देश की राजधानी दिल्ली में ग्लोबल साउथ का सबसे बड़े एआई सम्मेलन हुआ। जिसके बाद से देश की मीडिया से लेकर समाज तक में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर व्यापक चर्चा है। इसी सम्मेलन में एक निजी विश्वविद्यालय गलगोटिया ने चीन के रोबोट को अपना बताकर पेश कर दिया जो जगहंसाई की वजह बना। यह घटना देश में एआई अनुसंधान की पोल भी खोलती है कि हम इनोवेशन के मामले में कितने पीछे हैं।
ठीक इसी फरवरी में आईटी सेक्टर के स्टॉक लगातार आठ दिनों तक गिरे, इसके पीछे की वजह एआई से जुड़ी थी। जिसमें बताया गया कि डर इस बात का है कि एआई आने वाले दिनों में आईटी सेक्टर की नौकरियों के लिए संकट पैदा कर देगा। क्योंकि कोडिंग से लेकर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट तक के काम एआई बखूबी कर रहा है, यही काम पहले हजारों पेशेवर करते थे।
इसी महीने एक रिपोर्ट और आई है बैंकबाजार एस्पिरेशन इंडेक्स (बीएआई) 2025-26, इसमें बताया गया है कि एआई भारत के वेतनभोगी वर्ग की आय, बचत और भविष्य की योजना को बदल रही है, लेकिन इसका प्रभाव एकसमान नहीं है। 22 से 45 वर्ष की आयु के वेतनभोगी पुरुषों और महिलाओं के सर्वे से पता चलता है कि 42 फीसदी ने एआई टूल्स से आय या उत्पादकता में वृद्धि दर्ज की, जबकि 12 फीसदी ने आय में व्यवधान का सामना किया और 8 फीसदी ने एआई पर अत्यधिक निर्भरता से वित्तीय नुकसान की बात कही। नीति आयोग की रिपोर्ट्स में भी बताया गया है कि एआई से आईटी और बीपीओ में 1.5-2 मिलियन नौकरियां खत्म हो सकती हैं।
भारत में एआई की गतिविधियां बढ़ रही हैं। सरकार की ओर से इंडिया एआई मिशन 2024 में लॉन्च किया जा चुका है, जिसमें 10,372 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। इसके अलावा रिलायंस, अदानी, टाटा ग्रुप जैसी देश की कंपनियों ने भी एआई में अरबों निवेश किए हैं, वहीं गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन ने भारत में 68 बिलियन डॉलर के एआई प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है।
भारत में लोकप्रिय एआई टूल में जैसे चैटजीपीटी, गूगल जेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट कोपायलट और क्लॉड, यह सारे अमेरिकी कंपनियों के हैं। भारतीय टूल जैसे ओपनहाथी, तमिल-लामा और धेनु 1.0 अभी उभर रहे हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर धूम नहीं मचा पाए हैं। यह तब है जब भारत की दुनिया में आईटी हब के रूप में पहचान है। मतलब यह है कि आईटी सेक्टर द्वारा तैयार किया गया हथियार अब खुद के लिए खतरा बनता जा रहा है, नौकरियों से लेकर बाजार तक में।
इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है कि भारत सरकार अनुसंधान पर कम खर्च कर रही है। जहां 2024 में अमेरिका ने निजी एआई निवेश में 109.1 अरब डॉलर खर्च किए। चीन ने 9.3 अरब डॉलर का निवेश किया। वहीं भारत का 2013 से 2024 तक एआई में निवेश लगभग 11.1 अरब डॉलर रहा है। यह असमानता दर्शाती है कि वैश्विक एआई प्रतिस्पर्धा में भारत को मजबूत बनाने के लिए निवेश बढ़ाने की जरूरत है।
साथ ही जब एआई लगातार अपग्रेड हो रहा है और चार्टर अकांटेंट से लेकर डॉक्टरी सेवाओं तक में दखल बढ़ रही है। यहां तक कि पर्सनल असिस्टेंट तक को एआई रिप्लेस कर रहा है। ऐसे में इंसानी श्रम मशीनी योग्यता की भेंट न चढ़ इसका ख्याल भी सरकार को रखना होगा। नीतियां ऐसी बनानी होंगी कि एआई के साथ सामाजिक आर्थिक ढांचा भी कदमताल कर सके।
जरूरत एआई को लेकर टिकाऊ योजनाएं बनाने की हैं, जिसमें नौकरियों पर संकट न हो। एआई के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए यह भी जरूरी है कि इस्तेमाल को लेकर स्कूली स्तर से प्रशिक्षण दिया जाए, जिसमें एआई को चलाने के लिए दिए जाने वाले दिशा निर्देश (एआई प्रॉम्प्ट) भी अनिवार्य रूप से शामिल हों। जिससे एआई की गलतियों और खतरों से निपटा जा सके। यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि एआई से जुड़े शोध कार्यों पर खर्च बढ़ाया जाए और इस्तेमाल भी सही दिशा में हो जिससे देश के होनहार वास्तव में इनोवेशन कर सकें।











