नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली
बजट से पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण ने एक बड़ी चिंता की ओर इशारा किया है। जिसमें कहा गया है कि अगर अत्यधिक लीवरेज्ड एआई इंफ्रास्ट्रक्चर विफल हो जाता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2008 की वित्तीय संकट से भी बदतर स्थिति आ सकती है।
एआई इंफ्रास्ट्रक्चर क्या है। एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को चलाने के लिए बहुत बड़ी इमारतें और सिस्टम चाहिए होते हैं। इन्हें AI इंफ्रास्ट्रक्चर कहते हैं। इसमें डेटा सेंटर्स, जीपीयू चिप्स, पावर प्लांट्स, कूलिंग सिस्टम, नेटवर्क बहुत कुछ होता है।
ये सब बनाने में अरबों-खरबों डॉलर लगते हैं। जिसके लिए भारी भरकम कर्ज लेना पड़ता है। और अगर सब कुछ ठीक से चला तो कर्ज की अदायगी आसानी से हो पाएगी नहीं तो कर्ज डूब भी सकता है। सर्वेक्षण ने 2026 के लिए तीन संभावित वैश्विक बाजार परिदृश्यों का जिक्र किया है।
‘बिजनेस ऐज इन 2025’ यानी 2025 जैसी स्थिति जारी रहे, लेकिन और अधिक नाजुक हो जाए। इसकी संभावना 40-45 फीसदी है। यहां वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर रहेगी, लेकिन छोटे-छोटे झटके आ सकते हैं, जैसे व्यापार विवाद या वित्तीय तनाव।
दूसरा है ‘मैनेज्ड डिसऑर्डर’ यानी प्रबंधित अव्यवस्था। इसकी भी 40-45 फीसदी संभावना है। यहां वित्तीय तनाव, व्यापार घर्षण और भू-राजनीतिक तनाव से अस्थिरता बढ़ेगी, लेकिन सिस्टम पूरी तरह से ध्वस्त नहीं होगा। सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।
तीसरा जो सबसे अधिक चिंता में डालने वाला है ‘सिस्टेमिक शॉक कैस्केड’ – यानी सिस्टेमिक झटकों की श्रृंखला। इसकी संभावना सिर्फ 10-20% है, लेकिन प्रभाव बहुत गंभीर होगा। यहां वित्तीय, तकनीकी और भू-राजनीतिक तनाव एक-दूसरे को बढ़ावा देंगे, जिससे वैश्विक संकट पैदा हो सकता है, जो 2008 से भी बदतर होगा।
यह चेतावनी किस तरह की है? यह एक ‘लो-प्रॉबेबिलिटी, हाई-इम्पैक्ट’ रिस्क है। मतलब होने की संभावना कम है, लेकिन अगर हुआ तो तबाही मचा सकता है। एआई इंफ्रास्ट्रक्चर – जैसे डेटा सेंटर्स, जीपीयू चिप्स – को बनाने के लिए टेक कंपनियां भारी कर्ज ले रही हैं। लेकिन यह कर्ज बैलेंस शीट पर नहीं दिखाया जा रहा। स्पेशल पर्पज व्हीकल्स (SPVs) के जरिए वॉल स्ट्रीट इन्वेस्टर्स से फंडिंग ली जा रही है।
उदाहरण के लिए, मेटा, ओरेकल, एक्सएआई और कोरवीव जैसी कंपनियां ने 120 बिलियन डॉलर से ज्यादा के डेटा सेंटर खर्च को ऑफ-बैलेंस शीट कर दिया है। ओरेकल ने अकेले 66 बिलियन डॉलर का कर्ज SPVs में शिफ्ट किया। मेटा ने 30 बिलियन डॉलर का डील किया। यह तरीका क्रेडिट रेटिंग्स को अच्छा रखता है, लेकिन पारदर्शिता कम करता है। अगर एआई से उम्मीद के मुताबिक प्रोडक्टिविटी गेन नहीं हुआ, तो एसेट वैल्यूएशन में गिरावट आएगी, और कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाएगा।
जीडीपी वृद्धि दर 6.8 से 7.2 फीसदी रहने का अनुमान
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को लोकसभा में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया, जिसमें वित्त वर्ष 2027 के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.8-7.2 फीसदी रहने का अनुमान है, वहीं सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि वित्त वर्ष 2026 का राजकोषीय घाटा 4.4 फीसदी पर सही दिशा में है।
यह पूर्वानुमान वित्त वर्ष 2026 के लिए अनुमानित 7.4 फीसदी की वृद्धि से मंदी का संकेत देता है, जो पिछले वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण के 6.3-6.8 फीसदी के अनुमान से अधिक थी। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में सुधार और भूमि सुधारों के चलते भारत में वित्त वर्ष 2027 में 7.5 फीसदी जीडीपी वृद्धि हासिल करने की क्षमता है।
सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी के कारण 2025 में रुपये का प्रदर्शन कमजोर रहा है। भारत के 1.2 करोड़ से अधिक गिग वर्कफोर्स पर प्रकाश डालते हुए, सर्वेक्षण में कहा गया है कि लगभग 40 फीसदी लोग प्रति माह 15,000 रुपये से कम कमाते हैं और नियमित रोजगार के साथ अंतर को कम करने के लिए प्रतीक्षा समय के मुआवजे सहित न्यूनतम प्रति घंटा या प्रति कार्य मजदूरी की सिफारिश की गई है।
सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि हाल ही में हस्ताक्षरित यूरोपीय संघ का मुक्त व्यापार समझौता विनिर्माण प्रतिस्पर्धा, निर्यात लचीलापन और रणनीतिक क्षमता को बढ़ावा देगा, जबकि अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता इस वर्ष समाप्त होने की उम्मीद है।सर्वेक्षण पेश किए जाने के बाद संसद की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।
