बिहार: RSS के विरोध के बावजूद सम्राट चौधरी कैसे बने मुख्यमंत्री?

Samrat Chaudhary

बिहार की सियासत अब तक दो नेताओं के इर्द-गिर्द थी। लालू यादव और नीतीश कुमार। लालू यादव एक तरह से सालों से बिहार की राजनीति से गायब हैं और अब बिहार में नीतीश कुमार युग भी खत्म हो गया है। बिहार की सियासत में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। बीजेपी को दशकों से इस दिन का इंतजार था, वह कई बार सरकार में रही, लेकिन उपमुख्यमंत्री से आगे नहीं बढ़ पाई। अब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं।

हिंदी पट्टी का बिहार इकलौता ऐसा राज्य था जहां भाजपा की सरकार नहीं बनी थी। समाजवाद की राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाला बिहार में जब सरकार बनाने का मौका आया तब संघ की पसंद का या उनकी पाठशाला के किसी नेता के बजाय सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री क्यों बनाना पड़ा? कभी नीतीश कुमार को पद से हटाने के लिए मुरेठा बांधने वाले सम्राट चौधरी, नीतीश की पसंद कैसे बन गए? हम इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं।

भाजपा के कोर वोटर क्यों नाराज?

“संघ के लिए अच्छा नहीं हुआ। आरएसएस का आदमी सीएम बनना चाहिए।” रमण मिश्र बताते हैं।

“किसी भी जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनना चाहिए। बस वह भाजपा और आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित हो। ऐसा नहीं कि राजनीति करने के लिए हिंदुत्व की बात करता हो।” पटना के रहने वाले अनुराग गुप्ता बताते हैं।

“बिहार में भाजपा को एक ऐसा नेता चाहिए जो विपक्ष के प्रति आक्रामक हो। दबंग छवि वाला हो। सम्राट चौधरी इस सब में फिट बैठते हैं।” सहरसा के रहने वाले रोहित कुमार चौधरी बताते हैं।

पटना स्थित भाजपा कार्यालय में घूम रहे भाजपा कार्यकर्ता ने अपने नए मुख्यमंत्री के बारे में इस तरह से अपनी बात कही है। अधिकांश लोगों से बात करने पर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला आश्चर्यजनक लगा है। मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में संघ से जुड़े हार्डलाइनर को मुख्यमंत्री के तौर पर चुनने वाली बीजेपी को राजद और जदयू के तले राजनीति करने वाले सम्राट क्यों पसंद आए?

आईआईटी और आईआईएम से पढ़ाई कर चुके आशीष कुमार पीआर एजेंसी में नॉरेटिव हेड के तौर पर काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि, “बिहार में सरकार बनाना भाजपा का सपना था। अब सम्राट चौधरी किस हालात में बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही हो… ना उत्साह, ना ऊर्जा, ना वो राजनीतिक चमक-दमक थी। शपथ ग्रहण में ना नरेंद्र मोदी दिखे ना अमित शाह। बीजेपी के बड़े चेहरे गायब रहे। किसी भी राज्य का कोई मुख्यमंत्री तक शामिल नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था कि भाजपा के लिए उत्सव नहीं समझौता हो रहा हो।”

वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर बताते हैं कि, “बिहार में समाजवाद और बहुजनवाद की राजनीति प्रभावी है। यहां संघ की पसंद सवर्ण नेता है। भाजपा यह गलती कभी नहीं करेगी। बाद में संघ पहले सीएम के रूप में किसी दलित या अति पिछड़ा नेता को भी चाहता था। सम्राट चौधरी अपनी राजनीतिक चतुराई और सहयोगी दल से मिली ताकत से मजबूत हुआ है। यह सच है कि बिहार भाजपा में कई बड़े नेता इस नाम से सहमत नहीं हैं। आरएसएस तो खैर पसंद नहीं करता था। महज आठ साल पहले पार्टी में आया यह व्यक्ति आज बिहार में वह कुर्सी पा लिया है।”

