शैलेंद्र कुमार मिश्र
मानव की प्रगति का समग्र इतिहास असमानता और अज्ञानता के विरूद्ध प्रतिरोध की लेखनी से लिपिबद्ध है। इस प्रतिरोध को साहसिक स्वर एवं सृजनात्मक दिशा देने वाले व्यक्तित्व ही अविस्मरणीय महापुरूष के रूप में समादृत हुए। कबीर भारत के इन्हीं कालजयी महापुरूषों में से एक हैं। कबीर की वाणी आज भी असमानता, अंधविश्वास एवं अन्याय के विरूद्ध सर्वाधिक प्रखर आवाज के रूप मे सुनाई देती है और विकृतियों के विरूद्ध संघर्षरत लोगों के मनोबल को बढाती है- उन्हें प्रेरणा शक्ति और दृष्टि पथप्रदर्श करती है। कबीर का व्यक्तित्व सृजनात्मक प्रतिरोध का प्रतीक है। कबीर के प्रतिरोध में ध्वंस नहीं, सृजन का लक्ष्य है। कबीर रचनात्मक प्रतिरोध के द्रष्टा हैं।
कबीर की इस सृजनात्मक प्रतिरोध की शक्ति के निर्माण में सत्य के प्रति उनकी अनमनीय निष्ठा तथा निजी जीवन में उनके आत्म संघर्ष निर्णायक भूमिका है। इसीलिए कबीर प्रतिरोध की मशाल हाथ में लिए अपने पीछे आने के लिए सत्यानुयायियों का आवाहन कर सके-
’’कबिरा खड़ा बजार में, लिये लुकाठा हाथ ।
जो घर फूकै आपना, चले हमारे साथ’’।
कबीर पन्द्रहवीं शताब्दी में उत्तरभारत में काशी में पैदा हुए। जीवन की शुरुआत उपेक्षा से हुई और पूरा जीवन संघर्ष का प्रतीक बना रहा। मां-बाप का पता नहीं, जाति का पता नहीं, जननी नें लोक लाज के मारे पैदा होते ही लहरतारा तालाब के किनारे फेक दिया। मुसलमान दम्पति ने पाला, जुलाहे की आजीविका से भरण-पोषण किया। साधारण जिंदगी से भी बदतर जिंदगी गुजारी। पंडितों की काशी में जुलाहे के लड़के को पढ़ने का भला अधिकार कहां मिलता।
गुरू रामानंद से दीक्षा भी सहजता से कैसे मिल सकती थी- दीक्षा भी सीधे ढंग से नहीं, और बड़ी कठिनाई से पाई। प्रकृति ने ऐसे बालक को ही कबीर (महान) बनाने का निश्चय किया। अपढ़ एवं उपेक्षित कबीर को प्रकृति से ही नैसर्गिक प्रतिभा और क्रांतिदर्षी-चेतना प्राप्त थी। आत्मसंघर्ष ने प्रतिभा की धार को और अधिक चमका दिया। कबीर के पास बिना किसी घुमाव-फिराव और लाग-लपेट के अपनी बात कहने का साहस था। उनके पास अनुभूत सत्य के पक्ष में खड़े होने की दुर्दमनीय जिजीविशा के साथ लक्ष्य पर सीधी चोट करने का सामर्थ्य था। उनके पास नैसर्गिक विवेक और अकुंठ तर्क की ऐसी मशाल थी जो विरोध के प्रबल अंधड़ में भी अविचलित एवं अमन्द थी। इसीलिए कबीर की अनुभवशून्य एवं ज्ञानशून्य पंडितों, मौलवियों एवं समाज के ठेकेदारों से कभी नहीं बनी।
कबीर अनुभव एवं ज्ञान के प्रकाश में उलझनों को सुलझाना चाहते थे-
’’तेरा मेरा मनवा कैसे एक होइ रे,तू कहता कागज की लेखी,मैं कहता निज आंखन देखी ।
मैं कहता सुरझावन हारी । तू कहता उरझाई रे’’ ।
