सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से सटे कांचा गचीबावली के 400 एकड़ में फैले जंगल में चल रही पेड़ों की मनमानी कटाई पर रोक लगाकर कड़ा संदेश दिया है। यह विडंबना ही है कि जैवविविधता से भरपूर इस जंगल को बचाने के लिए यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और छात्रों को सड़क पर उतरना पड़ा है, क्योंकि तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार इस जंगल को साफ कर वहां कोई औद्योगिक परियोजना लगाना चाहती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि जमीन पर यूनिवर्सिटी का मालिकाना हक है या राज्य सरकार का, लेकिन वहां पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की जा रही थी, उसने यहां कि जैवविविधता को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोडी है। 220 से अधिक प्रजाति के पक्षियों, 750 प्रजातियों के फूलों और अनगिनत किस्म की प्रजातियों से भरपूर कांचा गचीबावली में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले 10,000 पेड़ों की कटाई हो जाने की खबर है! इस बात की क्या गारंटी की राज्य सरकार इस जंगल को साफ कर यह जमीन मनमाने ढंग से किसी कॉरपोरेट को नहीं देगी! विकास के नाम पर मनमाने ढंग से जंगलों की कटाई का यह कोई पहला मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ के हसदेव के जंगलों से लेकर मध्य प्रदेश के सिंगरौली तक ऐसे मंजर देखे जा सकते हैं। बेशक कांचा गतीबावली के जंगल में गूंजती बुलडोजरों की चीख अभी शांत हो गई है, लेकिन यह एक लंबी लड़ाई है।
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