दिल्ली | केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) को लेकर बड़ा ऐलान किया है। सरकार ने 10783 करोड़ की लागत से एक बड़ी रेल परियोजना शुरू करने की बात कही है। इसके अंतर्गत कटनी- पेंड्रा रोड,बिलासपुर -पेंड्रा रोड और खड़गपुर झारसुगुड़ा सेक्शन में तीसरी लाइन बनाई जाएगी।अभी भी यह बेहद व्यस्त व्यावसायिक लाइनें हैं। ये तीनों परियोजनाएं छत्तीसगढ़ के अलाव पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश के 14 जिलों से होकर गुजरेंगी। परियोजनाओं के जरिए भारतीय रेलवे के मौजूदा नेटवर्क में करीब 656 किलोमीटर की वृद्धि होगी।लेकिन सवाल खड़ा होता है कि क्या इस परियोजना का कोई असल फ़ायदा छत्तीसगढ़ को होगा? वह छत्तीसगढ़ जहाँ नक्सलवाद खत्म करने का दावा तो सरकार करती है लेकिन आज भी सरगुजा और बस्तर संभाग को प्रदेश की राजधानी से जोड़ने के लिए रेलों के लिए आम जनता ख़ुद को बेबस महसूस करती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन रेलवे लाइनों की आड़ में खनिज के परिवहन को बढ़ावा देने का मंसूबा निहित है? और जिसका सर्वाधिक फ़ायदा अदानी समूह को हो सकता है।
लंबी दूरी सस्ता कोयला

छत्तीसगढ़ में परसा ईस्ट–कांता बासन और गारे पेलमा क्षेत्र, ओडिशा में तालाबीरा, मध्य प्रदेश में सुलियारी आदि का नाम सबकी जुबान पर है। यह वो इलाक़े हैं जहाँ अदानी समूह की कोयला खदानें निहित हैं या फिर एमडीओ यानि माइनिंग डेवलपमेंट ऑपरेटर की जिम्मेदारी अदानी समूह निभा रहा है। यह एक सामान्य समझ की बात है कि
कोयला खदान से कोयला निकलना ही पर्याप्त नहीं है उनका समयानुकूल परिवहन भी जरूरी है।ऐसा ना हो तो मुनाफ़ा भी कम होता है और कोयला आधारित संयंत्रों की उत्पादकता भी प्रभावित होती है। कैबिनेट के वर्तमान प्रस्ताव पेंड्रा रोड उसी नेटवर्क का महत्वपूर्ण जंक्शन है जहाँ कोरबा–गेवरा दिशा का कोयला मुख्य लाइन से जुड़ता है। अगर योजना के मुताबिल बिलासपुर–पेंड्रा और कटनी–पेंड्रा पर अतिरिक्त पटरियाँ बनती हैं तो कोयला खनन में लगी कंपनियों के लिए रेक का इंतज़ार कम हो सकता है।यक़ीनन इसका बड़ा फ़ायदा अदानी को होगा। कंपनी को एमडीओ अनुबंध में तय उत्पादन और डिस्पैच लक्ष्य पूरे करने में आसानी हो सकती है।
अदानी के बिजलीघर और रेल का खेल
बात केवल कोयला खदानों से निकालकर कोयले के आसान परिवहन की नहीं है। बात इसकी भी है कि अगर इन रेलवे ट्रैकों का विस्तार होता है तो क्या अदानी समूह के बिजलीघरों को भी इसका फ़ायदा होगा? आइए विस्तार से जानते हैं। रायगढ़ थर्मल पावर प्लांट अदानी समूह का है यहाँ पर 800 मेगावाट के दो यूनिटों का निर्माण चल रहा है। एक यूनिट पहले से हैं। अदानी समूह का कहना है कि हम यहाँ और यूनिट बढ़ायेंगे। दिलचस्प यह है कि यह सारे बिजलीघर रायगढ़–झारसुगुड़ा के उसी पूर्वी ट्रंक का हिस्सा है जिस पर चौथी लाइन बन रही है। इस लाइन के बनने से रायगढ़ में अदानी के बिजलीघर को कोयले की पहुँच बेहद आसान हो सकती है। इसी तरह से मध्य प्रदेश के अनूपपुर में अदानी द्वारा 800 मेगावाट की कई इकाइयों वाला पावर प्लांट लगाया जाना है। यह पावर प्लांट कटनी पेंड्रा रोड सेक्शन पर है और कोयले के परिवहन को आसान करेगा। इसी तरह से छत्तीसगढ़ के कोरबा में अदानी समूह द्वारा अधिग्रहित बिजलीघर के दूसरे और तीसरे चरण के विस्तार के बाद बिलासपुर–पेंड्रा रोड सेक्शन कोयले के परिवहन को आसान कर सकता है। कुल मिलाकर अदानी के बिजलीघर अदानी का कोयला देश की रेलवे लाइन होगी।