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर और लेखक अरुण कुमार लिखते हैं कि, “सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना तय था। बीजेपी को नीतीश कुमार से कुर्सी के साथ-साथ उनका वोट बैंक भी लेना है और कुशवाहा नीतीश जी का सबसे बड़ा वोट बैंक है। 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव है। वहां अखिलेश यादव ने PDA का जो समीकरण बनाया है उससे लड़ने के लिए भी सम्राट चौधरी को बिहार में मुख्यमंत्री बनाना जरूरी है। सबसे जरूरी चीज कि सम्राट चौधरी के अलावा ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसको मुख्यमंत्री बनाने से बीजेपी का वोट बढ़े।”

वहीं बहुजन लेखक क्रांति कुमार बताते हैं कि, “बीजेपी ने सम्राट चौधरी को इसलिए मुख्यमंत्री बनाया है क्योंकि वो केंद्रीय नेतृत्व और बिहार के सवर्ण बीजेपी नेताओं की सुनते हैं, उनके प्रभाव के अंदर काम करते हैं। ये तो समय बताएगा क्या सम्राट चौधरी इस प्रभाव से अलग होकर अपनी अलग पहचान बना पाते हैं या नहीं? बनाने की कोशिश करेंगे तो बीजेपी जल्दी से उन्हें हटा भी देगी।”

दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे पंकज कुमार का शोध कार्य भारतीय समाज में जाति पर केंद्रित है। वह बताते हैं कि, “भाजपा की जो आक्रामक राजनीति है उसके लिए यदि कोई जाति सबसे अधिक मुफ़ीद है तो वह ओबीसी की सामंती जातियाँ हैं। भाजपा के उग्र हिंदुत्व को यदि कोई लाठी-डंडे के दम पर लागू कर सकता है तो वे यही जातियां हैं।

सवर्ण भी भाजपा के इस उग्र हिंदुत्व को लागू नहीं कर सकते। भाजपा के उग्र हिंदुत्व के लिए सबसे मुफीद व्यक्ति बिहार में सम्राट चौधरी हैं। इसका कारण यह है कि सम्राट का पूरा राजनीतिक जीवन फरेब से भरा रहा है इसलिए उन्हें कंट्रोल करना मोदी-शाह के लिए बहुत आसान है। उनसे जो चाहे, करवा सकते हैं। पूरी सरकार उनके नियंत्रण में है। इधर त्रिवेणी संघ भी पूरा होगा, त्रिवेणी संघ में सदा के लिए मट्ठा भी डाल देंगे और जातीय भावनाओं का सम्मान और दोहन सब एक साथ कर लेंगे।”

नीतीश को हटाने के लिए मुरेठा बांधने वाले सम्राट कैसे बने उनकी पहली पसंद?

सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो रहा है। जिसमें अर्जुन की भूमिका में सम्राट चौधरी है तो कृष्ण की भूमिका में नीतीश कुमार। राजनीति गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार की पहली पसंद शायद सम्राट चौधरी है। नीतीश इससे पहले समृद्धि यात्रा के दौरान भी कई बार इशारा कर चुके हैं कि सम्राट अगले सीएम हो सकते हैं।

महज दो साल पहले तक नीतीश को सीएम पद से हटाने के लिए सिर पर मुरेठा बांधने वाले सम्राट नीतीश के सबसे प्रिय बीजेपी नेता कैसे बने?

पत्रकार और लेखक परमवीर सिंह बताते हैं कि, “भाजपा जदयू गठबंधन के बाद सम्राट चौधरी पार्टी हित और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए अयोध्या यात्रा के दौरान सिर मुंडवाकर सरयू नदी में अपनी पगड़ी विसर्जित कर अपनी भूमिका बदली थी। नेता प्रतिपक्ष, फिर प्रदेश अध्यक्ष और फिर डिप्टी सीएम अब सीएम.. इस सफर तक जाने के लिए नीतीश कुमार से बेहतर रिश्ता जरूरी था। सम्राट अपने हर भाषण में प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की काफी तारीफ करते थे। सम्राट के पिता का नीतीश कुमार से बेहतर रिश्ता और लव-कुश का जातीय गठबंधन इसमें अहम भूमिका निभाई।”

“मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की परिस्थितियाँ भिन्न थीं, वहां न तो सहयोगी दलों का दबाव था और न ही नेतृत्व को लेकर कोई अंतर्विरोध। इसके विपरीत, बिहार की राजनीति में गठबंधन की जटिलताएँ हमेशा निर्णायक भूमिका निभाती रही है। यहां अगर नीतीश कुमार नहीं होते तो सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री नहीं बनते। सम्राट चौधरी की जाति ने भी अहम रोल अदा किया।” रिटायर्ड अधिकारी और लेखक अरुण कुमार बताते हैं।

सम्राट कुशवाहा जाति से आते हैं जिनकी आबादी पिछड़ों में यादवों के बाद सबसे ज्यादा है। जातिगत गणना के मुताबिक बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी 4.2 फीसदी है।

निजी जिंदगी पर आरोप

राजद ने सम्राट चौधरी के शपथ लेते हुए वीडियो पोस्ट करते हुए आरोप लगाया कि नए मुख्यमंत्री ‘अक्षुण्ण’, ‘सम्यक’ और ‘संसूचित’ जैसे गरिमामय शब्दों को ठीक से नहीं पढ़ सके। बिहार के नए मुख्यमंत्री जी शपथ भी सही ढंग से नहीं पढ़ पाए। दूसरों के परिवारवाद, अपराध और शिक्षा को लेकर मनगढ़ंत आरोप लगाने वालों को आज सब कुछ एक ही पैकेज और एक ही व्यक्ति में मिल गया है। दूसरों का उपहास उड़ाने वाले उन तथाकथित संभ्रांत लोगों के मुंह पर वक्त ने क्या तमाचा जड़ा है।

सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर 1968 को हुआ था और उन्हें राजनीतिक परिवार से विरासत में प्राप्त हुई। उनके पिता शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापकों में प्रमुख थे, जो स्वयं सांसद व विधायक रह चुके हैं। मां पार्वती चौधरी भी विधायक के पद पर रह चुकी हैं। तमिलनाडु की कामराज यूनिवर्सिटी से पीएफसी (प्री फाउंडेशन कोर्स) पूरा करने वाले सम्राट चौधरी की पत्नी कुमारी ममता वकील हैं। इस जोड़े की दो संतान हैं।

बिहार विधान परिषद की वेबसाइट के अनुसार, 1995 में एक राजनीतिक प्रकरण में उन्हें 89 दिनों तक जेल की सजा भुगतनी पड़ी। 1999 में रबड़ी देवी सरकार में सबसे युवा मंत्री बनते ही सियासी विवाद हो गया। विपक्ष ने कहा कि वे 25 साल के नहीं हैं। उम्र के चलते मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

साल 2013 में राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के उभार से नाराज़ होकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था। उस वक़्त सम्राट चौधरी ने भी आरजेडी के 13 विधायकों को तोड़कर जेडीयू का साथ दिया। इसके बाद वे हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा में शामिल हो गए, जहां उनके पिता प्रदेश अध्यक्ष बने। साल 2017 के अंत में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली।

बिहार चुनाव के समय राजनीतिक रणनीतिकार और जनसुराज्य पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को लेकर कई बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी सातवीं कक्षा में फेल हो गए थे। उनका असली नाम राकेश कुमार है। उन्होंने आरोप लगाया कि गलत हलफनामा देने के कारण कोर्ट ने सम्राट चौधरी की विधायकी रद्द कर दी थी। साथ ही सम्राट चौधरी के उम्र पर भी सवाल उठाया।

पत्रकार परमवीर सिंह बताते हैं कि 2010 में परबत्ता से सम्राट चौधरी ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था। तब के एफिडेविट में उन्होंने साफ जानकारी दी थी कि वह 7वीं पास हैं।

अब देखना है कि भविष्य में बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी योगी की तरह अपना कद बना पाते हैं या भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस नेता को हिमांता विश्वा शर्मा बनाकर रखने में कामयाब होता है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now