क्या पश्चिम बंगाल में ‘हिंदी पट्टी वाली राजनीति’ से मजबूत हो रही भाजपा?

February 2, 2026 2:18 PM
West Bengal election 2026

बिहार के चुनावी नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘गंगा जी, यहां बिहार से बहते हुए ही बंगाल तक पहुंचती हैं। बिहार ने बंगाल में बीजेपी की विजय का रास्ता भी बना दिया है। मैं बंगाल के भाइयों-बहनों को भी आश्वस्त करता हूँ कि अब बीजेपी आपके साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से भी जंगलराज को उखाड़ फेंकेगी।‘

मोदी की यह टिप्पणी बंगाल में 2026 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर थी।

पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव गर्मियों के दौरान कोविड-19 की दूसरी और बेहद खतरनाक लहर के बीच हुए थे। राज्य में कुल 294 विधानसभा सीटें हैं। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बीजेपी को करारी शिकस्त दी। टीएमसी को 215 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 77 सीटें प्राप्त हुईं। वोट प्रतिशत के लिहाज से टीएमसी को लगभग 48 प्रतिशत और बीजेपी को 38 प्रतिशत वोट मिले।

ऐसे में अब सवाल उठता है कि बिहार में बीजेपी-जदयू के नेतृत्व वाले एनडीए ने भारी जीत हासिल की है, वहीं पश्चिम बंगाल, जहां बीजेपी कभी सत्ता में नहीं आई, इन दोनों राज्यों को राजनीतिक दृष्टि से कैसे समझा जाए?

मां माटी और मानुष की राजनीति

राष्ट्रीय स्तर पर बंगाल चुनाव की जिम्मेदारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव और बंगाल प्रभारी मंगल पांडे के कंधों पर है। जिन नेताओं पर बंगाल में ‘कमल’ खिलाने की जिम्मेदारी है, उनमें से ज्यादातर नेता किसी न किसी रूप में बिहार से जुड़े हैं। बिहार भाजपा के निशाने पर उत्तरी बंगाल हुआ करता है। आसनसोल, दुर्गापुर और सिलीगुड़ी को उत्तरी बंगाल का जिला माना जाता है। यह जिले बिहार की सीमा से लगते हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तरी बंगाल इलाके में 30 से अधिक सीटों पर जीत मिली थी, जबकि इस बार और अधिक की उम्मीद है। बिहार चुनाव में सीमांचल इलाके को लेकर भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक घुसपैठ को लेकर रहती है। उसी तर्ज पर इस इलाके में भी भाजपा यहीं राजनीति करती है। हाल ही में भाजपा नेता मिथुन चक्रवर्ती ने बयान दिया था कि पश्चिम बंगाल को ‘पश्चिमी बांग्लादेश’ में बदलने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन ये प्रयास कभी सफल नहीं होंगे।

प्रभात कोलकाता में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर लिखते भी हैं। वह बताते हैं कि,“पिछले चुनाव में बांग्ला भाषा और पहचान का मुद्दा बीजेपी की चुनावी रणनीति पर भारी पड़ा, लेकिन इन आकलनों में उच्च और मध्यम वर्गीय हिंदू का पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी को ज्यादा वोट देना नजरअंदाज कर दिया गया।

चुनाव अभियान और परिणाम की समीक्षा करने से पता चलता है कि राज्य में वह ताकत मजबूत हो रही हैं, जिन्होंने हिंदी पट्टी की राजनीति को आकार दिया है। बंगाल में भाजपा ने हिंदू राष्ट्रवाद की भाषणबाजी का इस्तेमाल किया और आर एस एस ने आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग का ध्रुवीकरण किया।

पश्चिम बंगाल में अचानक बाबरी मस्जिद बनाने और उस पर पर हो रही राजनीति के पीछे बड़ा खेल हो रहा है। इस सबके बावजूद यदि पश्चिम बंगाल का चुनाव हिंदी पट्टी से अलग रहा है, तो इसके पीछे उसकी डेमोग्राफी या आबादी का स्वरूप है एवं बंगाल में अन्य राज्यों की तुलना में मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है।”

पत्रकार अजय पाठक राजनीतिक पार्टी के लिए पीआर का काम करते हैं। वह बताते हैं कि,“बिहार का चुनाव बंगाल से बहुत अलग है। बिहार का पूरा चुनाव महिला सशक्तिकरण, जंगल राज और पिछड़ेपन के इर्द-गिर्द घूमता रहा। बंगाल में ममता बनर्जी सरकार की प्राथमिकता रही है कि महिलाओं का सशक्तिकरण और कल्याण सुनिश्चित किया जा सके।

