केंद्रीय श्रम संगठनों के संयुक्त मंच द्वारा चार श्रम संहिताओं और मनरेगा की बहाली सहित अन्य मांगों को लेकर बृहस्पतिवार को आयोजित भारत बंद का मिला-जुला असर ही होना था, इसके बावजूद इसके महत्व को कम नहीं किया जा सकता।
इस हडताल में वामपंथी, कांग्रेस और समाजवादी विचारधारा से जुड़े दस श्रम संगठनों ने हिस्सा लिया, जिनमें इंटक, एटक, सीटू, एचएमएस, टीयूसीस, सेवा, एलपीएफ और यूटीयूसी जैसे संगठन शामिल थे। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने इससे खुद को अलग रखा था।
यह भारत बंद ऐसे समय किया गया, जब संसद में अमेरिका से हुए व्यापार समझौते से लेकर हाल ही में आई आर्थिक समीक्षा और बजट को लेकर बहस तीखी है। गौर किया जाना चाहिए कि इस हड़ताल का समर्थन संयुक्त किसान मोर्चा ने भी किया है, जो अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते का पुरजोर तरीके से विरोध कर रहा है।
श्रम संगठनों ने देश के छह सौ जिलों में हड़ताल के असर की बात की है और दावा किया है कि इसमें 30 करोड़ कामगारों ने हिस्सा लिया। इस आंकड़े को लेकर बहस हो सकती है, लेकिन इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी सरकार की नीतियों ने श्रमिक वर्ग की मोलभाव की क्षमता को तो कमजोर किया ही है, उनकी सामाजिक सुरक्षा को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या यह बात किसी से छिपी है कि सरकार लगातार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कमजोर कर निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह भी साफ देखा जा सकता है कि किस तरह से नई श्रम संहिताएं बुनियादी तौर पर कामगारों की कीमत पर कॉर्पोरेट के हितों को मजबूत कर रही हैं। यही नहीं, श्रम संगठनों का तो यह भी आरोप है कि अनेक औपचारिक क्षेत्रों को कानूनी संरक्षण के दायरे से ही बाहर कर दिया गया है!
पिछले साल पारित किए गए बीमा कानून (संशोधन) से बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेश निवेश (एफडीआई) के 74 फीसदी से बढ कर सौ फीसदी किए जाने का रास्ता खुल गया है। यही नहीं, इसके साथ ही एलआईसी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य बीमा कंपनयों के निजीकरण का भी दबाव बढ़ गया है, ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करे।
मोदी सरकार ने जिस तरह से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर वीबी जी राम जी नामक नई योजना शुरू की है, उस पर तो पहले से ही सवाल हैं। वास्तव में मनरेगा मांग पर आधारित रोजगार की संवैधानिक गारंटी था, लेकिन वीबी जी राम जी लाकर सरकार ने यह गारंटी ही खत्म कर दी है।
यदि श्रम संगठनों के साथ ही किसान संगठन मनरेगा के खात्मे और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते का भी विरोध कर रहे हैं, तो यह भी देखा जा सकता है कि इन दोनों कदमों का सर्वाधिक असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार पर पड़ने वाला है।
वास्तव में श्रम संगठनों को भी अपने तौर तरीकों में बदलाव लाने की जरूरत है, क्योंकि उनकी साख भी गिरी है और खासतौर से मध्य वर्ग के बीच उनकी पैठ कम हुई है, जिसे कभी प्रेशर ग्रुप की तरह देखा जाता था। इस सांकेतिक कदम के साथ ही श्रम संगठनों को अपनी मांगों को लेकर व्यापक राय बनाने की भी जरूरत है।