सीईए ने वित्त वर्ष 2027 में 7.5 फीसदी तक की वृद्धि का अनुमान लगाया है और राज्यों के राजकोषीय जोखिमों पर चिंता जताई है।मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में सुधार और भूमि सुधारों के चलते भारत में वित्त वर्ष 2027 में 7.5% जीडीपी वृद्धि हासिल करने की क्षमता है। नागेश्वरन ने यह भी चेतावनी दी कि राज्यों को उधार लागत को नियंत्रण में रखने के लिए राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना चाहिए।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब आर्थिक सर्वेक्षण में राजकोषीय लोकलुभावनवाद पर चिंता जताई गई है और कहा गया है कि नकद हस्तांतरण में वृद्धि से पूंजीगत व्यय कम हो रहा है। इसमें यह भी बताया गया है कि हाल के वर्षों में कई राज्यों में राजस्व घाटा बढ़ा है और इस बात पर जोर दिया गया है कि राज्य स्तर पर किसी भी प्रकार की राजकोषीय अनुशासनहीनता से सरकारी उधार की लागत बढ़ सकती है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में डिजिटल व्यसन को एक बढ़ती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में चिह्नित किया गया है, जो युवाओं और वयस्कों के मानसिक स्वास्थ्य और उत्पादकता को प्रभावित करती है। गुरुवार को संसद में प्रस्तुत इस सर्वेक्षण में डिजिटल प्लेटफार्मों के बाध्यकारी उपयोग से निपटने के लिए व्यापक उपायों की मांग की गई है, जो शैक्षणिक प्रदर्शन, कार्यस्थल पर उत्पादन और मनोवैज्ञानिक कल्याण को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसमें सिफारिश की गई कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को आयु सत्यापन और आयु-उपयुक्त डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स लागू करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए, विशेष रूप से सोशल मीडिया, जुआ ऐप्स, ऑटो-प्ले सुविधाओं और लक्षित विज्ञापनों के लिए। कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए पहुंच सीमित करने वाली नीतियों पर भी विचार किया जा सकता है, क्योंकि वे बाध्यकारी व्यवहार और हानिकारक सामग्री के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि मोटापा खतरनाक दर से बढ़ रहा है और भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है, साथ ही बेहतर पोषण और आहार संबंधी सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
सर्वेक्षण में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि अस्वास्थ्यकर आहार, गतिहीन जीवनशैली, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (यूपीएफ) की बढ़ती खपत और पर्यावरणीय कारक सभी आयु समूहों में मोटापे को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे मधुमेह, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) का खतरा बढ़ रहा है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों आबादी को प्रभावित कर रहा है।2020 में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे और अनुमान है कि 2035 तक यह संख्या 8.3 करोड़ तक पहुंच जाएगी
आर्थिक सर्वेक्षण में गिग वर्कर्स को भी किया शामिल
सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत में लगभग 40 फीसीद गिग वर्कर 15,000 रुपये प्रति माह से कम कमाते हैं, यह बताते हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने उचित वेतन सुनिश्चित करने और नियमित रोजगार के साथ अंतर को कम करने के लिए प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेपों का आह्वान किया। सर्वेक्षण में प्रतीक्षा समय के मुआवजे सहित न्यूनतम प्रति घंटा या प्रति कार्य आय निर्धारित करने का सुझाव दिया गया।
वित्त वर्ष 2025 में भारत में गिग वर्कफोर्स में 55 फीसदी की वृद्धि हुई और यह 1.2 करोड़ तक पहुंच गया, जो कुल रोजगार का 2% से अधिक है। अनुमान है कि गैर-कृषि गिग जॉब्स 2029-30 तक कुल वर्कफोर्स का 6.7 फीसदी तक पहुंच जाएंगे और जीडीपी में 2.35 लाख करोड़ रुपये का योगदान देंगे।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरं ने कहा है कि उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को अशांत दुनिया में स्थिरता का नखलिस्तान कहा। उनका मानना है कि अगर विनिर्माण सुधार सही रहे, तो विकास दर 8% तक जा सकती है।
ई वाई इंडिया के डी.के. श्रीवास्तव ने अगले वित्तीय वर्ष के लिए 6.5-7 फीसदी की वृद्धि को टिकाऊ माना है, हालांकि पिछले साल के उच्च आधार के कारण मामूली गिरावट की संभावना जताई है। लार्सन टुब्रो ग्रुप के सच्चिदानंद शुक्ला ने सरकार के बुनियादी ढांचे पर निवेश और राजकोषीय अनुशासन की सराहना की है।