बिहार के विपरीत, बंगाल में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व पिछड़ा हुआ नहीं है। आज लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लगभग 40 प्रतिशत सांसद महिलाएं हैं, जबकि बिहार के नए मंत्रिमंडल में सिर्फ तीन महिलाएं हैं। ममता बनर्जी को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की तरह महिलाओं का अटूट समर्थन हासिल हैं।”

इसके साथ ही वह कहते हैं, “भाजपा द्वारा प्रचारित संदेशखाली में तथाकथित सामूहिक बलात्कार की घटनाएं झूठी साबित हुईं। पिछले साल आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुए बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया था।

दुर्गा पूजा के दौरान लाखों की भीड़ को भगदड़ से बचाने के लिए हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है। ‘असुरक्षित बंगाल’ भाजपा का एक झूठ है, जिसे बंगाल के मतदाता भली-भांति समझते हैं। मुख्य रूप से औद्योगीकरण में गिरावट के कारण भीषण गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे बिहार की आर्थिक स्थिति के विपरीत, बंगाल प्रगति कर रहा है।”

बंगाल ने पिछले साल महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़ा अपराजिता महिला एवं बाल विधेयक पारित किया था और राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) ने पिछले चार वर्षों से कोलकाता को महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहरों मंद से एक बताया है। वहीं हिंसा की बात करें तो यूपी, बिहार, राजस्थान और महाराष्ट्र में स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों व सांप्रदायिक तनावों से राजनीतिक हिंसा भड़कती है, जबकि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक वर्चस्व की होड़ ने हिंसा की संस्कृति को जन्म दिया है।

बंगाल में बिहार और यूपी

बंगाल के चुनाव में हिंदी पट्टी वोटर की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पूरे बंगाल में हिंदी और भोजपुरी बोलने वालों की संख्या ठीक-ठाक है। बिहार और पूर्वांचल के लोग पश्चिम बंगाल में तीन मुख्य चरणों में आए। पहला चरण यानी 1890 से 1940 में जब अंग्रेजों ने जूट मिलों की स्थापना की, लेकिन बंगालियों ने मजदूरी में कम रुचि दिखाई।

तब अंग्रेजों ने संयुक्त प्रांत के हिस्से बिहार और उत्तर प्रदेश से सस्ते मजदूर मंगाए। फिर आजादी के बाद जब कोलकाता महानगर के रूप में और प्रसिद्ध हुआ, तब बिहार में रोजगार की कमी को देखते हुए बड़ी संख्या में लोग रिक्शा-टैक्सी चलाने और छोटे बिजनेस के लिए आने लगे। तीसरा चरण औद्योगिक शहरों से जुड़ा था। आसनसोल, दुर्गापुर, बर्नपुर जैसे क्षेत्रों में स्टील प्लांट और कोयला खदानों में काम करने के लिए अच्छी संख्या में इंजीनियर और मजदूर आए।

बंगाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में हिंदी पट्टी के लोगों की भी काफी संख्या है। बैरकपुर बेल्ट, भाटपाड़ा, नैहाटी, जगदल, टीटागढ़ में तो बिहार का दबदबा है। आसनसोल-दुर्गापुर को मिनी बिहार तक कहा जाता है। इसलिए, बंगाल चुनाव में टीएमसी और बीजेपी दोनों बिहार का सबसे अधिक समर्थन प्राप्त करना चाहते हैं।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर बिहार और बंगाल की राजनीति को तुलना करते हुए लिखते हैं कि, “बंगाल का गणित अलग है। इंडिया गठबंधन यहां बीजेपी से नहीं लड़ सकती। इसलिए ममता बनर्जी सत्ता विरोधी मतों के बिखराव में ही स्वयं की जीत देखती है,इसलिए, अकेले चलती है।

बंगाल में कभी सीपीएम से ममता बनर्जी नहीं डरी, अब टीएमसी मतलब ममता बनर्जी से बीजेपी नहीं डर रही। 2026 में कुछ भी संभव है। घुसपैठ बंगाल चुनाव का बड़ा मुद्दा है. अमित शाह कड़े, ममता बनर्जी सॉफ्ट दिखती हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थानीय बंगाली भी पसंद नहीं कर रहे हैं।”

बिहार में चुनाव से पहले गहन मतदाता पुनरीक्षण हुआ था। जो काफी विवादित रहा था। बिहार में हार स्वीकार करते हुए भी, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाने की ओर इशारा किया। भारत के निर्वाचन आयोग अनुसार, बिहार के बाद एसआईआर का दूसरा चरण नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है। इसमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। कई विपक्षी पार्टियों ने बिहार की तरह ही इस चरण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

बिहार और बंगाल की राजनीति समझने वाले कहते हैं कि बिहार की राजनीतिक किस्मत दिल्ली में लिखी जाती है और बंगाल की बंगाल में लिखी जाती है।

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