“हमने हर चीज में जीत हासिल की, वाद-विवाद, क्विज और क्रिकेट मैच में भी। मुझे लगता है, फिलहाल हम बहुत अच्छा नहीं कर रहे हैं। इसलिए थोड़ा और बेहतर करने की जरूरत है दोस्तों! आपको कमर कसने की जरूरत है। जब मैं स्टीफंस में था, तो हम दूसरे स्थान पर आने का जश्न नहीं मनाते थे!”
भाषण का यह हिस्सा सांसद शशि थरूर है, जब वह दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में एक कार्यक्रम में बोल रहे थे।
एक शब्द में किसी राजनेता के बारे परिचय देना बेहद मुश्किल है, लेकिन कांग्रेस सांसद शशि थरूर को लेकर ऐसी कोई परेशानी नहीं है। अंग्रेजीदां डॉ शशि थरूर के लिए ‘मैचलेस’ (जिसकी तुलना न की जा सके) शब्द पर्याप्त है। लंदन में जन्म से लेकर भारतीय राजनेता बनने तक के सफर में शशि थरूर लगातार चर्चाओं में रहते हैं। चर्चा भी ऐसी कि जो नई बहस को जन्म देती है। यह शशि थरूर ही हैं, जो हिंदू होने पर किताब लिख सकते हैं, ब्रिटेन में अंग्रेजों को दो टूक सुना सकते हैं, तो भारत में यह बयान भी दे सकते हैं, “कांग्रेस को मेरी जरूरत नहीं तो मेरे पास और भी काम हैं”।
राजनेता, डिप्लोमैट, लेखक और अंग्रेज़ी भाषा के जानकार शशि थरूर का जन्म 9 मार्च 1956 को लंदन, ब्रिटेन में हुआ था। उनका परिवार केरल से ताल्लुक रखता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई, कोलकाता और दिल्ली में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका गए, जहां उन्होंने टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फ़्लेचर स्कूल ऑफ़ लॉ एंड डिप्लोमैसी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
शशि थरूर ने संयुक्त राष्ट्र में लगभग तीन दशकों तक विभिन्न उच्च पदों पर काम किया। 2009 में वे भारतीय राजनीति में सक्रिय हुए और तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर लोकसभा सांसद बने। वे लगातार इस क्षेत्र से चुनाव जीतते आ रहे हैं। वह विदेशी मामलों में संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष भी हैं।
राजनतिक सफर
2009 में थरूर केरल के तिरुवनंतपुरम से पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लडे़ और जीते। तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में विदेश मामलों के राज्य मंत्री बने। 2012 में थरूर को केंद्रीय राज्य मंत्री, मानव संसाधन विकास के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। 2010 में उन्होंने विदेश मामलों की एक समिति के सदस्य के रूप में शपथ ली। 2014 में फिर तिरुवनंतपुरम सीट ने वह सांसद चुने गए।
साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक
कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को अंग्रेजी भाषा में योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार 2019 मिल चुका है। यह पुरस्कार ब्रिटिश काल पर लिखी गई ‘एन एरा ऑफ डर्कनेस: द ब्रिटिश एंपरर इन इंडिया’ के लिए मिला। 2016 में रिलीज होने के 6 महीने में ही इस किताब की 50 हजार से अधिक प्रतियां बिक गईं। राइजिंग स्टार: द मेकिंग ऑफ नरेंद्र मोदी, पैक्स इंडिका: इंडिया एंड द वर्ड ऑफ द 21सेंक्चुरी, द एलीफैंट, द टाइगर एंड द सेल फोन: इंडिया इस द 21सेंक्चुरी, , व्हाई आई एम ए हिंदू, द ग्रेट इंडियन नॉवेल, द बैटेल ऑफ बिलॉन्गिंग जैसी चर्चित किताबें थरूर लिख चुके हैं। इसके अलावा वो द न्यू यॉर्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट, गार्जियन आदि जैसे भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों के लिए एक स्तंभकार और लेखक हैं। उन्होंने न्यूज़वीक इंटरनेशनल में योगदान-संपादक और सामयिक स्तंभकार के रूप में भी काम किया।
युवाओं में हिट है शशि थरूर की अंग्रेजी
युवाओं और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों में शशि थरूर की अंग्रेजी बेहद हिट है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर की गई पोस्ट की अंग्रेजी चर्चा का विषय बनती है। युवाओं का कहना है कि अंग्रेजी भाषा के नए शब्द शशि थरूर से सीखने को मिलते हैं। कई बार तो मतलब समझ न आने पर डिक्शनरी का सहारा लेना पड़ता है।
कॉमेडी भी कर चुके हैं थरूर
