अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान जल्दी ही आत्मसमर्पण कर देगा, मगर जमीनी हालात ऐसे नजर नहीं आ रहे हैं। वास्तविकता तो यही है कि इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 28 फरवरी को अचानक ईरान पर हमला कर उस पर युद्ध थोपा है और दुनिया को एक बड़े संकट में डाल दिया है।
हमले में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई की मौत के बाद ट्रंप प्रशासन को लग रहा था कि ईरान टूट जाएगा और वे निर्वासित प्रिंस रेजा पहलवी की ताजपोशी करवाने में सफल हो जाएंगे। इसके उलट दो हफ्ते बाद हालात बिगड़ते ही गए हैं और अब यह युद्ध कई मोर्चों पर फैल गया है और इसके चौतरफा असर दिखने लगे हैं। स्ट्रेट ऑफ होरमुज से तेल के टैंकरों की आवाजाही बाधित हो गई है, जिसके असर से भारत भी नहीं बचा है। कच्चे तेल के दाम सौ डॉलर से ऊपर पहुंच गए हैं और अमेरिका तक से खबर आ रही है कि वहां खुदरा में तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो खाड़ी के देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है, जिनकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और पर्यटन से जुड़ा हुआ है।
दरअसल मुश्किल यह है कि ट्रंप ने इस युद्ध को अपनी नाक का बाल बना लिया है, बावजूद इसके कि उनके लिए इस युद्ध से निकलना आसान नहीं दिख रहा है। खुद को शांति का स्वयंभू मसीहा बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध के सबसे बड़े किरदार हैं। याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि ईरान के संदिग्ध परमाणु कार्यक्रम को लेकर जब सुरक्षा परिषद के पांच सदस्यों और जर्मनी को मिलाकर छह देशों के समूह से बात चल रही थी, जब डोनाल्ड ट्रंप ने ही 2017 में वार्ता से हाथ खींच लिए थे।
पिछले साल जून में ईरान पर अमेरिकी सह पर इजराइल ने उस वक्त हमला किया था जब उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर बात चल रही रही थी। जबकि आज तक यह साबित नहीं किया जा सका है कि ईरान ने परमाणु हथियार बनाए हैं। उसका हमेशा से दावा रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम असैन्य है। यही हाल इराक में किया गया था, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सुरक्षा परिषद को धता बताकर सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल करने के लिए इराक पर तेइस साल पहले ऐसी ही मौसम में मार्च, 2003 में हमला किया था। ट्रंप भले ही ईरान के समर्पण का दावा करें, मगर दूसरी ओर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान युद्ध खत्म करने की तीन शर्तें रखी हैं, जिनमें उसके अधिकारों की रक्षा, उसे हुए नुक्सान की भरपाई और भविष्य में उस पर हमला न करने की गारंटी शामिल हैं।
सवाल है कि क्या अमेरिका इन शर्तों को मानेगा? यह देखना होगा कि ट्रंप और नेतन्याहू की जिद से शुरू हुई यह जंग कहीं दुनिया को मंदी की ओर तो नहीं ले जाएगी और तब इसके असर से अमेरिका भी नहीं बचेगा। आखिर दुनियाभर के शेयर बाजारों में मचा हाहाकार यही संकेत कर रहा है। अकेले भारत के शेयर बाजार में निवेशकों के 20 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं!
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