गहरे तक धंस चुकीं नफरत की जड़ें

Delhi holi violence

मॉब लिंचिंग अब सिर्फ जाति या धर्म से जुड़ा अपराध नहीं रहा, बल्कि छोटी-छोटी बातों पर फैलने वाली नफरत का नतीजा बन चुकी है। देश की राजधानी दिल्ली के उत्तम नगर में होली के मौके पर हुई घटना ने एक बार फिर उस क्रूरता को उजागर किया है, जिसने सामाजिक सौहार्द पर काला धब्बा लगा दिया है।

ये मिसाल दी जाती है कि होली के रंग आपस में मेल कराते हैं। लेकिन 11 साल की एक बच्ची द्वारा फेंका गया पानी का गुब्बारा न जाने किन अर्थों में लिया गया कि हिंसक झड़प में युवक की जान चली गई। गौरतलब है कि पानी का गुब्‍बरा गली से गुजर रही एक महिला पर गिरा था, जिसके बाद इस मामले का सांप्रदायिक चश्‍मे से देखा जाने लगा।

ठीक इसी तरह का मामला राजस्थान के भीवाड़ी में सामने आया जहां होली के दिन ही कथित गौ तस्करों और गौ रक्षकों के बीच हुई झड़प में एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है।

आंकड़े गवाही देते हैं कि बीते एक दशक में देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इंडियास्पेंड, फैक्टचेकर और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज्म के आंकड़ों के मुताबिक अनुमानित रूप से पिछले दशक में 200 से अधिक घटनाएं हुईं, जिनमें 100 से ज्यादा मौतें मॉब लिंचिंग की वजह से हुई हैं। इसमें ज्यादातर घटनाएं गौ रक्षा के नाम पर हिंसा और धार्मिक पहचान को लेकर विवाद से जुड़ी हैं।

इसके पीछे राजनीतिक कारण प्रमुख हैं। कट्टर धार्मिक राजनीति के चलन की वजह से हिंसक समूह मजबूत हुए। सामाजिक कारणों में सोशल मीडिया पर अफवाहें, नफरत फैलाना और धार्मिक ध्रुवीकरण शामिल हैं।

एनसीआरबी ने 2017 से लिंचिंग डेटा इकट्ठा करना बंद कर दिया, वजह बताई गई विश्वसनीयता की कमी। लेकिन ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए कोई केंद्रीय कानून भी नहीं बना। ऐसे मामलों में पुलिस अक्सर निष्क्रिय या पक्षपाती रहती है और राजनीतिक संरक्षण अपराधियों को बचाता है। सिर्फ चार राज्यों (मणिपुर, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड) में एंटी-लिंचिंग कानून हैं, लेकिन अमल कमजोर है।

क्या ऐसी घटनाओं के साथ हम विश्वगुरु बनने का सपना पाल सकते हैं? जब नफरत की आग में लोग जल रहे हो, तो विकास और शांति का दावा कमजोर हो जाता है।

मॉब लिंचिंग की घटनाएं जाने अनजाने में देश को कबीलियाई संस्कृति की ओर धकेल रही हैं, जहां कानून का राज खत्म हो रहा है और भीड़ न्याय कर रही है।

सरकार इस बात को गंभीरता से क्यों नहीं समझ रही कि राजनीति से इतर जरूरी है सख्त कानून और शिक्षा से नफरत मिटाने का सार्थक प्रयास। अन्यथा यह विष देश की एकता को निगल जाएगा।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now