कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने पिछली भाजपा सरकार के वर्ष 2022 के आदेश को रद्द कर दिया है। अब राज्य के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूल-कॉलेजों में छात्रों को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, शिव माला और रुद्राक्ष जैसी आस्था से जुड़ी सीमित प्रतीकों को पहनने की अनुमति दे दी गई है। यह नया आदेश अगले शैक्षणिक सत्र से लागू होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म की मूल भावना को प्रभावित नहीं करने चाहिए और अनुशासन, सुरक्षा या छात्र की पहचान में बाधा नहीं डाल सकते।
राज्य सरकार के मंत्री प्रियंक खरगे ने कहा, ‘हमने ड्रेस कोड वापस नहीं लिया। हम सिर्फ संविधान में दिए गए धार्मिक अधिकारों को समान स्थान दे रहे हैं। पगड़ी, कड़ा, तिलक, भस्म, कलावा या हेडस्कार्फ ये सब संवैधानिक अधिकार हैं।’
प्रियंक खरगे ने भगवा शॉल को धार्मिक प्रथा नहीं मानते हुए कहा, ‘भगवा शॉल कोई धार्मिक प्रथा नहीं है। भाजपा को शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। अगर उन्हें आपत्ति है तो अदालत जा सकते हैं।’ जमात-ए-इस्लामी हिंद के राज्य सचिव मोहम्मद यूसुफ कन्नी ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि विविधता में एकता भारत की ताकत है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि सिर ढंकना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है, सिर्फ उसका नाम हिजाब है। अगर इसे घूंघट कहा जाए तो किसी को दिक्कत नहीं होती।
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने कहा कि कई घटनाओं में छात्रों को जनेऊ हटाने या हिजाब उतारने को कहा गया था, जो शिक्षा में बाधा बन रही थी। उन्होंने कहा, “बच्चों की पढ़ाई किसी भी तरह की अड़चन से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।”
यह फैसला 2022 के उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज में शुरू हुए हिजाब विवाद के करीब साढ़े तीन साल बाद आया है। उस समय भाजपा सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध लगाया था। 2022 में इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखा था, लेकिन मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। विपक्षी भाजपा ने इस फैसले को ‘वोट बैंक की राजनीति’ और ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ बताया है।










