राज्यसभा की 37 सीटों के हालिया चुनाव में जिस तरह से ओडिशा और बिहार में भाजपा के एक-एक अतिरिक्त उम्मीदवार विधायकों की संख्या कम होने के बावजूद जीते हैं, वह अजूबा नहीं है। मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने खुद को चौबीस घंटे चुनाव लड़ने वाली मशीनरी में बदल दिया है और उसे साम दाम दंड भेद से गुरेज नहीं है।
राज्यसभा की 26 सीटों में निर्विरोध निर्वाचन हो गए थे और बची 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए ने बिहार की सभी पांचों और ओडिशा में दो सीटें, हरियाणा में एक सीट जीती है। ओडिशा और बिहार में जिस तरह से विपक्ष के विधायकों ने क्रास वोटिंग की है, वह दिखाता है कि भाजपा चुनावी जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। ओडिशा में पहली बार बीजू जनता दल और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके पास कम से कम एक सीट जीतने लायक साफ बहुमत था, लेकिन इस गठबंधन के 11 विधायकों ने क्रास वोटिंग कर दी। कांग्रेस को पहले ही इसका अंदाजा था और उसने अपने विधायकों को चुनाव से ऐन पहले बंगलुरू भेज रखा था।
कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने आरोप भी लगाया कि कांग्रेस के विधायकों को भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए पांच-पांच करोड़ रुपये की पेशकश की गई थी और इस सिलसिले में चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया!
जाहिर है, विधायकों की तोड़फोड़ के आरोप को महज राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के जिन तीन विधायकों ने क्रास वोटिंग की है, उनमें पहली बार विधायक बनीं युवा उद्यमी सोफिया फिरदौस भी हैं। दरअसल सवाल यही है कि आखिर एक युवा विधायक ने अपना राजनीतिक करिअर क्यों दांव पर लगा दिया? क्या किसी दबाव या प्रलोभन के बिना ऐसा संभव है?
कुछ महीने पहले ही विधानसभा चुनाव जीतने वाले बीजू जनता दल के आठ विधायकों में क्या इतनी भी नैतिकता नहीं बची थी कि वे अपने नेता नवीन कुमार के फैसले के साथ रहते या फिर उन पर कोई बाहरी दबाव था?
बिहार के चुनाव तो और भी रेखांकित करने वाले हैं, जहां से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा अध्यन नवीन कुमार सहित एनडीए के पांच उम्मीदवार जीते हैं, जबकि उनके पास पांचवीं सीट के लिए विधायक कम थे। यहां महागठबंधन के चार विधायकों ने मतदान में हिस्सा न लेकर एनडीए को मदद पहुंचाई है। इनमें कांग्रेस के तीन विधायक हैं और एक विधायक राजद का है। आखिर हाल ही में चुन कर विधानसभा पहुंचे इन विधायकों ने क्या बिना प्रलोभन और दबाव के यह कदम उठाया?
पर क्या .यह सब इतना सहजता से हुआ? इसका जवाब हरियाणा में देख सकते हैं, जहां कांग्रेस के चार मत कथित रूप से अवैध घोषित कर दिए गए।
राज्यसभा चुनाव के नतीजे जिस रूप में आए हैं, वह यह समझने के लिए जरूरी है कि चुनाव भले ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं, लेकिन उसे कमजोर किया जा रहा है।
दरअसल भाजपा ने राजनीति को सत्ता केंद्रित कर दिया है औऱ वह राज्यसभा की सीटें ही नहीं, राज्यों की सत्ता भी हथियाने से गुरेज नहीं करती। आखिर हाल के बरसों में मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार और महाराष्ट्र की महाअघाड़ी सरकारों को गिराकर उसने सत्ता हथियाई ही थी।
महज 12 बरसों में भाजपा की आर्थिक ताकत जिस तरह से बढ़ी है, उसने चुनावी राजनीति को लेवल प्लेइंग फील्ड भी नहीं रहने दिया है। ऐसा लगता है कि चाल, चरित्र और चिंतन की दुहाई देने वाली भाजपा ने अनैतिकता का ऊंचा पहाड़ खड़ा कर खेल के सारे नियम अपनी मर्जी से तय कर लिए हैं। वरना, तो राज्यसभा चुनावों में अमूमन स्थिति साफ ही होती थी, क्योंकि सबको पता होता था कि किस दल के कितने विधायक हैं।
दरअसल ये नतीजे विपक्ष के लिए एक बड़ा सवाल हैं, उनकी तमाम कमजोरियों के बावजूद, कि वह भाजपा जैसी असीमित ताकत वाली चुनावी मशीनरी से किस तरह लड़ेंगे।











