नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) में “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” (तार्किक विसंगति) श्रेणी के इस्तेमाल को मंजूरी देना सिर्फ अस्थायी व्यवस्था थी। इसकी वैधता का सवाल अभी खुला है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह टिप्पणी दिल्ली में चल रही रिविजन प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को जारी नोटिसों में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि कोर्ट का 27 मई का फैसला, जिसमें बिहार में SIR को बरकरार रखा गया था, मौजूदा मामलों में हर मुद्दे पर बाध्यकारी मिसाल नहीं माना जा सकता।
जस्टिस बागची ने कहा “बिहार इन कार्यवाहियों में उठने वाले हर सवाल का अंतिम निर्धारण नहीं है,। “बिहार में चुनाव आयोग ने शुरू में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी को एक श्रेणी के रूप में नहीं अपनाया था।”
चुनाव आयोग ने लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी किए हैं, जिसमें उनसे अपने एन्यूमरेशन फॉर्म में स्पष्ट विसंगतियों को समझाने को कहा गया है। इनमें माता-पिता के नाम की वर्तनी में अंतर, माता-पिता और बच्चों के बीच असामान्य रूप से कम उम्र का अंतर, या माता-पिता के छह से ज्यादा बच्चे होने जैसी बातें शामिल हैं।
दिल्ली में ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल के 97.5 लाख मतदाताओं में से 33.1 लाख को नोटिस मिले। इनमें से 13.7 लाख पिछले स्पेशल इंटेंसिव रिविजन की इलेक्टोरल रोल से मैच नहीं हो सके, जबकि 19.3 लाख को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के लिए चिह्नित किया गया।
कई प्रमुख हस्तियों, जिनमें दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल हैं, को भी इस प्रक्रिया के दौरान नोटिस मिले।
चीफ जस्टिस कांत ने पहले कहा था कि उन मतदाताओं से आयोग क्या मांग रहा है, जिनके नोटिस में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का जिक्र है, इसे स्पष्ट करने की गुंजाइश है। मंगलवार को दिल्ली चुनाव आयोग ने कहा कि 31.2 लाख मतदाता, यानी नोटिस पाने वालों में 94 प्रतिशत से ज्यादा, को अंतिम इलेक्टोरल रोल में शामिल करने के लिए मंजूरी दे दी गई है, जिसे 4 दिसंबर को प्रकाशित किया जाना है।
SIR पहली बार 2025 में बिहार में किया गया था और बाद में इसकी दूसरी चरण में 2025 के अंत और 2026 के पहले हिस्से में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। आलोचकों का तर्क है कि यह प्रक्रिया असली मतदाताओं को रोल से हटा सकती है और चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
मई में सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन स्पष्ट किया था कि यह चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार नहीं देता कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं। इसके बावजूद, रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कुछ भाजपा शासित राज्यों ने SIR से जुड़ी कटौतियों का इस्तेमाल राशन कार्ड देने से इनकार करने के लिए किया है, जबकि कुछ मामलों में पुलिस ने पासपोर्ट नवीनीकरण की अनुमति देने से मना कर दिया है।









