देश में लागू हुआ नया लेबर कोड, श्रमिक संगठनों और विपक्ष में उबाल

New Labour Codes

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने देश के श्रम कानूनों में बड़े बदलाव करते हुए 29 पुरानी श्रम कानून को खत्म कर चार नई श्रम संहिता (New labor code) लागू किए हैं। जिसको लेकर मजदूर संगठनों और विपक्ष में जबरदस्त उबाल है।

सरकार द्वारा जो नए कोड लागू किए गए हैं इनके नाम हैं-वेज कोड 2019, औद्योगिक संबंध कोड 2020, सामाजिक सुरक्षा कोड 2020 और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020। इन कोड के तहत वेतन, काम के घंटे, छुट्टियां, नौकरी सुरक्षा, नियुक्ति पत्र, सामाजिक सुरक्षा, ग्रेच्युटी, ओवरटाइम, ठेका कर्मचारियों और गिग वर्कर्स से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव किए गए हैं।

सरकार का दावा है कि इससे रोजगार में पारदर्शिता और श्रमिकों को अधिकार मिलेंगे, जबकि ट्रेड यूनियन इसे पूंजीपतियों के हित में बनाया गया कानून बता रही हैं। यह कानून देशभर में लागू होने की प्रक्रिया के साथ 2025 से चरणबद्ध रूप से प्रभावी हो रहा है। केवल rss से जुड़े भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर सभी श्रमिक संगठनों ने इसकी आलोचना की है।

ट्रेड यूनियनों की राह के ख़िलाफ़ क़ानून

केंद्र सरकार ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के तुरंत बाद केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की सामूहिक राय को अनसुना करते हुए 21 नवंबर 2025 से चारों श्रम संहिताओं को लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। ये संहिताएँ श्रमिकों के हितों पर सीधा प्रहार करती हैं और श्रमिकों को और अधिक क्रूरता से गुलाम बनाकर उनका शोषण करने का लक्ष्य रखती हैं।

परिणामस्वरूप, 30 दिसंबर 2025 को केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने चारों श्रम संहिताओं के लिए केंद्रीय नियमों का मसौदा प्रकाशित किया। अब, जैसा कि उम्मीद थी, हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों की घोषणा के तुरंत बाद, केंद्र सरकार ने 8 मई 2026 को चारों श्रम संहिताओं के लिए अंतिम केंद्रीय नियमों की अधिसूचना जारी कर दी है।

क्या कहती है सीटू

CITU का कहना है कि मजदूरों के अधिकार खत्म किए जा रहे हैं। लेबर कोड्स लागू करना एकाधिकारवादी कॉर्पोरेट वर्ग की बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आम लोगों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को कुचलना है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध का अधिकार और सामूहिक संघर्ष को दबाने के लिए यूएपीए, पीएमएलए और नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

सरकार फासीवादी तरीके से पूरे सिस्टम को अत्यधिक अधिकारवादी बना रही है ताकि प्रो-कॉर्पोरेट नीतियों के खिलाफ कोई विरोध न हो सके। अब मजदूरों और यूनियनों की सामूहिक शिकायत या संघर्ष को BNS की धारा 111 के तहत “संगठित अपराध” मानकर गैर-जमानती जेल और पुलिस कार्रवाई की जा रही है। कई राज्यों में यूनियन नेताओं और कार्यकर्ताओं पर ऐसे मुकदमे पहले ही दर्ज किए जा चुके हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का कड़ा बयान

कांग्रेस ने सोमवार को केंद्र सरकार पर जमकर हमला किया। पार्टी ने कहा कि सरकार ने चारों श्रम संहिताओं के अंतिम नियम लागू कर दिए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि ये नए श्रम कानून आजादी के बाद से मजदूरों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला हैं।

एक बयान में, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि मोदी सरकार ने अपने विशिष्ट कायरतापूर्ण तरीके से, विधानसभा चुनाव समाप्त होने का इंतजार किया। फिर 8 और 9 मई, 2026 को राजपत्र अधिसूचनाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से चार ‘श्रमिक विरोधी’ श्रम संहिताएं अधिसूचित कीं।

खरगे ने अपने बयान मे 5 मांगे उठाई हैं और ये हैं –

1 मनरेगा योजना की बहाली और इसे शहरी क्षेत्रों तक विस्तारित करना।
2पूरे देश में न्यूनतम मजदूरी 400 रुपये प्रतिदिन सुनिश्चित करना, जिसमें मनरेगा मजदूरी भी शामिल हो।3 स्वास्थ्य का अधिकार कानून लाना, जिसके तहत 25 लाख रुपये तक की यूनिवर्सल स्वास्थ्य कवरेज प्रदान की जाए।
4 सभी असंगठित श्रमिकों के लिए व्यापक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना, जिसमें जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा और अन्य सुविधाएं शामिल हों।
5सरकारी विभागों के कोर कार्यों में ठेकेदारी प्रथा को समाप्त करने की प्रतिबद्धता तथा मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों को कमजोर करने वाले संशोधनों की समीक्षा करना।

कहा कि मोदी सरकार ने बिना किसी परामर्श के इन ‘श्रमिक विरोधी’ कानूनों का मसौदा तैयार किया और उन्हें लागू किया। आगे आरोप लगाया कि 2015 के बाद से भारतीय श्रम सम्मेलन का आयोजन तक नहीं किया गया है। ये संहिताएं, जिनसे केवल प्रधानमंत्री के उद्योगपति मित्रों को ही लाभ होता है। स्वतंत्रता के बाद से श्रमिकों के अधिकारों के लिए सबसे बड़ा झटका हैं। खरगे ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के श्रमिकों के लिए अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ संकल्पित है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का यह भी कहना है, ‘राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी 400 रुपये प्रतिदिन हो, जिसमें मनरेगा भी शामिल है। 25 लाख रुपये कवरेज का सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करने वाला स्वास्थ्य का अधिकार कानून हो और जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा सहित सभी असंगठित श्रमिकों के लिए व्यापक सामाजिक सुरक्षा हो।’खरगे ने कहा, ‘‘मुख्य सरकारी कार्यों में रोजगार का संविदाकरण रुकना चाहिए और मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों को कमजोर करने की समीक्षा होनी चाहिए।’’

सरकार के दावे

सरकार का दावा है कि इन नए लेबर कोड्स का असर सीधे तौर पर कामकाजी लोगों पर पड़ेगा। इनमें काम के घंटे, न्यूनतम वेतन, और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा गया है। सरकार का दावा है कि इन कोड्स का उद्देश्य कामकाजी माहौल को बेहतर बनाना और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।सरकार ने सभी हितधारकों के साथ बैठकें करके नए नियमों को अंतिम रूप दिया है । सरकार का कहना है नए लेबर कोड्स के तहत कर्मचारियों को कई लाभ मिलेंगे। इनमें वर्किंग आवर्स की सीमाएं, ओवरटाइम पेमेंट, और विभिन्न भत्तों की बेहतर स्थापना शामिल है। इससे श्रमिकों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा और उनकी कार्यक्षमता में सुधार होगा। यह बदलाव कामकाजी जीवन को और अधिक संतुलित बनाएगा।सरकार का दावा है कि इन लेबर कोड्स के लागू होने से भारतीय श्रम बाजार में एक नया अध्याय खुल जाएगा। यह कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच की दूरी को कम करने में सहायक होगा। समय के साथ, ये नियम कार्यस्थल पर सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने में मदद करेंगे।

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