पुलिस के उत्पीड़न के खिलाफ किसी न्यायिक लड़ाई को उसकी निर्णायक परिणति तक पहुंचाना आसान नहीं है, लेकिन मुदैर के सेशन कोर्ट से आया एक फैसला देश में न्यायिक इतिहास के मामले में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह मामला छह साल पुराना है, जब कोविड महामारी के दौरान पूरे देश में सख्ती से लॉकडाउन लागू किया गया था।
तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सथानकुलम में जून, 2020 को मोबाइल फोन की मरम्मत की दुकान चलाने वाले 58 बरस के पी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स की पुलिस हिरासत में बर्बरता से हुई मौत से जुड़े इस मामले में निचली अदालत ने नौ पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को मौत की सजा सुनाई है।
जयराज को सिर्फ इसलिए हिरासत में ले लिया था, क्योंकि उन्होंने तय अवधि से पंद्रह मिनट देर तक अपनी दुकान खोले रखी थी। थाने ले जाकर उन्हें पीटा गया और जब उनके बारे में जानकारी जुटाने के लिए उनके 31 बरस के बेटे बेनिक्स थाने पहुंचे तो उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया। पलिस थाने में मौजूद थाना प्रभारी और उनकी पूरी टीम ने पिता पुत्र को बर्बरता से पीटा और यातनाएं दी गईं।
कोविड के लॉकडाउन के दौरान पूरे देश से आई उत्पीड़न और मानवीय त्रासदियों से संबंधित ढेरों कहानियों पर तो आज भी अलग से काफी कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन थूथुकुडी की इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था।
पुलिस हिरासत में बर्बरता के कारण हुई पिता पुत्र की मौत से संबंधित यह मामला रफा-दफा कर दिया गया होता यदि इस बर्बरता की चश्मदीद हेड कांस्टेबल रेवती ने अपनी नौकरी और परिवार की सुरक्षा को दांव पर लगा कर सच का साथ न दिया होता। यह उनकी कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदना के साथ ही साहस का नतीजा है कि मदुरै की अदालत ने जयराज और बेनिक्स की हिरासत में हुई मौत के मामले को दुर्लभ मानते हुए सथानकुलम थाने के नौ पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को मौत की सजा सुनाई है। इस मांमले से जुड़े एक अन्य आरोपी की कोविड के दौरान मौत हो गई थी।
यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि भीषण गर्मी की उस रात किस तरह से जयराज और उनके बेटे को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। पुलिसिया दमन की इस घटना को उसी साल मई, 2020 में अमेरिका के मिनियापोलिस में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के कारण एक अश्वेत जॉर्ज फ्लायड की एक कथित मामूली अपराध के कारण दी गई यातना से हुई मौत की घटना तक से जोड़ कर देखा गया था। एक अमेरिकी पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज फ्लायड को बीच सड़क पर पटक दिया और उनकी गर्दन को अपने बूट से दबा दिया था। जॉर्ज फ्लायड की पुलिसिया हत्या को अमेरिका में अश्वेतों के पक्ष में चले आंदोलन ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ से जोड़कर देखा गया। बेशक अमेरिका में अश्वेतों के साथ होने वाली बर्बरता की भारत से तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन सथानकुलम की घटना यह तो रेखांकित करती ही है कि पुलिस की नजर में एक आम आदमी की क्या हैसियत है।
जयराज और बेनिक्स के मामले में पुलिसिया तंत्र ही नहीं, बल्कि मेडिकल जांच से जुड़े अधिकारियों ने भी लीपापोती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सीबीआई जांच में कड़ियों को जोड़ा गया, डीएनए का मिलान किया गया। यह सब संभव नहीं होता यदि हेड कांस्टेबल रेवती ने साहस के साथ खुद गवाह बनकर उस रात थाने में हुई बर्बरता के मिनट द मिनट ब्योरे न दिए होते। अपने देश में पुलिसिया तंत्र में काम करने के जो तौर तरीके हैं, उसे देखते हुए रेवती के लिए अपने उच्च अधिकारियों के खिलाफ अदालत में खड़े होने का फैसला करना कितना मुश्किल भरा रहा होगा, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है।
मदुरै की अदालत से आया यह फैसला वर्दीधारियों के लिए कड़ा संदेश है कि वे निहत्थे नागरिकों पर असीमित ताकत का इस्तेमाल कर कानून के हाथों से बच नहीं सकते। यह फैसला वास्तव में हेड कांस्टेबल रेवती के असाधारण साहस की कहानी भी है, जिसने पुलिस का संवेदनाओं से भरा एक मानवीय चेहरा सामने लाया है। क्या पुलिस तंत्र अपनी इस हेड कांस्टेबल से कोई सीख लेगा?











