अमेरिका से प्रस्तावित छठे दौर की बातचीत से ठीक पहले इजरायल द्वारा ईरान पर किया गया हवाई हमला बर्बर होने के साथ ही गैरकानूनी और भड़काने वाली कार्रवाई है, जिसका जवाब ईरान ने इजरायल के सैन्य मुख्यालय के नजदीक हवाई हमले के जरिये दिया है। अब जब यह साफ हो चुका है कि इजरायल की इस कार्रवाई की जानकारी अमेरिका को पहले से थी, तब यह समझना मुश्किल नहीं कि यह कार्रवाई भले ही ईरान पर दबाव बनाने के लिए की गई है, लेकिन उसका एक वैश्विक संदेश भी है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर दिखाया है कि किस तरह से संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी निष्प्रभावी होते जा रहे हैं। ईरान दावा करता है कि उसका यूरेनियम संवर्धन का कार्यक्रम असैन्य है, लेकिन बीते ढाई दशक से शक जताया जा रहा है कि वह इसकी आड़ में परमाणु हथियार बना रहा है। अच्छा तो यह होता कि बातचीत के जरिये इस मसले को सुलझाया जाता, जैसा कि 2015 में अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और जर्मनी के साथ हुए समझौते से लग भी रहा था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 2018 में इस समझौते से खुद को अलग कर लिया था और इस साल दोनों देशों में फिर से बात शुरू हुई थी। लेकिन इस हमले ने फिलहाल शांति को कहीं दूर धकेल दिया है। दरअसल इस हमले के जरिये इजरायल ने ईरान में आयातुल्ला खामेनेई के खिलाफ उठ रही आवाजों को भी शांत कर वहां नई बयार को आने से रोक दिया है। इजरायल को अपनी संप्रभुता की रक्षा करने का हक है, लेकिन पिछले साल अक्टूबर में हमास द्वारा उस पर किए गए हमले के बाद से वह जिस तरह बेकाबू हो गया है, वह विश्व शांति के लिए एक बड़़ा खतरा है।
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