पहचान का यू-टर्न : भारत ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बन रहा है और पाकिस्तान ‘मुस्लिम हिन्दुस्तान’?

गीतकार जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू में हिन्दू समाज की उग्रता पर कहा था कि भारत क्यों हिन्दू पकिस्तान होना चाहता है ? भले ही पाकिस्तान में मुस्लिम आबादी हूं पर भारत में हिन्दुओं को अतिवादी होने की ज़रूरत ही क्या है? जावेद अख्तर की बात एक हद तक सही कही जा सकती है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अब पाकिस्तान अपनी छवि बदलना चाहता है और एक उदारवादी मुस्लिम देश की छवि बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

1947 में जब भारतीय उपमहाद्वीप का नक्शा बदला गया, तो वह सिर्फ जमीन पर खींची गई एक लकीर नहीं थी। वह इतिहास, संस्कृति और साझी विरासत का एक बेहद दर्दनाक बंटवारा था। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने खुद को ‘इस्लाम के अभेद्य गढ़’ के रूप में स्थापित करने की पुरजोर कोशिश की। उसने अपनी पहचान को भारत से बिल्कुल अलग दिखाने के लिए हर संभव जतन किए। दूसरी तरफ भारत रहा,जिसने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद के सपनों के अनुरूप एक धर्मनिरपेक्ष और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र की राह चुनी।

लेकिन आज, साढ़े सात दशकों के बाद, उपमहाद्वीप के वैचारिक और सांस्कृतिक विमर्श में एक अजीबोगरीब ‘यू-टर्न’ देखने को मिल रहा है। एक तरफ भारत के भीतर और बाहर के आलोचक यह चिंता जता रहे हैं कि देश बहुसंख्यकवादी राजनीति की राह पर चलकर ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनने की ओर अग्रसर है। वहीं दूसरी तरफ, एक बेहद चौंकाने वाला वाकया हो रहा है। खुद को ‘हिन्दुस्तान’ की हर बात से दूर रखने वाला पाकिस्तान आज अपनी पहचान के गहरे आइडेंटिटी क्राइसिस से उबरने के लिए उसी प्राचीन ‘हिन्दुस्तान’ की विरासत की शरण में जा रहा है। वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का सहारा ले रहा है, मानो वह एक ‘मुस्लिम हिंदुस्तान’ बनने की छटपटाहट से गुजर रहा हो।

‘हिन्दू पाकिस्तान’ शब्दावली भारतीय राजनीतिक विमर्श में कोई नई नहीं है। जब भी देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर चोट होती है, बुद्धिजीवी वर्ग यह आशंका जताता है कि यदि भारत ने अपनी समावेशी पहचान खो दी, तो वह अनजाने में उसी ढर्रे पर चल पड़ेगा जिस पर पाकिस्तान 1947 में चला था। धर्म को राष्ट्र का आधार बनाने का खामियाजा पाकिस्तान आज भुगतता ही रहा हैराजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक बदहाली और चरमपंथ।

लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। दशकों तक खुद को अरब संस्कृति से जोड़ने, खुद को तुर्क या पारसी विजेताओं का वंशज बताने के बाद अब पाकिस्तान को यह अहसास हो रहा है कि भूगोल और इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता। अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी छवि सुधारने और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वह अब उसी प्राचीन ‘हिन्दुस्तान’ के रूप में खुद को रीब्रांडिंग रहा है, जो कभी ज्ञान, दर्शन और महान सभ्यताओं काकेन्द्र था। पाकिस्तान में अब बसंत पंचमी की चर्चा होने लगी है, संस्कृत भाषा और पाणिनी को याद किया जा रहा है, और सूफी संगीत के साथ-साथ क्लासिकल डांस की जड़ों को टटोला जा रहा है। यह एक ऐसे देश की छटपटाहट है जो मजहब से तो इस्लामिक है, लेकिन अपनी ऐतिहासिक साख और जड़ों के लिए तरस रहा है।

