नई दिल्ली । दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान (Ramlila Maidan)कल विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के शक्ति प्रदर्शन का गवाह बना, लेकिन इस महाजुटान की गूंज सिर्फ देश के गलियारों तक सीमित नहीं रही। वैश्विक मीडिया और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अखबारों ने भारतीय राजनीति में आए इस उफान को अपने मुख्य पन्नों पर जगह दी है। अल जजीरा से लेकर ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ और ‘द वाशिंगटन पोस्ट/टाइम्स’ तक, हर विदेशी मीडिया घराने ने विपक्षी दलों की इस एकजुटता को भारत के लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता की बड़ी कसौटी करार दिया है।
अल जजीरा
कतर आधारित अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क ‘अल जजीरा’ ने अपनी रिपोर्टिंग में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के बढ़ते आक्रोश को प्रमुखता से रेखांकित किया। अल जजीरा ने लिखा कि रामलीला मैदान में उतरी भीड़ और नेताओं का एकसुर में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करना यह दर्शाता है कि विपक्ष अब किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर और ‘वोट चोरी’ के गंभीर आरोपों ने केंद्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहज स्थिति में डाल दिया है।
द न्यू यॉर्क टाइम्स
अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ ने इस प्रदर्शन को ‘मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की अब तक की सबसे संगठित और आक्रामक लामबंदी’ का नाम दिया। NYT ने लिखा कि दिल्ली का ऐतिहासिक मैदान लोकतंत्र की रक्षा की हुंकार का केंद्र बन गया है। अखबार ने टिप्पणी की कि चुनावी संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठ रहे सवाल और लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने के दावों ने न केवल सत्तारूढ़ दल बल्कि भारत की लोकतांत्रिक साख को भी वैश्विक कटघरे में खड़ा कर दिया है।
द वाशिंगटन पोस्ट/टाइम्स
अमेरिकी मीडिया समूह ‘द वाशिंगटन टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट का मुख्य केंद्र विपक्षी मोर्चाबंदी और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगे आरोपों को बनाया। अखबार ने लिखा कि विपक्ष का यह ‘जन महाभियोग’ सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त और सरकार की जवाबदेही तय करने का दबाव बना रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि जिस तरह से विपक्षी नेताओं ने एक साथ आकर संस्थानों के दुरुपयोग के खिलाफ मोर्चा खोला है, वह यह साफ करता है कि देश की राजनीति अब एक नए, अत्यधिक संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।
द गार्जियन एवं रॉयटर्स
ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ ने भी इस रैली का विस्तृत विश्लेषण छापा। ‘द गार्जियन’ ने 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों को रेखांकित करते हुए इसे जनाधिकारों का हनन करार दिया, जबकि ‘रॉयटर्स’ ने लिखा कि 2014 के बाद से सत्ता पक्ष के सामने विपक्षी लामबंदी की यह सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में उभरी है।








