पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच टकराव मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद के समय से चल रहा है और चुनावों के ऐलान के बाद से यह बेहद कटु स्तर पर पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस की पहल पर संसद में विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने का नोटिस दे रखा है, तो दूसरी ओर चुनावों के ऐलान के कुछ घंटे के भीतर ही चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीडीपी सहित 50 से अधिक अफसरों के तबादले कर दिए!
जाहिर है, यह अभूतपूर्व स्थिति है, और हाल के दशकों में याद नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग द्वारा किसी चुनाव में एक राज्य में इतनी बड़ी संख्या में शीर्ष अधिकारियों के तबादले किए गए हों। चुनाव के समय सरकारी मशीनरी चुनाव आयोग के अधीन हो जाती है, लेकिन जिस तरह से ये तबादले हुए हैं, उसने अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है। बंगाल के साथ जिन अन्य राज्यों तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में चुनाव हो रहे हैं, वहां इतने तबादले नहीं किए गए हैं।
यही नहीं, एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान भी राज्य सरकार और चुनाव आयोग आमने-सामने थे और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही यह प्रक्रिया पूरी हो सकी। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग ने मनमाने ढंग से मतदाताओं के नाम काटे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भबानीपुर क्षेत्र से 47 हजार लोगों के नाम काटे गए हैं।
यह दिखाता है कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास का कितना गहरा संकट है। शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करते समय ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर भाजपा का ‘तोता’ होने का आरोप तो लगाया ही है, अधिकारियों के तबादलों को लेकर तीखा हमला करते हुए इसे ‘अघोषित इमरजेंसी’ और ‘अघोषित राष्ट्रपति’ शासन तक करार दिया।
दूसरी ओर काफी शोर-शराबे के बाद चुनाव आयोग ने कुछ आईपीएस के दूसरे राज्यों में किए गए तबादलों पर रोक लगा दी है, लेकिन इससे उसकी कार्यप्रणाली को लेकर संदेह गहरा होता है। अब या तो ये तबादले दबाव में किए गए थे या उन्हें रोकने का फैसला दबाव में लिया गया?
बेशक, ममता बनर्जी के निशाने पर केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा है, जिनकी नजर बंगाल पर है। आरएसएस और भाजपा लंबे समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता चाहते हैं, लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों से ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें रोक रखा है। काफी शोर-शराबे और हर तरह के हथकंडों के बावजूद भाजपा का तृणमूल के सफाए को लेकर दिया गया नारा ‘इक्कीस में साफ’ ( उन्नीस में हाफ इक्कीस में साफ) नहीं चल पाया था। ममता दीदी की अगुआई में तृणमूल का ‘खेला’ चल गया था।
मगर बीते पांच वर्षों में तृणमूल और भाजपा के बीच टकराव बढ़ता ही गया है। वैसे यह कोई अकेला चुनाव नहीं है, जब भाजपा सत्ता हासिल करने या कायम रखने के लिए किसी भी स्तर पर जाने से गुरेज नहीं करती। सीबीआई, ईडी और अन्य जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के जरिये उसने विरोधी पार्टियों को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।
दरअसल सवाल चुनाव आयोग की भूमिका का है। चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है और उसकी नजर में सभी राजनीतिक दल बराबर होने चाहिए। मगर पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य असम में उसका पैमाना अलग नजर आ रहा है। वहां चुनावों के ऐलान से ऐन पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व शर्मा ने खुलेआम ऐलान किया कि कांग्रेस की 30 फीसदी टिकटें वह बांटेंगे!
यह पूरी संवैधानिक व्यवस्था को खुली चुनौती है। और चुनाव के ऐलान के तुरंत बाद जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे और अभी सांसद प्रद्युत बोरदोलाई ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा, वह कोई चुनाव के समय पार्टियों के बीच होने वाली आम आवाजाही नहीं है।
मगर असम को लेकर चुनाव आयोग की ऐसी कोई सख्ती नजर नहीं आती, जैसी उसने पश्चिम बंगाल में दिखाई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्षता का लाख दावा करें, लेकिन पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है, उसने चुनाव आयोग की साख को और कमजोर ही किया है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका एक नियामक की है, जनमत का फैसला जनता के हाथों में ही रहना चाहिए।











