LENS REPORT: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के नए सीट मैट्रिक्स के अनुसार देश में MBBS की 3,275 नई सीटें बढ़ गई हैं। कुल सीटें अब 1,40,214 हो गई हैं और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 836 तक पहुंच गई है। NEET अभ्यर्थियों के लिए दाखिला थोड़ा आसान दिख रहा है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ सीटें बढ़ाने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और डॉक्टरों का भविष्य बेहतर होगा?
आंकड़ों में छिपा सच
असली खेल आंकड़ों में छिपा है। नए आंकड़ों के मुताबिक:
- सरकारी सीटें: 63,296 से बढ़कर 63,971 हुईं (केवल 675 सीटों का इजाफा)।
- प्राइवेट सीटें: 73,643 से बढ़कर 76,243 हुईं (2,600 सीटों का बड़ा इजाफा)।
कुल बढ़ोतरी का लगभग 80% हिस्सा प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में हुआ है। प्राइवेट कॉलेजों में MBBS की फीस 60 लाख से 1.2 करोड़ तक है। भारी फीस, छिपे हुए चार्ज और बॉन्ड पॉलिसी छात्रों और परिवारों पर बड़ा आर्थिक बोझ डाल रहे हैं।
NEET परीक्षा से उठता भरोसा
एक छात्र के डॉक्टर बनने का सपना NEET परीक्षा की तैयारी से शुरू होता है, लेकिन पिछले कुछ समय में इस परीक्षा की निष्पक्षता पर ही गंभीर सवाल उठे हैं, NEET UG में पेपर लीक की खबरें, सेंटर्स पर धांधली और ग्रेस मार्क्स के अनियोजित वितरण ने लाखों मेहनती छात्रों के भविष्य को अधर में लटकाया है। इतने बड़े आंदोलन के बाद भी बुनियादी चीजों इंटरनेट एग्जाम सेंटर्स में कमियों के चलते अभी भी परीक्षा सही से आयोजित नहीं हो रही है .
लाखों बच्चों के बीच कुछ हज़ार सीटों की होड़ ने कोचिंग हब बन चुके शहरों को डिप्रेशन और आत्महत्याओं के केंद्र में बदल दिया है। दाखिला मिलने से पहले ही छात्र मानसिक रूप से टूट चुके होते हैं। हम सीटें बढ़ा रहे हैं, पर उस बच्चे का मेंटल प्रेशर कौन घटा रहा है जो 18 साल की उम्र में 20 लाख बच्चों के बीच अपने भविष्य को सुनहरा बनाने की जद्दोजहद में लगा है?
एडमिशन के बाद फीस का जाल
जब कोई छात्र NEET क्वालीफाई कर एडमिशन लेता है, तो उसकी असल चुनौतियाँ शुरू होती हैं, बढ़ी हुई 3,275 सीटों में से लगभग 80फीसदी % बढ़ोतरी प्राइवेट कॉलेजों में हुई हैं।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में MBBS की फीस 60 लाख से 1.2 करोड़ तक की फीस वसूली जाती है। इतने भारी-भरकम आर्थिक बोझ के तले दबा छात्र और उसका परिवार पढ़ाई से ज्यादा आर्थिक तनाव झेलता है। गरीब का बच्चा डॉक्टर बनने का सपना देख भी ले, तो जेब इजाजत नहीं देती। कई संस्थान हॉस्टल, लाइब्रेरी और डेवलपमेंट फीस के नाम पर अतिरिक्त पैसे वसूलते हैं। ऊपर से हॉस्टल, लाइब्रेरी, डेवलपमेंट फीस के नाम पर हिडन चार्ज लेते हैं और राज्यों की बॉन्ड पॉलिसी – पढ़ो यहीं, नौकरी करो यहीं, नहीं तो 30-40 लाख रूपये भरो।
गुणवत्ता की समस्या
नए कॉलेजों में कई जगह बुनियादी सुविधाओं की कमी है। Ghost Faculty, मरीजों की कमी, पुराने लैब उपकरण और खराब हॉस्टल आम शिकायतें हैं। बिना पर्याप्त प्रैक्टिकल अनुभव के तैयार डॉक्टर भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को कैसे संभालेंगे?
सरकारी अस्पतालों की हालत
ट्रेनिंग के दौरान रेजिडेंट डॉक्टर 36 से 48 घंटे लगातार ड्यूटी करते हैं। दवाओं की कमी, खराब उपकरण और असुरक्षित माहौल आम बात है। सीटें बढ़ाकर डॉक्टरों को उसी खस्ताहाल सिस्टम में डाल दिया जा रहा है।
स्टाइपेंड का मुद्दा
अगर हम छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बात करें, तो स्थिति और भी चिंताजनक नज़र आती है: छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ व जनजातीय इलाकों में आज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों और बुनियादी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है। हाल ही में पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों ने अपने मेडिकल इंटर्न्स और जूनियर डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की है।
छत्तीसगढ़ में जूनियर डॉक्टर और इंटर्न्स लंबे समय से स्टाइपेंड बढ़ाने की माँग को लेकर आंदोलन और प्रदर्शन कर रहे हैं। 36-36 घंटे की थका देने वाली शिफ्ट करने और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को संभालने के बावजूद यहाँ के युवा डॉक्टरों को पड़ोसी राज्यों की तुलना में काफी कम स्टाइपेंड मिल रहा है। हाथ में 12-15 हजार का स्टाइपेंड उसमें भी लेटलतीफी अलग,,, लगातार ज्ञापनों और माँगों के बावजूद सरकार का यह उदासीन रवैया राज्य के भावी डॉक्टरों के मनोबल को तोड़ रहा है।
जब आप मेहनत का पैसा ही नहीं दोगे, तो वो डॉक्टर मन लगाकर पढ़ेगा या इलाज करेगा?
सीटें बढ़ाना अच्छी बात है लेकिन सिर्फ संख्या बढ़ाने से अच्छे डॉक्टर नहीं बनते। अच्छे डॉक्टर अच्छी लैब, अच्छे मेंटर, सुरक्षित अस्पताल और सम्मानजनक स्टाइपेंड से बनते हैं। जब तक बुनियादी समस्याओं को नहीं सुलझाया जाता, सीटों की वृद्धि केवल दिखावा बनकर रह जाएगी।









