ऐसा लगता है कि सनातन धर्म की रक्षा के नाम पर देश के मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने को लेकर विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारों में कोई प्रतिस्पर्धा चल रही है। इसके लिए वे संविधान की धज्जियां उड़ाने से भी गुरेज नहीं कर रही हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के खुलेआम ‘मियां मुस्लिमों’ को गोली दागते पोस्टर के जारी होने के बाद अब गुजरात की भूपेंद्र पटेल की अगुआई वाली भाजपा सरकार ने गुजरात विवाह पंजीयन संशोधन कानून का मसौदा पेश किया है, जिसके मुताबिक विवाह करने वाले युवाओं को अनिवार्य रूप से अपने माता पिता की मंजूरी लेनी होगी।
राज्य के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में इसका ऐलान कर कहा कि हमें प्रेम विवाह पर एतराज नहीं है, लेकिन यदि कोई ‘सलीम’ ‘सुरेश’ बनकर हमारी बेटी को बहला फुसलाकर ले जाए तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं।
संवैधानिक पद पर बैठे संघवी ऐसा कहते हुए उस संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं, जिसकी उन्होंने शपथ ले रखी है।
गुजरात सरकार बकायदा इसके लिए एक अलग से पोर्टल शुरू करने के बारे में विचार कर रही है। नए प्रस्तावित नियमों के तहत लड़के लड़की को गवाहों के साथ पूरा विवरण देना होगा। यानी आधार कार्ड और फोटो सहित अन्य दस्तावेज।
गुजरात सरकार की यह कवायद संविधान के कई प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसलों का खुला उल्लंघन हैं। भारत में लड़के और लड़की के लिए शादी की कानून उम्र क्रमशः 21 और 18 साल है।
बताने की जरूरत नहीं है कि गुजरात सरकार के निशाने पर अपनी मर्जी से शादी करने वाले युवा हैं। खासतौर से मुस्लिम-हिंदू विवाह को लेकर उनका एतराज है। दरअसल यह कुछ बरस पहले उछाले गए कथित ‘लव जिहाद’ के मुद्दे को गरमाने की ही कोशिश लगता है।
वास्तव में शादी को लेकर ऐसा कानून प्रस्तावित करने वाला गुजरात पहला राज्य नहीं है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ ने उत्तर प्रदेश गैरकानून धर्मांतरण (निरोधक) संशोधन कानून पेश करते हुए इसे लव जिहाद से ही जोड़ा था।
जबकि हकीकत यह है कि गुजरात और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों के दावों के उलट केंद्र की मोदी सरकार संसद में स्वीकार कर चुकी है कि लव जिहाद जैसी कोई चीज नहीं है। फरवरी, 2020 में मोदी सरकार के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री जी कृष्ण रेड्डी ने लोकसभा को बताया था कि केरल के जिस लव जिहाद की बात की जा रही है, वैसा कोई मामला नहीं है। उन्होंने कहा था कि कानूनन लव जिहाद जैसी कोई चीज नहीं और न ही किसी केंद्रीय एजेंसी ने लव जिहाद का कोई मामला पंजीबद्ध किया है!
दरअसल 2018 में केरल की एक हिंदू लड़की अखिला अशोकन के इस्लाम धर्म को अपना कर एक मुस्लिम युवक शादी करने के बाद उसके पिता ने उसकी शादी पर एतराज कर इसे ‘लव जिहाद’ बताया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपना नाम बदलकर हादिया कर लेने वाली इस लड़की के पक्ष में फैसला सुनाया था और उसकी शादी को बहाल कर दिया था।
कोर्ट ने साफ कर दिया था कि दो वयस्क भारतीय चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों अपनी मर्जी से शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 2021 को कर्नाटक से जुड़े एक मामले में फैसला देते हुए साफ किया था कि यदि दो वयस्क अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं, तो उसमें परिवार, समुदाय या वंश की कोई मंजूरी लेना अनिवार्य नहीं है।
सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस तरह की संविधान विरोधी पहल का स्वतः संज्ञान लेगा?











