यूएनआई पर शर्मनाक छापा: पत्रकारों का क्या कसूर था?

March 21, 2026 8:10 PM
Delhi Police seals UNI office

प्रेस की आजादी के मामले में भारत 180 देशों की सूची में 151वें स्थान पर है। जिसका मतलब यह है कि हम सिर्फ 29 देशों से इस मामले में आगे हैं और 150 देश हमसे आगे हैं।

देश की राजधानी नई दिल्ली में लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन से चंद कदम दूरी पर न्यूज एजेंसी यूएनआई का परिसर जिस तरह से पुलिसिया लाठी के दम पर खाली कराया गया, वह बेहद शर्मनाक है। दिल्ली पुलिस का तर्क है कि भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन मामले में कोर्ट के आदेश पर ऐसा किया गया। क्‍या पुलिस को पत्रकारों के साथ बदसलूकी करने के बजाय सीधे यूएनआई प्रबंधन से बात नहीं करनी चाहिए थी?

उन श्रमजीवी पत्रकारों का क्या कसूर जिन्हें खींचकर और धकिया कर बाहर निकाला गया। यूएनआई के आफिस में जब यह सब घट रहा था, तो सभी महिला-पुरुष पत्रकार अपने काम में व्यबस्ता थे। उन्हें इसका बिल्कुल अंदाजा नहीं था। इस कार्रवाई से पूरे देश में यूएनआई काम प्रभावित हुआ। यह पहली घटना नहीं है, जब मीडिया पर इस तरह का सीधा हमला किया गया हो।

सरकार लगातार मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। जो संस्थान उसके इशारे पर नहीं चलते, उन्हें बलपूर्वक तोड़ा जा रहा है। 2023 में न्यूज क्लिक के दफ्तर पर छापा पड़ा, संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को गिरफ्तार किया गया। मोहम्मद ज़ुबैर एक ट्वीट के लिए जेल गए। स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पूनिया किसान आंदोलन की खबर करने के लिए सिंधु बॉर्डर पर पकड़े गए। इन सबके बाद कोर्ट ने उन्हें राहत दी।

इसी तरह देश प्रतिष्ठित अखबार दैनिक भास्कर के दफ्तर पर तब छापा मार दिया जाता है, जब उसने कोविड के दौरान गंगा नदी के किनारे लगे लाशों के ठेर पर खबर प्रकाशित की। पीएम मोदी पर एक डॉक्यूमेंट्री जारी करने के कुछ सप्ताह बाद ही बीबीसी के ऑफिसों पर इनकम टैक्स का छापा मार दिया जाता है।

पत्रकार ही नहीं कार्टूनिस्टों तक को नियंत्रण में लेने की कोशिशें की गईं। इंदौर के कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय का मामला जग जाहिर है। क्या सरकार इतनी असहिष्णु हो गई है कि आलोचनात्मक आवाज यहां तक कि व्यंग्य भी उसे चुभने लगा है? क्या यह सरकार सिर्फ प्रशंसा सुनना चाहती है?

प्रेस की आजादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है। जब पत्रकारों को डराया-धमकाया जा रहा है, छापेमारी की जा रही है और मुकदमों में फंसाया जा रहा है, तो सच्चाई कैसे बाहर आएगी? सरकार को याद रखना चाहिए कि मीडिया को दबाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि कमजोर पड़ता है।

मीडिया पर नियंत्रण का सवाल गंभीर हो चला है। जिस तरह से सरकार के करीबी कारोबारी मित्र एक-एक कर मीडिया संस्थान खरीद रहे हैं, यह अपने आप में दिखाता है कि ऐसे नहीं तो वैसे सही लगाम स्वतंत्र हाथों में किसी कीमत पर नहीं रहेगी।

मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला असल में जनता की आवाज पर हमला है। अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो लोकतंत्र का मंदिर सिर्फ इमारत बनकर रह जाएगा, उसकी आत्मा मर जाएगी।

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