बस्तर। BASTAR को छत्तीसगढ़ से अलग कर पृथक राज्य बनाए जाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। बस्तरिया राज मोर्चा ने सुकमा जिले में इसके समर्थन में हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। अभियान के बाद पृथक बस्तर राज्य का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।
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मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम का कहना है कि बस्तर के पास अलग राज्य बनने के लिए पर्याप्त भौगोलिक और जनसांख्यिकीय आधार मौजूद हैं। उनके मुताबिक क्षेत्रफल की दृष्टि से बस्तर संभाग देश के कई राज्यों से बड़ा है और यहां की आबादी भी कई राज्यों के मुकाबले अधिक है। वे सवाल उठाते हैं कि जब इससे छोटे भौगोलिक क्षेत्रफल वाले राज्य अस्तित्व में हैं, तो बस्तर को अलग राज्य का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सकता।
मनीष कुंजाम बस्तर के ऐतिहासिक अस्तित्व को भी इस मांग का आधार बताते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान बस्तर क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से दंडकारण्य का हिस्सा रहा है और इसका अपना विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास रहा है।
विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सवाल
बस्तरिया राज मोर्चा का आरोप है कि आजादी के करीब आठ दशक बाद भी बस्तर को विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में अपेक्षित अधिकार नहीं मिल पाए हैं। कुंजाम का कहना है कि संयुक्त मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक बस्तर ने कई प्रभावशाली राजनीतिक नेता दिए, लेकिन प्रदेश की सत्ता में उन्हें अपेक्षित भूमिका नहीं मिली।
वे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में दो उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद बस्तर को इस स्तर का प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
मनीष कुंजाम बस्तर की रेल कनेक्टिविटी को भी क्षेत्र की उपेक्षा से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि बस्तर को रायपुर और दल्ली राजहरा से जोड़ने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन रेल परियोजनाओं का रुख कोत्तागुडम और तेलंगाना की ओर किया जा रहा है।
‘बस्तर को संघर्ष और संसाधनों की राजनीति मिली’
पृथक राज्य की जरूरत बताते हुए कुंजाम बस्तर में दशकों से चले आ रहे नक्सलवाद, सलवा जुडूम और बड़े औद्योगिक समूहों की मौजूदगी का भी जिक्र करते हैं। उनका आरोप है कि बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ लगातार बाहरी शक्तियों को मिला, जबकि स्थानीय लोगों को अपेक्षित अधिकार और विकास नहीं मिला।
मनीष कुंजाम कहते हैं, ‘बस्तर को पहले नक्सली मिले, फिर नक्सली के खात्मे के नाम पर सलवा जुडूम मिला। इसके बाद अडानी, टाटा और एस्सार जैसे उद्योग आए। यह सब बताता है कि बस्तर एक ऐसी जगह बन गया है, जहां सभी लूटने आते हैं। ऐसे में हम पृथक बस्तर की मांग क्यों न करें?’
मोर्चा का कहना है कि हस्ताक्षर अभियान के जरिए इस मांग को जनसमर्थन दिलाने की कोशिश की जा रही है।
मनीष कुंजाम के मुताबिक यह अभी शुरुआत है और आने वाले दिनों में पृथक बस्तर राज्य की मांग को और व्यापक स्तर पर उठाया जाएगा।