वस्तुतः कबीर ने अपनी जिजीविषा की शक्ति से अपनी पीड़ाओं को सामर्थ्य में रूपान्तरित कर दिया। कबीर ने हतभाग्य होने का रूदन करने के बजाय अपने आत्म संघर्ष प्रसूत अनुभवों की आंच में अपने को इतना परिपक्व किया कि वह मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के इतने तेजस्वी प्रकाश पिंड बनकर उभरे कि उनका तेज पांच सौ वर्ष बाद भी वर्तमान पीढ़ी को उजाला प्रदान कर रहा है। कबीर ने अपने समय के संकटों को सटीक ढंग से पहचाना, उनका तार्किक विश्लेषण किया, और उनका युक्तिसंगत समाधान परोसा।
कबीर भारतीय मध्यकालीन युग में उत्पन्न पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने धर्म के अर्थ को व्यापकता में लिया और उसके मर्म को गहराई में जाकर समझा। केवल कबीर ही समझ पाये कि धर्म की अवधारणा वैयक्तिक अनुभूति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक संरचना के आयामों का एक निर्णायक घटक है, जो समाज के स्वरूप एवं दिशा का निर्धारण करता है। उनका लक्ष्य समाज को धर्म की एक नई संजीवनी देकर उसे मरने से बचाना था। इसलिए कबीर ने अपनी संपूर्ण ऊर्जा एक ऐसे धर्म को प्रशस्त करने में खपा दी जो तर्कयुक्त हो, विवेकसम्मत हो तथा समावेशी हो।
कबीर का एक मात्र लक्ष्य एक ऐसे धर्म को खड़ा करना था, जो समता के मूल्य पर प्रतिष्ठित हो। वह एक ऐसा धर्म हो जो सामाजिक न्याय को सामाजिक संस्कार में रूपांतरित कर दे। वह ऐसा धर्म हो जो समाज में व्याप्त विद्वेश की ताकतों को क्षीण कर भावात्मक सह अस्तित्व के किनारों के बीच समाजिक प्रेम की सरिता के रूप मे प्रवाहित हो। वह एक ऐसा धर्म हो जिसमे अमीर-गरीब, ब्राम्हण-शूद्र, स्त्री-पुरूष, अपढ़-विद्वान, हिन्दू-मुसलमान सभी के लिए जगह हो और पूरी बराबरी की जगह हो।
वस्तुतः कबीर एक ऐसे धर्म के लिए लड़ रहे थे, जिसमें समाज के सभी सदस्य समानता, स्वतंत्रता, पारस्परिक बंधुत्व एवं आपसी प्रेम के भाव में अपने जीवन को जीते हुए पाएं। इसलिए कबीर की वाणी में उन सभी के लिए तिक्तता, कटुता, उपालम्भ तथा आक्रामकता दीखती है, जो गैर बराबरी को जायज ठहराते हैं तथा सामाजिक असमानता को दैवी विधान बताते हैं- ’’एक नूर से सब उपजाया, को बाभन को सूदा’’।
अंधविश्वास प्रेरित विद्वेश-विभाजित समाज में कबीर मानवजाति को एक ऐसा धर्म देना चाहते थे, जिसमें मनुष्य केवल मनुष्यबोध में जीना सीख ले। वह एक ऐसे धर्म का अन्वेषण कर रहे थे, जिसको अपनाकर मनुष्य समस्त समाज आरोपित उपाधियों से मुक्त हो जाए। उनका लक्ष्य एक ऐसे नूतन धर्म को ढूंढ़ना था जो मनुष्य को उसकी आत्मा तक पहुंचाने में मदद करे। इसलिए कबीर ने अपने निर्गुणपंथ का मार्ग निकालकर एक ऐसे धर्म का भवन खड़ा किया, जो स्वतंत्रता, समानता, शुद्ध आचरण और विशुद्ध प्रेम की आधारशिला पर प्रतिष्ठित है। इसलिए कबीर की वाणी में कविताई का रस नहीं है। उनकी पूरी वाणी एक चीत्कार है, एक फटकार है। उसमें एक प्रहरी का आक्रोश है और सत्य का साक्षात्कार कराने की छटपटाहट है-
’’सुखिया यह संसार है, खांवै अरू सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रौवै’’।