इस वैचारिक बदलाव का सबसे व्यावहारिक और रणनीतिक उदाहरण ‘सिंधु नदी’ और ‘सिंधु जल समझौते’ को लेकर चल रही राजनीति में दिखाई देता है। भारत ने जब से इस 65 साल पुरानी संधि में समीक्षा और संशोधन के लिए पाकिस्तान को आधिकारिक नोटिस दिए हैं, इस्लामाबाद में हड़कंप मचा हुआ है। भारत का कानूनी पक्ष बेहद मजबूत है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांत ‘रेबस सिस स्टैंटिबस’ यानी परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन पर आधारित है।

पहलगाम की घटना के बाद सिंधु जल नीति को लेकर भारत ने कुछ ऐलान किये थे। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी, जिनमें एक विदेशी भी था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने हमले के अगले दिन (23 अप्रैल 2025) पाँच सूत्री कार्य योजना अपनाई, जिसमें सिंधु जल संधि सबसे अहम कदम था। भारत ने 1960 की संधि को तुरंत प्रभाव से स्थगित कर दिया। इसका मतलब यह था कि भारत अब पाकिस्तान को पूर्वी नदियों यानी रावी, ब्यास, सतलुज आदि का पानी रोक/डायवर्ट कर सकता है और डेटा शेयरिंग, निरीक्षण आदि बंद कर सकता है। पाकिस्तान उसी से उद्वेलित है।

अगर भारत की तरह चीन भी नदी जल बंटवारे को लेकर आक्रामक हो जाये तो क्या होगा? चीन अगर यारलुंग त्सांगपो पर बड़े डैम तेजी से बनाए या पानी रोक/डायवर्ट करे, तो: भारत के पूर्वोत्तर में सूखा या बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। कृषि, मछली पालन और लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होगा। उससे बांग्लादेश भी बुरी तरह प्रभावित होगा लेकिन वर्तमान में कोई औपचारिक जल-बंटवारा समझौता नहीं है, सिर्फ डेटा शेयरिंग है जो तनाव में रुक जाती है। ब्रह्मपुत्र बेसिन भारत की हाइड्रो पावर का बड़ा हिस्सा है। चीन पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है, जैसा कुछ विशेषज्ञ पहले से चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी दशा में भारत को अपनी जल नीति बहुत सुविचारित रखनी ही चाहिए।

1960 के मुकाबले आज दोनों देशों की आबादी और पानी की मांग कई गुना बढ़ चुकी है, और जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों के बहाव का पैटर्न बदल गया है। साथ ही, किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान ने संधि के विवाद सुलझाने के क्रमिक तंत्र का उल्लंघन कर सीधे ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का रुख किया, जिसने भारत को कड़े कदम उठाने पर मजबूर किया।

इस भू-राजनीतिक दबाव से घबराकर पाकिस्तान ने वैश्विक थिंक-टैंकों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक नया आख्यान गढ़ना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान अब दुनिया के सामने यह प्रचारित कर रहा है कि ‘सिंधु घाटी सभ्यता पूरी तरह से पाकिस्तान की देन है और सिंधु नदी पर उसका प्राकृतिक और पूर्ण अधिकार है।’

उसका तर्क है कि चूंकि हड़प्पा और मोहेनजो-दड़ो जैसे मुख्य केंद्र आज भौगोलिक रूप से पाकिस्तान में हैं, इसलिए इस पूरी विरासत का असली वारिस वही है। वह दुनिया को यह भी समझा रहा है कि जिस ‘इंडिया’ या ‘हिन्दू ‘ शब्द पर भारत अपना दावा करता है, उसकी उत्पत्ति इसी ‘सिंधु’ (इंडस) शब्द से हुई है जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।

पाकिस्तान के भीतर अपनी पहचान को बदलने की यह कवायद केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके शिक्षा तंत्र और स्कूली पाठ्यक्रमों में भी गहराई से उतर रही है। विभाजन के बाद से अब तक पाकिस्तान में इतिहास को किस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया, इसका एक लंबा क्रोनोलॉजिकल इतिहास रहा है:

शुरुआती दौर में मुगलों और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को एक साझी विरासत के रूप में दिखाया जाता था, लेकिन 1965 के युद्ध के बाद भारत को एक ‘स्थायी दुश्मन’ के रूप में पेश करने की शुरुआत हुई।

