नई दिल्ली। केरल के राज्य-वित्त पोषित विश्वविद्यालयों के तीन कुलपतियों ने कांग्रेस-नेतृत्व वाली वी.डी. सतीशन सरकार और विपक्षी सीपीआई(एम) की भारी आलोचना को आमंत्रित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में भाग लिया, जिसे संघ प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने संबोधित किया। अब केरल सरकार उनसे माफी मांगने को कह रही।
केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, त्रिशूर के डॉ. मोहन कुन्नुम्मल, महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के प्रमुख मावूथु डी,और थुंचथ एझुथाचन मलयालम विश्वविद्यालय, मलप्पुरम के प्रभारी डॉ. सी.आर. प्रसाद; 13 जून को तिरुवनंतपुरम में आयोजित आरएसएस शताब्दी वर्ष व्याख्यान के फ्रंट-रो में बैठे थे। विशेष आमंत्रित अतिथियों की सूची राज्य आरएसएस नेतृत्व द्वारा तैयार की गई थी। जिसको लेकर मुख्यमंत्री सतीशन ने कुलपतियों पर तीखी टिप्पणी की।
मुख्यमंत्री सतीशन ने कहा, ‘उन्हें सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई है। सरकार देखेगी कि ऐसे कृत्यों को रोकने के लिए क्या कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें कुलपति आरएसएस कार्यकर्ताओं के स्तर तक गिर गए हैं।’
उनके कैबिनेट सहयोगी, गृह मंत्री रमेश चेन्निथला और उच्च शिक्षा मंत्री रोजी एम. जॉन ने भी कुलपतियों की आरएसएस कार्यक्रम में मौजूदगी पर सवाल उठाए।
कुन्नुम्मल की नियुक्ति 2019 में पिनारायी विजयन-नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार के कार्यकाल में हुई थी, जिसमें कांग्रेस की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था। मावूथु पहले कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के निदेशक थे। प्रसाद ने पहले तिरुवनंतपुरम के केरल विश्वविद्यालय में केरल स्टडीज विभाग का नेतृत्व किया था।
विपक्ष के नेता पिनारायी विजयन ने इस घटना के लिए सरकार को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा है कि यूडीएफ सरकार उच्च शिक्षा में आरएसएस विचारधारा को आत्मसात करने के लिए बहुत ज्यादा झुक रही है। यह भाजपा के साथ सक्रिय सहयोग का मामला है, केरल चुनावों में कांग्रेस की जीत में सहायता के लिए शुक्रिया अदा करना।”
भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री और विधायक वी. मुरलीधरन ने कांग्रेस और सीपीआई(एम) पर राजनीतिक असहिष्णुता” का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आरएसएस कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है और विश्वविद्यालय के नियमों में ऐसे कार्यक्रमों में भागीदारी पर कोई रोक नहीं है। हालांकि मुद्दा राजनीतिक रूप से उबाल पर है, लेकिन सतीशन सरकार तकनीकी रूप से कुलपतियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। यह केवल राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में है, जो राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं।
इस बीच, सरकार ने 1998 बैच के आईएएस अधिकारी बी. अशोक को उच्च शिक्षा के प्रमुख सचिव के रूप में नियुक्त किया है। उनकी सेवा नियमों के उल्लंघन पर विजयन सरकार द्वारा निलंबन इस महीने रद्द कर दिया गया था।केरल में 20 विश्वविद्यालय हैं—15 राज्य-चालित, एक केंद्रीय और चार तकनीकी। उच्च शिक्षा में नियुक्तियां राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रही हैं, जिस पर सरकारें और राज्यपाल बार-बार टकराव में रहे हैं।
सत्ताधारी दल द्वारा राज्यपालों पर विश्वविद्यालयों के मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया जाता रहा है। विजयन सरकार ने 2019-2025 तक के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को कुलाधिपति पद से हटाने का असफल प्रयास किया था। खान ने कई कुलपतियों को उनकी योग्यता पर सवाल उठाकर हटा दिया था।वाम मोर्चा सरकार पर विपक्ष ने पार्टी समर्थकों को कुलपति बनाने का आरोप लगाया था। कांग्रेस से जुड़े व्यक्तियों वाली सेव यूनिवर्सिटी कैंपेन कमेटी ने ऐसी नियुक्तियों और शैक्षणिक परिषदों के खिलाफ अभियान चलाए थे।









