जज स्वामीनाथन की टिप्पणी गैरजरूरी

February 25, 2026 5:12 AM
Justice Swaminathan controversial statement

भारत में न्यायपालिका लोगों की आखिरी उम्मीद है, और ऐसे में अपेक्षा तो यही की जाती है कि न्यायपालिका से जुड़े प्रबुद्ध जज देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ ही हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेंगे। मगर हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने ऐसी टिप्पणी की है, जो न तो उनके पद की गरिमा के अनुकूल है और न ही संविधान में निहित भावना के।

जस्टिस स्वामीनाथन ने होसुर सत्संग के गुरु वंदनम उत्सव में कहा कि जो लोग गुरुओं को ईश्वर के समान मानने वालों को मूर्ख, अयोग्य और बर्बर कहते हैं, वही वास्तव में अयोग्य, मूर्ख और बर्बर हैं।

भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों न हों। यही नहीं, भारतीय संविधान किसी व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने को बाध्य नहीं करता। जस्टिस स्वामीनाथन सनातन के प्रति अपनी आस्था का इजहार करते हैं, लेकिन इसके साथ ही वह हाई कोर्ट के जज होने के नाते हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों के रक्षक भी हैं, फिर वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो।

मुश्किल यह है कि जस्टिस स्वामीनाथन पहले भी विवादों में रह चुके हैं। दिसंबर, 2025 में उन्होंने मुदैर की तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी पर दीप जलाने का आदेश दिया था, जिसका राज्य सरकार ने इस आधार पर विरोध किया था कि यह जगह एक ऐतिहासिक दरगाह के नजदीक है और ऐसे कदम से वहां कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। हालत यह हो गई कि उनके खिलाफ विपक्ष ने लोकसभा में महाभियोग चलाने का नोटिस तक दे रखा है।

तकलीफ की बात यह है कि न्यायपालिका अमूमन ऐसे विवादों से दूर रहती है। मगर हाल के बरसों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब जजों ने अपनी धार्मिक आस्था का न केवल खुलेआम प्रदर्शन किया है, बल्कि अपनी सांप्रदायिक सोच को उजागर करने से भी गुरेज नहीं किया। मसलन, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव ने विश्व हिंदू परिषद जैसे कट्टर हिंदूवादी संगठन के कार्यक्रम में शामिल होकर खुलेआम बहुसंख्यक शासन की पैरवी की थी।

आज जब देश में खासतौर से अल्पसंख्यकों को उनकी आस्था के आधार पर निशाना बनाने के मामले सामने आ रहे हैं, तो न्यायपालिका ही उनके लिए आखिरी उम्मीद हैं। सनातन धर्म और हिंदू राष्ट्र के उग्र उद्घोष के बीच क्या यह भूला जा सकता है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे लोकतांत्रिक भारत की कल्पना की थी, जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त होगा।

इस कड़वाहट भरे माहौल को खुद एक जज ने महसूस किया है, जिस पर गौर करने की जररूत है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जव भुयान ने एक कार्यक्रम में एक ऐसा दर्द साझा किया है, जो आज के भारत की हकीकत को बयान करता है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की एक दोस्त को मुस्लिम होने के कारण किराए पर घर देने से इनकार कर दिया गया!

अंदाजा लगाया जा सकता है, जैसा कि जस्टिस उज्जव भुयान ने कहा, हमारी सामाजिक दरारें कितनी गहरी हो चुकी हैं।

बात सिर्फ मुस्लिमों या अन्य अल्पसंख्यकों की नहीं है, दलितों और वंचित तबके के लोगों को ऐसी ही अपमान और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

क्या उम्मीद करें कि मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस स्वामीनाथन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुयान की कही बातों पर गौर करेंगे?

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