नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष चल रही सुनवाई में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति विरोध-प्रदर्शन के नाम पर किसी जगह पर अनिश्चित काल तक कब्जा नहीं कर सकता। यहां तक कि विरोध के लिए निर्धारित जगहों के लिए भी निश्चित समय-सीमा होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि“आप किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। अन्य प्रदर्शनकारी भी हैं। किसान या पत्रकार कहां जाएंगे? सभी को विरोध करने का अधिकार है। एक तय समय के लिए, एक तय अवधि दी जानी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि विरोध का अधिकार और व्यापार करने का अधिकार दोनों महत्वपूर्ण हैं। समाधान यह है कि ऐसी जगहें चिह्नित की जाएं जहां सार्वजनिक विरोध हो, लेकिन आम लोगों के रोजमर्रा के कामकाज (खासकर व्यापारियों) पर असर न पड़े।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील
सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जो कोई भी विरोध या बंद का आह्वान करता है, उसे उसके परिणामों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने बताया कि जंतर मंतर पर विरोध के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी जगह पर कब्जा करके बैठ गए और यहां तक कि संसद की ओर मार्च भी किया। मेहता ने कहा, “संसद या सुप्रीम कोर्ट की ओर बिना अनुमति मार्च नहीं किया जा सकता।”
सुनवाई का संदर्भ
यह सुनवाई उन कई याचिकाओं पर हो रही है जिनमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज के खिलाफ दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान
- अवैध हिरासत ली गई
- प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों पर हमला किया गया
- मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर प्रतिबंध लगाए गए (जिन्हें अदालत की अवमानना बताया गया)
- इंटरनेट सेवाओं में बाधा डाली गई
याचिकाकर्ताओं में CPI(M) महासचिव एम.ए. बेबी, वकील, पत्रकार संगठन, सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी और अन्य शामिल हैं।
व्यापारियों की चिंता
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि विरोध के कारण दुकानें बंद हैं और त्योहारी सीजन में व्यापारियों को भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने अगले दो महीने तक कोई विरोध या धरना न करने की मांग की। इस पर मेनका गुरुस्वामी ने जवाब दिया कि लगभग 7000 हिरासतें हुई हैं — “क्या हम लोकतंत्र के रूप में खून नहीं बहा रहे?”
अदालत ने व्यापारिक संगठनों को विरोध आयोजक संगठनों को भी पक्षकार बनाने को कहा, ताकि मुद्दे का सही निर्धारण हो सके।
पृष्ठभूमि
ये विरोध मुख्य रूप से जंतर मंतर और आसपास के इलाकों में हुए थे। बाद में जंतर मंतर से “निर्दिष्ट विरोध स्थल” का टैग हटा दिया गया था और गृह मंत्रालय ने वैकल्पिक जगहें दी थीं। अदालत पहले भी इसी तरह की टिप्पणियां कर चुकी है (जैसे शाहीन बाग विरोध से जुड़े पुराने फैसलों में), जहां कहा गया था कि सार्वजनिक रास्ते और जगहें अनिश्चित काल तक नहीं घेरी जा सकतीं।
अन्य महत्वपूर्ण बातें सुनवाई से
- अदालत ने पहले सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश दिया था।
- महिला पत्रकारों पर कथित हिंसा की जांच के लिए महिला अध्यक्ष वाली समिति बनाने पर विचार चल रहा है।
- सीजेआई ने रजिस्ट्री को निर्देश देने का प्रस्ताव किया कि नई याचिकाएं तभी स्वीकार की जाएं जब एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड लिखित में बताए कि मुद्दा बिल्कुल नया और अलग है।









