चांदी के गहनों और बर्तनों का कोई सही रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था। सीसीटीवी फुटेज भी मिटाए गए।
भैयाजी जोशी का हटना कैसे देखा जा रहा है?
राम मंदिर के पालक पद से पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी का हटना महत्वपूर्ण क्यों है? इस सवाल को उन चर्चाओं से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसमें कहा गया था कि चंपत राय को जब चढ़ावा चोरी के बारे में पता चला तो वे एफआईआर दर्ज कराने जा रहे थे। लेकिन वे ऐसा कर पाते उससे पहले ही किसी ने उनसे फोन पर बात की और वे वापस लौट आए। अयोध्या के जानकार सूत्रों के हवाले और इस मामले पर करीब से नजर रखने वालों का कहना है कि फोन की दूसरी तरफ भैयाजी जोशी ही थे, जिन्होंने चंपत राय से फोन पर बात की थी। और बात कराने वाले अनिल मिश्रा थे।
भैयाजी जोशी का हटाया जाना या खुद अलग हो जाने को ट्रस्ट में चल रहे बड़े प्रशासनिक बदलावों की कड़ी माना जा रहा है। संघ और मंदिर प्रबंधन नए पालक के लिए वरिष्ठ नामों पर विचार कर रहा है। कुछ रिपोर्टों में इसे विवाद को शांत करने और व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी बनाने का प्रयास बताया गया है। आधिकारिक बयान अभी जारी नहीं हुआ है, इसलिए अंतिम पुष्टि ट्रस्ट/संगठन की घोषणा पर निर्भर है। राजनीतिक-संगठनात्मक हलकों में इसे चढ़ावा मामले से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि सीधे उनके खिलाफ कोई आरोप सार्वजनिक नहीं हैं।
वैसे अंदरखाने मंदिर को पूरी तरह से अयोध्या के हवाले कर देने पर भी चर्चा चल रही है। लेकिन आरएसएस के अंदर इस मामले पर आसानी से एक राय बन पाएगी, ऐसा कहना मुश्किल है।
क्या चंपत राय की अयोध्या से विदाई तय है?
चंपत राय विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) से जुड़े थे और ट्रस्ट के महासचिव थे। जून-जुलाई 2026 में एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रुख के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफा दिया, जिसे ट्रस्ट ने स्वीकार कर लिया। उनके स्थान पर कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव बनाया गया।
इस्तीफे के अगले दिन (7 जुलाई) चंपत राय ने एक पत्र जारी किया, जिसमें उन्होंने चढ़ावा गिनती के अनुबंध से जुड़ी जानकारियां साझा कीं और कहा कि वे फिलहाल शांत हैं, लेकिन एसआईटी जांच पूरी होने के बाद हर सवाल का जवाब देंगे।
चंपत राय के इस आक्रामक रुख से संघ के शीर्ष नेतृत्व में चिंता बढ़ी। आशंका थी कि मामला और न बढ़े। उन्हें शांत करने के लिए बैकचैनल बातचीत हुई और अयोध्या के संतों के जरिए समर्थन जुटाकर स्थिति संभाली गई। संघ-बीजेपी हलकों में इसे विवाद को नियंत्रित रखने और ट्रस्ट की साख बचाने का प्रयास माना जा रहा है। अयोध्या के कई संतों ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी है।
अयोध्या में एक खबर यह भी सबकी ज़ुबाँ पर है कि बीते दिनों चंपत राय की अयोध्या के चार बीजेपी विधायकों, कुछ व्यापारियों और संतों से मुलाकात हुई। इस मुलाकात के बारे में सार्वजनिक तौर पर बस इतना ही कहा जा रहा है कि यह सामान्य मुलाकात थी।चंपत राय के करीबियों के हवाले से एक खबर मीडिया में चली कि वे अयोध्या से दान–चोरी का कलंक लेकर नहीं जाना चाहते। ताजा घटनाक्रम को उनकी इसी कथित चाहत से जोड़ कर देखा जा रहा है।
चंपत राय के पैर अयोध्या में किस हद तक जमे रहेंगे, यह तो उनका चातुर्मास पूरा हो जाने के बाद ही साफ होगा, लेकिन यह जरूर है कि चंपत राय अपनी तरफ से कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं।
विधानसभा से लेकर संसद तक विपक्ष हमलावर
राम मंदिर चढ़ावा चोरी को विपक्ष किसी भी कीमत पर छोड़ने के मूड में नहीं है। जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान ऐसा लगा था कि यह मामला दब जाएगा। लेकिन हाल ही में निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और अयोध्या से सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने संसद भवन के बाहर चंदा चोरी को ले कर जिस तरह से प्रदर्शन किया, उसने बीजेपी को फिर से इस मुददे पर वापस ला दिया है। बीजेपी इस मामले पर चुप रहकर सेफ साइड तलाश रही थी। लेकिन विपक्ष के आक्रामक रवैये के कारण चुप रखना फिलहाल संभव नहीं है।
यूपी विधानसभा का मानसून सत्र भी चार दिन का रखा गया है। 3 अगस्त को सत्र के पहले दिन सपा विधायकों ने विधानसभा के बाहर जमकर प्रदर्शन किया। सपा मुखिया अखिलेश यादव तो पहले ही बयान दे चुके हैं कि चढ़ावा चोरी पर विधानसभा में ज्यादा बात न हो इसलिए योगी सरकार ने सत्र को छोटा रखवाया है।








