दिल्ली के बहुचर्चित आबकारी नीति घोटाले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपियों को बरी करते हुए जांच एजेंसियों के तौर-तरीकों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
विशेष जज जितेंद्र सिंह ने इस मामले की जांच एजेंसी सीबीआई पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसने साजिश की कहानी गढ़ी। वास्तव में एक समय राजधानी दिल्ली सहित देश की सियासत पर भूचाल ला देने वाले इस मामले का प्री ट्रायल के दौरान जैसा हश्र हुआ है, उसने केंद्र सरकार के नियंत्रण में काम करने वाली तमाम जांच एजेंसियों को संदेह के दायरे में ला दिया है।
उल्लेखनीय है कि यह मामला नवंबर 2021 में दिल्ली की तत्कालीन केजरीवाल सरकार द्वारा आबकारी नीति से जुड़े नियमों में किए गए बदलाव से जुड़ा था। दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने नीति में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए मामला सीबीआई कौ सौंप दिया था।
हालत यह हो गई कि इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री केजरीवाल को जेल जाना पड़ा और पद छोड़ना पड़ा। उनके साथ ही उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भी पद छोड़ना पड़ा और दो साल जेल में बिताने पड़े। इसके अलावा आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह यहां तक कि कथित शराब घोटाले के दक्षिण भारतीय कार्टेल के नाम पर तेलंगाना की सांसद रहीं के कविता तक को जेल जाना जाना पड़ा।
यह मामला किस मनमाने ढंग से चलाया गया इसका पता इसी से चलता है कि कोर्ट ने दक्षिण भारतीय कार्टेल जैसे आरोप को सिरे से खारिज कर दिया।
दरअसल यह मामला नीतिगत फैसले से जुड़ा था। सरकारें आम तौर पर शराब दुकानों के आवंटन से लेकर खदानों तक के आंवटन के लिए नीतियां बनाती हैं। इस मामले में दरअसल ठीक उसी तरह से अनुमानित नुकसान को भ्रष्टाचार से जोड़ा गया जैसा कि यूपीए सरकार के समय कोयला खदानों और टू जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के समय पहले आओ पहले पाओ की नीति को कई लाख करोड़ रुपये के अनुमानित नुक्सान के आधार पर बड़ा मुद्दा बनाया गया।
छत्तीसगढ़ का कथित शराब घोटाला भी पिछली भूपेश बघेल सरकार के नीतिगत फैसले से ही जुड़ा है, बेशक यह मामला अभी अदालत में है।
दोहराने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार पर कोयला और टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोप लगाने में अरविंद केजरीवाल ही सबसे आगे थे। चाहे केजरीवाल सरकार का कथित घोटाला हो या मनमोहन सरकार के समय का कथित कोयला और टू जी घोटाला, इसमें जिस तरह से जांच एजेंसियों का राजनीतिक कारणों से इस्तेमाल किया गया है, वह चिंता कारण होना चाहिए।
यह हमारे लोकतंत्र का तकाजा है कि नीतिगत फैसलों की आड़ में किसी तरह का भ्रष्टाचार किया जाए तो किसी को भी बख्शना नहीं चाहिए। मगर हाल के बरसों में सीबीआई, एनआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियां जिस तरह काम कर रही हैं, उसमें उनके राजनीतिक इस्तेमाल का संदेह पुख्ता ही होता है।
यदि दिल्ली के कथित शराब घोटाले में अदालत यह मान रही है कि पूरी कहानी बनाई गई तो यह सचमुच चिंता की बात है। इससे ऐसे आरोप सही लगते हैं कि असहमति और विपक्ष की आवाजों को दबाने के लिए इन एजेंसियों का दुरुपोयग किया जा रहा है। आखिर बहुचर्चित भीमा कोरेगांव वाले मामले में यह आरोप सामने आए ही हैं कि आरोपियों के कंप्यूटर तक में संदिग्ध सामग्री प्लांट की गईं!
सबसे बुरा हाल तो प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का है, जिसके बारे में खुद सरकार संसद में मान चुकी है कि पिछले एक दशक के दौरान ईडी के 193 मामलों में सिर्फ दो में ही सजा हो सकी है! यह भी दोहराने की जरूरत नहीं कि ईडी के 98 फीसदी मामले विपक्षी दलों और उनके नेताओं से जुड़े हुए हैं।
बेशक, सीबीआई अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों को बरी किए जाने वाले फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंच गई है। बरसों पहले सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे का तोता बताया था। इसके बावजूद सीबीआई के तौर-तरीके नहीं बदले हैं, तो इसे संस्थागत क्षरण की तरह ही देखना चाहिए।
दरअसल सीधा सवाल इन तमाम एजेंसियों की स्वायत्तता का भी है, पर क्या इसके लिए सरकार तैयार है?