समुंदर फतह कर सकेगा अदानी समूह

क्या यह रेलवे लाइनें समुदी परिवहन को भी आसान करेंगी? जी हाँ, करेंगी। यह बात बार कही जाती है कि अडानी पोर्ट्स का मॉडल खदान और प्लांट को बंदरगाह से जोड़ना है। गुजरात, केरल जहाँ भी अदानी के पोर्ट हैं यह बात स्पष्ट होती जाती है। ओडिशा में धामरा पोर्ट का भूगोल बहुत कुछ कहता है है। रेलवे का खड़गपुर–झारसुगुड़ा खंड पूर्वी औद्योगिक पट्टी को तटीय और अंतर्देशीय नेटवर्क से जोड़ता है।इससे समूह को यह फायदा हो सकता है कि धामरा या अन्य पूर्वी पोर्ट से आने-जाने वाला बल्क कार्गो भीतरी इलाके तक तेज़ पहुँचे।आयातित कोयला, चूना पत्थर, स्लैग जैसी सामग्री का रेल लिंक मजबूत हो। अदानी समूह हमेशा से मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक की वकालत करता रहा है।
कोयला ही नहीं और भी फायदे
अदानी समूह के पास इस पट्टी में विकासधीन या प्रस्तावित ब्लॉक भी हैं। खदान की पेपर मंजूरी अलग बात है। व्यावसायिक रूप से खदान तब चलती है जब निकासी का रास्ता सुगम हो। मुख्य लाइनों पर तीसरी-चौथी पटरी से भविष्य के उत्पादन को रेल पर डालना आसान हो सकता है। यह वर्तमान खदान का तात्कालिक मुनाफा भले नहीं हो अगले 5–10 साल की क्षमता का सहारा है।यह फ़ायदा केवल कोयले के परिवहन तक सीमित नहीं है। इतिहास गवाह है भारत में वो भी सीमेंट के ब्रांड सफल रहे हैं जिनके पार रेलवे से परिवहन की सुविधा हो।अडानी समूह के पास अंबुजा समेत सीमेंट व्यवसाय है। सीमेंट और क्लिंकर भारी माल है। रेल सड़क परिवहन से सस्ती पड़ती है जब वैगन और पथ उपलब्ध हों। इन लाइनों पर सीमेंट ढुलाई भी सरकारी सूची में है।
छत्तीसगढ़ की जनता के लिए रेलवे के पास सिफर
साल का कोई ऐसा महीना नहीं बीतता जब छत्तीसगढ़ से गुजरने वाली यात्री ट्रेनों के पहिए किसी ना किसी वजह से रुकते ना हों ट्रेनें कैंसिल ना होती हों। कम लोग जानते हैं कि नागपुर से छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाली रेलवे लाइन 1878 के भीषण अकाल में अस्तित्व में आई। बाद में इसे बंगाल तक विस्तार दिया गया। आज इस ट्रैक पर कोयला, सीमेंट विभिन्न खनिज लदे रैक चौबसीन घंटे दौड़ते रहते हैं लेकिन यात्री सुविधाओं को लेकर छत्तीसगढ़ दशकों तक सिर्फ़ गुहार लगाता रहता है। उसकी सुनवाई नहीं होती। आज भी देश के तमाम बड़े शहरों से छत्तीसगढ़ की कनेक्टिविटी बेहद ख़राब है। सिर्फ़ इतना ही नहीं आजादी के 80 सालों बाद भी छत्तीसगढ़ के तमाम शहर अब भी एक दूसरे से जुड़े नहीं है। जरूरी यह था कि ईमानदारी से यात्रियों के लिए रेल सुबिधाओं में विस्तार की बात कही जाती लेकिन कैबिनेट ने यह कहकर इतिश्री कर ली कि यह रेलवे लाइन जहाँ बन रही हैं उनके आस पास 56 लाख लोगों की रिहाइश है। सरकार को ईमानदारी से यह भी बताना चाहिए था कि इनके अस्पास खदाने और कारखाने किनके हैं।