वंचना के दंश से आजीवन संर्घषरत कबीर वंचित मानव जाति को वंचना का शिकार बनने से रोकना चाहते थे। इसलिये भगवान के नाम पर जिन ताकतों ने वंचना का जाल फैलाने का उद्यम या समर्थन किया उनका कबीर ने पर्दाफाश किया और वंचितों के पक्ष में डटकर खडे़ हुए। ब्राम्हणवाद, पुरोहितवाद और मुल्लावाद की जबरदस्त धुलाई करते हुए कबीर ने धर्म का एक ऐसा राजपथ निकाला जिस पर नीची जातियों और स्त्रियों को भी समानता के साथ चलने का अधिकार मिला।
कबीर की वाणी वस्तुतः भारतीय समाज के वंचितों को आत्मसम्मान प्रदान करने का प्रयत्न है। यही कारण है कि कबीर के समय में और उनके बाद बहुत तेजी से कबीर पंथ भारत में फैला और उनका पंथ आज भी भारत की दलित, वंचित, शोषित एवं उपेक्षित जातियों की प्रमुख धर्म-साधना- पथ बना हुआ है। हिन्दू धर्म के संस्थापित ढांचे में आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक समानता पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। पुरोहितवाद एवं कर्मकांड से आज भी हिन्दू धर्म सहित अन्य धर्म मुक्त नहीं हो पाये हैं। धार्मिक असहिष्णुता भारतीय बहुसांस्कृतिक समाज के लिए एक बडी चुनौती बनी हुई है।
उत्तर आधुनिक समाज के आगमन के साथ धर्म क्षेत्र भी बहुत तेजी से मुक्त भोगवादिता से संक्रमित हुआ है। इन परिस्थितियों ने कबीर को पहले से भी अधिक प्रासंगिक बना दिया है और समकालीन समाज को एक नए कबीर की तलाश है।
छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश की माटी में आज भी संजायी है कबीर वाणी की महक
कबीर के बारह शिष्यों में धनी धर्मदास कबीर के प्रधान शिष्य थे जिन्हें कबीर ने अपना उत्तराधिकारी बनाया। धर्मदास विन्ध्यक्षेत्र में स्थित बांधवगढ़ के बडे़ सेठ थे, जिन्होंने 1462 ई में अपनी पत्नी के साथ कबीर से दीक्षा ग्रहण की। इन्हीं धनी धर्मदास ने कबीर की समस्त वाणी को ’बीजक’ ग्रंथ में संग्रहीत किया। धर्मदास ने बांधोगढ से चलकर छत्तीसगढ़ में कुदुरमाल, रतनपुर, धमधा तथा कवर्धा होते हुए दामाखेड़ा (वर्तमान बलौदा बाजार जिला) में कबीरपंथ की गद्दी स्थापित की। कबीर एवं धर्मदास के बीच जो आध्यात्मिक संवाद हुआ उसकी धर्मदास द्वारा रचित पांडुलिपि आज भी दामाखेड़ा में उपलब्ध है। धर्मदास के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आगमन के पश्चात कबीरपंथ की पांच गद्दियां-कुदुरमाल, रतनपुर, धमधा, कवर्धा तथा दामाखेडा में स्थापित हुईं और कबीर पंथ का एक बड़ा वर्ग छत्तीसगढ में निर्मित हुआ। इन्हीं धर्मदास को छत्तीसगढ़ का प्रथम संत कवि तथा उनकी पत्नी आमिनमाता को छत्तीसगढ की प्रथम कवयित्री माना जाता है। धर्मदास ने अत्यन्त लालित्यपूर्ण एवं सरस शैली में छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी वाणी को लिपिबद्ध कर कबीर साहित्य को समृद्ध किया है। धर्मदास की रचना
’’पिजरा तेरा झीना, पढ़ ले रे सतनाम सुवा,’’ आज भी छत्तीसगढ़ की जनता के कंठ में समाई हुई है।
- लेखक, हेमचंद विश्वविद्यालय, दुर्ग, छत्तीसगढ़ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं










