राजस्थान के जोधपुर के मनाई गांव में ऐन अपनी शादी के दिन दो बहनों के आत्महत्या कर लेने की खबर बेहद तकलीफ देह होने के साथ ही यही तस्दीक कर रही है कि बेटियों के प्रति संवेदना के मामले में हम एक समाज, एक परिवार और राज्य के रूप में लगातार विफल होते जा रहे हैं।
ये दोनों बहनें 25 और 23 साल की थीं और एक ही परिवार में उनकी शादी तय हुई थी। 21 फरवरी को उनकी बारात आने से पहले उन्होंने कथित तौर पर कोई जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। इसी महीने गाजियाबाद में भी 16, 14 और 12 साल की बहनों के आत्महत्या कर लेने की घटना ने झकझोर कर रख दिया था। इन लड़कियों का तो कथित रूप से दक्षिण कोरियाई ऐप की लत के कारण स्कूल तक जाना छूट गया था। जबकि जोधपुर की दोनों बहनें शिक्षिका थीं।
ये घटनाएं व्यापक रूप से समाज के भीतर लड़कियों और महिलाओं की दशा को ही दिखा रही हैं। ये घटनाएं यह भी दिखा रही हैं कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ सिर्फ एक नारा है और हकीकत से काफी दूर है।
हमने दो दिन पहले यहां गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तावित विवादास्पद कानून पर लिखा था, जिसके जरिये शादी करने वाले युवाओं के लिए अपने माता-पिता की मंजूरी को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान किया जा रहा है। दरअसल इस कानून के बारे में बात करते हुए जिस तरह से गुजरात के उपमुख्यमंत्री ने जिस तरह से नाम बदलकर की जाने वाली शादियों का जिक्र किया था, तो वह एक तरह से लड़कियों के सपनों और उनके फैसलों पर ही बेड़ियां डाल रहे थे।
जोधपुर की बहनों के मामा ने आरोप लगाया है कि उन्हें आत्महत्या करने के लिए उकसाया गया। उनकी मौत की असली वजह तो जांच से ही सामने आएगी, मगर इस घटना से यह तो साफ है ही कि शिक्षिका के रूप में काम कर रहीं इन लड़कियों के जीवन से जुड़े फैसले कोई और ले रहा था।
हम आधुनिक होने के कितने भी दावे कर लें, भारत दुनिया की पांचवी अर्थव्यवस्था ही क्यों न बन गया हो, लेकिन वह लैंगिक भेदभाव और पितृसत्तात्मक मानसिकता की जकड़न से बाहर नहीं निकल सका है।