गंभीर किस्म की चर्चाओं से अलग शशि थरूर ने कॉमेडियन के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। ओटीटी प्लेटफॉर्म एमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई सीरीज वन माइक स्टैंड में वह स्टैंडअप कॉमेडी कर चुके हैं। उन्होंने अपनी अंग्रेजी के ज्ञान को लेकर होने वाली खास चर्चाओं को भी अपनी कॉमेडी में शामिल किया। इस कार्यक्रम की तैयारी के लिए उनको 24 घंटे का समय मिला था। कम समय में भी उनकी ये परफार्मेंस हिट रही थी।
अंतरराष्ट्रीय राजनयिक के रूप में
भारतीय राजनीति में आने से पहले शशि थरूर लगभग 30 सात तक संयुक्त राष्ट्र में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। उन्होंने शांति स्थापना, शरणार्थी सहायता और प्रशासनिक कार्यों में योगदान दिया, साथ ही महासचिव कोफी अन्नान के कार्यकाल के दौरान अवर महासचिव के रूप में भी काम किया। 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए नामित किया गया। इस चुनाव में वह दक्षिण कोरिया के बान की मून के बाद दूसरे स्थान पर रहे।
अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार
अमेरिका के फ़्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमैसी में शशि थरूर को सर्वश्रेष्ठ छात्र के लिए रॉबर्ट बी. स्टीवर्ट पुरस्कार मिला और उन्होंने फ्लेचर फोरम ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स की स्थापना में मदद की और इसके पहले संपादक के रूप में कार्य किया। उन्हें पुगेट साउंड विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी. लिट. और बुखारेस्ट विश्वविद्यालय ने इतिहास में डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया। उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए हकीम खान सूर पुरस्कार और कूटनीति में उत्कृष्टता के लिए प्रियदर्शिनी पुरस्कार भी मिला चुका है। 2012 में स्पेन के राजा उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान एनकोमिएन्डा डे ला रियल ऑर्डर एस्पानोला डे कार्लोस III से सम्मानित कर चुके हैं। 2022 में फ्रांस की सरकार ने भी उन्हें अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान, शेवेलियर डे ला लीजन डी’होनूर से सम्मानित किया।
विवादों में शशि थरूर
साल 2018 में शशि थरूर पर पत्नी सुनंदा पुष्कर को आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता का आरोप लगा। सुनंदा का शव एक पांच सितारा होटल में पाया गया था। हालांकि बाद में दिल्ली की एक अदालत ने थरूर ने आरोपों से बरी कर दिया। थरूर ने कहा, “यह उस लंबे डरावने सपने का अंत है, जिसने मेरी दिवंगत पत्नी सुनंदा के दुखद निधन के बाद मुझे घेर लिया था।”
थरूर ने हाल ही एक लेख लिखकर नए तरह के विवाद को जन्म दे दिया। उन्होंने लेख में केरल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार की तारीफ कर दी थी। इसके बाद से वह पार्टी के कुछ नेताओं की रडार पर आ गए। थरूर अपने एक राजनीतिक बयान के लिए तब विवादों में आ गए थे, जब उन्होंने अरंविद केजरीवाल को ‘बगैर जिम्मेदारी की सत्ता’ चाहने वाला बताया दिया था। इस परविवाद बढ़ने के बाद थरूर ने माफी भी मांग ली थी।
बेबाक बयान थरूर की पहचान
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने शशि थरूर की मित्र और फिर पत्नी बनीं सुनंदा पुष्कर को लेकर उन्हें “पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड” बताया था। इस पर थरूर ने बेबाकी से जवाब देते हुए कहा, “मेरी पत्नी अमूल्य है, किसी भी काल्पनिक 50 करोड़ से ज़्यादा, लेकिन इसे समझने के लिए आपको किसी के प्यार के काबिल बनना पड़ेगा।”
मई 2015, जब शशि थरूर को ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी की वादविवाद सोसायटी में बोलने के लिए बुलाया गया था, तब उन्होंने कुछ ऐसा भाषण दिया था जिसकी चर्चा दुनियाभर में हुई थी। भाषण का विषय था, “सदन का मानना है कि ब्रिटेन को अपने पूर्व उपनिवेशों को मुआवज़ा देना चाहिए।”
इस पर थरूर ने कहा “जब अंग्रेज भारत आए तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में 23 फीसदी हिस्सा भारत का था। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो यह हिस्सा सिर्फ चार फीसदी रह गया। क्यों? क्योंकि भारत पर शासन ब्रिटेन के फायदे के लिए किया गया था। 200 साल तक ब्रिटेन के उत्थान के पीछे भारत में की गई लूटमार का योगदान था।”
थरूर ने इसे ब्रिटेन पर भारत का “नैतिक कर्ज” कहा। ब्रिटेन में ही एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान थरूर ने यहां तक कह दिया, “ब्रिटेन को अपना इतिहास भूलने की बीमारी है।”











