छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का एक ताजा फैसला बेहद पीड़ादायक है, जिसमें उसने कहा है कि पीड़िता की योनि में पेनेट्रेशन न कर सिर्फ जननांगों को रगड़ना और स्खलन करना बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि इसे बलात्कार का प्रयास मान जाएगा।
धमतरी जिले के इस बाइस साल पुराने मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज नरेंद्र कुमार व्यास ने आरोपी की सात साल की सजा को कम कर साढ़े तीन साल कर दिया है। जज ने अपने फैसले में बलात्कार को महिलाओं के प्रति सबसे जघन्य और गंभीर अपराधों की श्रेणी में तो रखा है, लेकिन उनके इस फैसले ने महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
दरअसल ठीक इसी समय देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बच्ची के यौन उत्पीड़न से संबंधित विवादित फैसले को पलट दिया है, जिसमें कहा गया था कि उस बच्ची के स्तन पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा खोलना बलात्कार की कोशिश नहीं है!
ये दोनों फैसले महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन और उनकी चुनौतियों को तो रेखांकित करते ही हैं, यह भी दिखाते हैं कि यौन उत्पीड़न को लेकर व्यापक परिभाषा की जरूरत है।
हालांकि 2012 में राजधानी दिल्ली में निर्भया के साथ हुई बर्बरता के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर तीखी बहस हुई थी। नतीजतन बलात्कार की परिभाषा को व्यापक करते हुए अपराध कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया था। इसके प्रावधान भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में भी शामिल किए गए हैं। फिर भी, अदालती फैसलों में इनके अनुपालन को लेकर सर्वोच्च अदालत को कोई पहल करनी ही चाहिए, ताकि किसी भी तरह की खामी से कोई पीड़ित या पीड़िता न्याय से वंचित न हो जाए।
असल में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज व्यास ने अपने फैसले में तर्क दिया है कि यह मामला 2013 से पहले का है, लिहाजा बलात्कार की नई परिभाषा से यह परे है। यही नहीं, अपने फैसले में उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट का भी हवाला दिया है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मामले में एक राह तो दिखाई ही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले को पलटते हुए दोनों आरोपियों के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंस (पॉक्सो) एक्ट के तहत बलात्कार की कोशिश के मूल आरोप बहाल कर मामला चलाने का रास्ता साफ किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट को तो फटकार लगाई ही, साथ ही यह भी कहा कि यौन अपराधों के मामलों से संबंधित फैसलों के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है। यह आश्वस्त करने वाली बात है।
अभी हमें पता नहीं कि क्या सुप्रीम कोर्ट छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले का इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की तरह स्वतः संज्ञान लेगा या नहीं, लेकिन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले ने यह सोचने को मजबूर किया है कि आखिर किसी महिला की अस्मिता को यौन अपराधों से कब तक सुरक्षित माना जाए?
क्या यह भी नहीं सोचा जाना चाहिए कि बलात्कार की कोशिश और बलात्कार में कानूनी रूप से किस हद तक फर्क किया जाए? ऐसा इसलिए, क्योंकि तकनीकी शब्दावली जो भी हों, ऐसे मामलों की पीड़िताओं को जीवनभर एक ऐसे जख्म के साथ जीने को विवश होना पड़ता है, जिसे समाज आज भी स्वीकार नहीं करता।











