कर्नल सोफिया कुरैशी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध जाकर विजय शाह को संरक्षण देने का एमपी कैबिनेट का फैसला

नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी (Sofia Qureshi)पर विवादित बयान देने वाले मध्य प्रदेश सरकार के जनजातीय मंत्री विजय शाह के मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने चौंकाने वाला निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और एसआईटी रिपोर्ट के बावजूद कैबिनेट ने विजय शाह पर केस चलाने की मंजूरी न देने का फैसला किया है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए गए अपने कथित विवादित बयान को लेकर घिरे जनजातीय मंत्री विजय शाह के मामले में राज्य सरकार के इस निर्णय की पुरजोर आलोचना हो रही है।

मंगलवार को हुई रूटीन कैबिनेट बैठक के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके मंत्रिमंडल ने विजय शाह का पूरी तरह समर्थन करने का फैसला किया है, जिससे यह मामला और अधिक पेचीदा हो गया है।

अधिकारियों को बाहर कर लिया निर्णय

मंगलवार की कैबिनेट बैठक खत्म होने के बाद एक गुप्त और रणनीतिक सत्र चलाया गया। बैठक कक्ष से मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल, सीएम के अपर मुख्य सचिव नीरज मंडलोई, गृह विभाग के एसीएस संजय शुक्ला, जीएडी के एसीएस शिवशेखर शुक्ला और लॉ सचिव मुकेश कुमार, इन 5 वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़कर बाकी सभी अधिकारियों को बाहर भेज दिया गया।

इसके बाद एसआईटी (SIT) की रिपोर्ट के आधार पर मंत्री विजय शाह को कक्ष में बुलाया गया, जहां उन्होंने मंत्रियों के सामने अपनी सफाई पेश की। सफाई देने के बाद शाह को कक्ष से बाहर कर दिया गया और उनके बाहर खड़े रहने के दौरान करीब पौन घंटे तक कानूनी पहलुओं और उन्हें बचाने के तर्कों पर गहन चर्चा हुई। अंततः यह सहमति बनी कि विजय शाह पर केस चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

माफी मांगने का बेतुका तर्क

बैठक के दौरान अधिकांश मंत्रियों का यह तर्क था कि मंत्री विजय शाह अपने बयान के बाद सार्वजनिक रूप से तीन-चार बार माफी मांग चुके हैं, इसलिए अब इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं बनता। एसआईटी की रिपोर्ट कैबिनेट के सामने रखने से पहले सरकार ने अटॉर्नी जनरल (AG) की कानूनी राय भी ली थी।हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा कानूनी पहलू यह है कि मामले में 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है, जहां राज्य सरकार को हलफनामा देकर यह बताना था कि एसआईटी की ओर से केस चलाने की मंजूरी मांगे जाने पर उसने क्या कदम उठाया है।

कैबिनेट के इस निर्णय के मिनट्स अब मुख्यमंत्री के पास जाएंगे, जो इसे राज्यपाल मंगुभाई पटेल के पास भेजेंगे।

अब राज्यपाल के पाले में गेंद

इस हाई-प्रोफाइल मामले में आगे क्या होगा, यह काफी हद तक राज्यपाल के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा के अनुसार, वर्ष 2003 के एक अन्य चर्चित मामले राजेंद्र सिंह प्रकरण में भी ऐसा ही वाकया सामने आया था, जहां कैबिनेट ने केस की मंजूरी नहीं दी थी लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने इसके उलट फैसला लिया था और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि ऐसे मामलों में राज्यपाल का मत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अब राज्यपाल मंगुभाई पटेल तय करेंगे कि कैबिनेट के फैसले को बरकरार रखा जाए या अनुमति दी जाए, जिसके बाद 31 अगस्त को सर्वोच्च अदालत में होने वाली सुनवाई इस मामले का भविष्य तय करेगी।

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