नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को उस तरीके की आलोचना की, जिसमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से संबंधित अवमानना याचिकाओं को एक नियमित पीठ की कारण सूची से हटाकर बाद में विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया।यह मामला जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुयान की विशेष पीठ के समक्ष लिया गया। इससे पहले मंगलवार को जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ की कारण सूची से ये अवमानना याचिकाएं अचानक हटा दी गई थीं।
ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के उस फैसले के कथित गैर-पालना से संबंधित हैं, जिसमें सीएपीएफ काडर में आईपीएस प्रतिनियुक्ति पदों को धीरे-धीरे कम करने और अंततः समाप्त करने का निर्देश दिया गया था।शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने विशेष पीठ के समक्ष मामले की लिस्टिंग के तरीके पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मामले को दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के अनुरोध की उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई।
पीठ ने रजिस्ट्री की उस रिपोर्ट का अवलोकन किया, जिसमें बताया गया था कि मंगलवार को अवमानना याचिका सुनने वाली पीठ के समक्ष मामला क्यों सूचीबद्ध नहीं हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि अवमानना और रिट याचिकाओं दोनों में प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने सीजेआई के समक्ष मामलों को एक ही पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था। कारण यह था कि अवमानना कार्यवाही में एक बचाव उसी अधिनियम से जुड़ा था, जिसकी वैधता जुड़ी हुई रिट याचिकाओं में चुनौती दी गई है। संदर्भ के लिए, अवमानना याचिकाएं जस्टिस भुयान की पीठ के समक्ष थीं और रिट याचिकाएं जस्टिस मिश्रा की पीठ के समक्ष थीं।
दीवान ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा, “आप किसी सूचीबद्ध मामले को बोर्ड से इस तरह नहीं हटा सकते। यह अखिल भारतीय अदालत है। लोग पूरे देश से यात्रा की व्यवस्था करके यहां आते हैं। एक बार सूचीबद्ध होने के बाद इसे क्यों हटाया जाए?”जस्टिस मिश्रा ने कहा कि न्यायाधीशों को भी मंगलवार रात करीब 9 बजे ही यह जानकारी मिली कि विशेष पीठ गठित की गई है।दीवान ने कहा कि रजिस्ट्री इस विकास की व्याख्या करने के लिए उपस्थित रह सकती थी और तर्क दिया कि सार्वजनिक रूप से अधिसूचित मामले को सूची के अनुसार लिया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने कहा कि 22 सितंबर को अवमानना याचिका की सुनवाई के समय रिट याचिकाओं के साथ लिस्टिंग का कोई अनुरोध नहीं किया गया था और मंगलवार को भी ऐसा कोई संकेत नहीं था।पीठ ने पूछा कि क्या यह तथ्य नहीं है कि अधिनियम अवमानना कार्यवाही में बचाव है।दीवान ने इसका खंडन करते हुए कहा कि अवमानना अधिनियम से स्वतंत्र आदेशों के पालन से संबंधित है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने मामलों को एक साथ सुनने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि 22 सितंबर को जब अवमानना याचिका सुनी जा रही थी, तब केंद्र का मुख्य बचाव अधिनियम था, इसलिए उन्होंने दोनों समूहों को एक साथ सुनने का अनुरोध किया। जब पीठ ने संकेत दिया कि मामले एक साथ नहीं सुने जा सकते, तब उन्होंने सीजेआई के समक्ष दोनों समूहों को एक साथ लेने का अनुरोध किया।पीठ ने भाटी से कहा कि याचिकाकर्ताओं को इस अनुरोध की जानकारी दी जानी चाहिए थी।जस्टिस मिश्रा ने कहा”वे आश्चर्यचकित रह गए। यह जानकारी पीठ को दी जानी चाहिए थी,” भाटी ने माफी मांगते हुए कहा, “मैं माफी मांगती हूं। यह मेरी गलती है।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी बाद में सुनवाई के दौरान माफी मांगी।










