आजकल एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट्स (anti aging treatments) जैसे बॉटॉक्स, डर्मल फिलर्स, ग्लूटाथियोन इंजेक्शन, पेप्टाइड और PRP (वैंपायर फेशियल) बहुत पॉपुलर हो गए हैं। लोग झुर्रियां कम करने, त्वचा को चमकदार और प्लंप बनाने के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर्स के बिफोर-आफ्टर फोटोज देखकर युवा भी ‘प्रिवेंटिव एजिंग’ शुरू कर रहे हैं यानी उम्र बढ़ने से पहले ही ट्रीटमेंट लेना।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स (ASPS) के 2024 आंकड़ों के अनुसार, न्यूरोमॉड्यूलेटर इंजेक्शन (जैसे बॉटॉक्स) में 4% की बढ़ोतरी हुई, और कुल मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर्स में 1.5% ग्रोथ दर्ज की गई। भारत में भी ब्यूटी क्लीनिक्स तेजी से बढ़ रहे हैं, जहां ये ट्रीटमेंट आसानी से उपलब्ध हैं।
मार्केट का तेज विकास और कारण
ग्लोबल एंटी-एजिंग मार्केट 2025 में करीब 7.07 लाख करोड़ रुपये का है और 2035 तक ये 13.50 लाख करोड़ रुपये पहुँच जाएगा यानी हर साल 6 फीसदी से भी ज्यादा ग्रोथ रेट से बढ़ोतरी जबकि भारत में ये आंकड़ें और भी इंटरेस्टिंग है 2025 में 1.84 लाख करोड़ रुपये का मार्केट है जो 2031 तक 3.41 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा और यहाँ ग्रोथ रेट करीब 11 फीसदी से बढ़ रहा है। वजहें हैं सोसाइटी का प्रेशर जहां युवा दिखना स्टेटस सिंबल बन गया है, टेक्नोलॉजी की एडवांसमेंट, आसान पहुंच और सोशल मीडिया का प्रभाव। अमेजन-फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां भी इन प्रोडक्ट्स को प्रमोट कर रही हैं, जिससे यह बड़ा बिजनेस बन गया है। लेकिन यह ग्रोथ हेल्थ रिस्क्स के बिना नहीं आ रही।
फायदे और संभावित नुकसान
ये ट्रीटमेंट्स शॉर्ट-टर्म में फायदेमंद हो सकते हैं रिंकल्स कम होते हैं, त्वचा टाइट और ग्लोइंग लगती है, कॉन्फिडेंस बढ़ता है। लेकिन लॉन्ग-टर्म में कई रिस्क हैं। बॉटॉक्स से मसल्स कमजोर हो सकते हैं, एक्सप्रेशन बदल सकते हैं और कुछ स्टडीज में 69% लोगों को लॉन्ग-लास्टिंग साइड इफेक्ट्स जैसे सिरदर्द, एंग्जाइटी या मसल एट्रोफी रिपोर्ट हुई। डर्मल फिलर्स से लंप्स, इंफेक्शन या वैस्कुलर ऑक्लूजन का खतरा रहता है। ग्लूटाथियोन इंजेक्शन से एलर्जी, किडनी/लीवर डैमेज, सांस की तकलीफ या ब्लड पॉइजनिंग हो सकती है। FDA ने पहले भी कंपाउंडेड ग्लूटाथियोन पर एंडोटॉक्सिन्स के कारण वार्निंग जारी की थी। ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट्स से इम्यून सिस्टम प्रभावित हो सकता है। फेक या अनऑथराइज्ड प्रोडक्ट्स से गंभीर रिएक्शन के केस भी सामने आए हैं।
डॉक्टर्स की सलाह और बेहतर विकल्प
द लेंस ने गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और वैज्ञानिक डॉ. हरित झा से एंटी-एजिंग पर बात की, जो इस विषय पर लगातार रिसर्च कर रहे हैं। उनका मानना है कि “एंटी-एजिंग प्रोडक्ट्स या ट्रीटमेंट्स सिर्फ सर्टिफाइड और ऑथेंटिक ही लें, जो डॉक्टर ने प्रॉपर क्लीनिक में प्रिस्क्राइब किए हों, क्योंकि ब्यूटी पार्लर या सलून जैसे जगहों पर करवाने से बड़ा खतरा हो सकता है। कुछ मामलों में डॉक्टर न्यूट्रिएंट कमी (जैसे विटामिन E, B12 या कैल्शियम) के लिए मेडिसिन्स देते हैं, जो वेल-डॉक्युमेंटेड और रिसर्च्ड हैं, लेकिन सिर्फ अच्छा दिखने के लिए नहीं। यूट्यूब या इन्फ्लुएंसर्स के कहने पर लेना बेहद खतरनाक है। इसके बजाय हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं, समय पर उठें, खाएं, कैलोरी रेस्ट्रिक्ट करें, शुगर, ड्रिंक्स, नशा और ज्यादा स्पाइसी फूड अवॉइड करें, हेल्दी चीजें खाएं, ताकि बॉडी बैलेंस रहे और एजिंग प्रोसेस स्वाभाविक रूप से धीमी हो।”
ये तरीके उम्र के असर को स्वाभाविक रूप से धीमा करते हैं और कोई बड़ा रिस्क नहीं देते। शॉर्टकट हमेशा रिस्की होते हैं, इसलिए सोच-समझकर फैसला लें और हेल्थ को प्राथमिकता दें।