बांग्लादेश के अलग होने के बाद पाकिस्तान के ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ को गहरा धक्का लगा। तब इतिहास की किताबों से पूर्वी पाकिस्तान के योगदान और 1971 के आत्मसमर्पण के तथ्यों को गायब कर दिया गया।

जनरल जिया-उल-हक ने इतिहास का पूर्ण ‘इस्लामीकरण’ इसी दौर में हुआ। प्राचीन हिंदू, बौद्ध और मौर्य काल (सम्राट अशोक, चाणक्य, तक्षशिला) को पाठ्यक्रमों से मिटा दिया गया। यह अनिवार्य कर दिया गया कि “पाकिस्तान का इतिहास 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध आगमन से शुरू होता है।” राजा दाहिर को क्रूर और कासिम को मुक्तिदाता बताया गया।

परवेज मुशर्रफ की आधुनिकता वाली नीति के बाद पाठ्यक्रमों में थोड़ा सुधार हुआ। वर्ष 2025-2026 के दौरान पाकिस्तान सरकार ने मोहेनजो-दड़ो में बड़े स्तर पर नए सिरे से खुदाई और शोध कार्य शुरू किया है। जो सभ्यता कभी ‘इस्लाम-पूर्व का अंधकार युग’ कहकर नजरअंदाज कर दी जाती थी, उसे अब पाकिस्तान गर्व से अपनी ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के रूप में प्रचारित कर रहा है।

शायद सबसे हैरान करने वाला बदलाव स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसके नायकों को लेकर है। पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी नई पीढ़ी को यही सिखाया कि 1947 की आजादी केवल मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना के संघर्ष का नतीजा थी। लेकिन आज पाकिस्तान के प्रगतिशील बुद्धिजीवी और नागरिक समाज यह दावा कर रहे हैं कि अंग्रेजों को इस उपमहाद्वीप से भगाने में उनकी मिट्टी के सपूतों ने भी खून बहाया था। इसका सबसे बड़ा प्रतीक शहीद-ए-आजम भगत सिंह को लेकर बदला हुआ नजरिया है। भगत सिंह का जन्म लायलपुर में हुआ था और उनकी शहादत लाहौर सेंट्रल जेल में हुई थी।

पाकिस्तान सरकार ने फैसलाबाद में भगत सिंह के पुश्तैनी मकान और उनके स्कूल को बकायदा हेरिटेज साइट घोषित कर संरक्षित किया है। वहां उनकी माँ का चरखा और संदूक आज भी सुरक्षित हैं। लाहौर के शादमान चौक पर ‘भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन, पाकिस्तान’ जैसी संस्थाएं हर साल उनकी जयंती और शहादत दिवस मनाती हैं, और इस चौक का नाम आधिकारिक रूप से ‘शहीद भगत सिंह चौक’ रखने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। पाकिस्तान इसके जरिए दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह उपमहाद्वीप के उस साझा और गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम का भी उतना ही हकदार है, जितना कि भारत।

इस पूरी सांस्कृतिक री- ब्रांडिंग के पीछे पाकिस्तान की एक गहरी भू-राजनीतिक चाल भी है। पाकिस्तान का दावा है कि हम (पाकिस्तान) प्राचीन और शांतिप्रिय सिंधु घाटी सभ्यता के सच्चे रक्षक हैं, हम तक्षशिला और भगत सिंह जैसी साझी विरासत का सम्मान करते हैं। इसके विपरीत, आज का भारत अपनी धर्मनिरपेक्षता को छोड़कर एक आक्रामक और अनुदारवादी राष्ट्र बनता जा रहा है, जो अपने पड़ोसियों के अधिकारों और पानी को छीनना चाहता है।

यह रणनीति वैश्विक स्तर पर कश्मीर जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बटोरने का एक नया और बेहद शातिर कूटनीतिक उपकरण बन गई है। भारत का ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनने का डर जहाँ एक आंतरिक लोकतांत्रिक चुनौती है, जिससे भारत का जागरूक समाज और उसकी संस्थाएं खुद निपट रही हैं और निपट लेंगी; वहीं पाकिस्तान का ‘मुस्लिम हिन्दुस्तान’ बनने का प्रयास उसकी ऐतिहासिक पहचान की मजबूरी और कूटनीतिक आवश्यकता है।

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