हेमचंद यादव यूनिवर्सिटी के कुलसचिव को हाईकोर्ट से झटका, जांच के खिलाफ याचिका खारिज

Chhattisgarh high court

रायपुर। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (High Court) से झटका लगा है। अपने खिलाफ शुरू की गई तथ्य-संग्रह जांच और उसकी रिपोर्ट को चुनौती देते हुए कुलसचिव ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। उन्होंने जांच को निरस्त करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने याचिका को समयपूर्व मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह जांच औपचारिक विभागीय जांच नहीं, बल्कि आरोपों की वास्तविक स्थिति पता करने के लिए की गई प्रारंभिक तथ्य-संग्रह जांच है।

मामला विश्वविद्यालय की एक दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी से जुड़ा है। आरोप है कि विश्वविद्यालय में कार्यरत महिला कर्मचारी के वेतन से कथित तौर पर राशि ली गई और इसका एक हिस्सा कुलसचिव के बेटे के खाते में ट्रांसफर कराया गया। शिकायत सामने आने के बाद विश्वविद्यालय ने तथ्य-संग्रह समिति गठित कर मामले की जांच कराई थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस में शिकायत की गई और कुलसचिव के खिलाफ FIR दर्ज हुई।

क्या है पूरा मामला?

बताया गया है कि विश्वविद्यालय में दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी शुभांगी मराठे ने आरोप लगाया था कि उसे विश्वविद्यालय में काम के लिए नियुक्त किया गया, लेकिन वह वहां नियमित रूप से काम नहीं करती थी। आरोप के मुताबिक, वह महीने के अंतिम दिन विश्वविद्यालय आती थी और पूरे महीने की उपस्थिति दर्ज कर चली जाती थी।

महिला का आरोप है कि वेतन मिलने के बाद उसके खाते में तय राशि रखकर बाकी रकम कुलसचिव के निर्देश पर उनके बेटे उदय प्रताप कुलदीप के खाते में ट्रांसफर कराई जाती थी।

जून महीने के अंत में विश्वविद्यालय पहुंची महिला ने इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को जानकारी दी। उसने लिखित शिकायत देकर पूरा वेतन दिलाने और विश्वविद्यालय में नियमानुसार काम पर लगाए जाने की मांग की। इसके साथ उसने अपनी बैंक पासबुक की छायाप्रति, शपथपत्र, बैंक स्टेटमेंट और UPI ट्रांजेक्शन से जुड़े दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।

विश्वविद्यालय ने गठित की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी

शिकायत मिलने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच के लिए फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की। समिति ने शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की।

विश्वविद्यालय की ओर से समिति की रिपोर्ट दुर्ग के एसएसपी को भेजकर उचित कानूनी कार्रवाई का अनुरोध किया गया। इसके बाद मोहन नगर थाने में 3 अगस्त को कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(4) के तहत FIR दर्ज की गई।

इसी FIR और जांच की कार्रवाई के बीच कुलसचिव ने हाईकोर्ट का रुख किया।

कुलसचिव ने जांच को दी थी चुनौती

कुलसचिव की ओर से दायर याचिका में 29 जुलाई 2026 को उनके खिलाफ शुरू की गई जांच को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया कि उनके खिलाफ जांच शुरू करने से पहले कुलाधिपति यानी राज्यपाल की पूर्व अनुमति लेना जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

कुलसचिव की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि जांच समिति ने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया। उन्हें जांच शुरू होने की जानकारी भी नहीं दी गई और समिति ने जल्दबाजी में 31 जुलाई को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

याचिकाकर्ता की ओर से इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताते हुए जांच और जांच रिपोर्ट को निरस्त करने की मांग की गई।

सरकार ने कहा- विभागीय जांच नहीं, सिर्फ तथ्य जुटाने की प्रक्रिय

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। सरकार के अधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि कुलसचिव के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई विभागीय जांच नहीं है।

यह केवल आरोपों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए की गई प्रारंभिक तथ्य-संग्रह जांच है।

सरकार की ओर से कहा गया कि कुलाधिपति की पूर्व अनुमति की जरूरत औपचारिक विभागीय जांच शुरू करने के समय होती है। मौजूदा मामले में अभी ऐसी कोई विभागीय जांच शुरू नहीं हुई है।

सरकार ने यह भी कहा कि फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट अपने आप में कोई दंड निर्धारित नहीं करती और न ही इससे कुलसचिव पर तत्काल कोई प्रतिकूल नागरिक परिणाम लागू हुआ है। इसलिए इस स्तर पर हाईकोर्ट में दाखिल याचिका समयपूर्व है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु ने की। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई फिलहाल केवल आरोपों की तथ्यात्मक स्थिति पता करने के लिए की गई प्रारंभिक जांच है।

कोर्ट ने माना कि यह औपचारिक विभागीय जांच नहीं है और फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट अपने आप किसी दंड का आधार नहीं बनती।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कुलाधिपति की पूर्व अनुमति की आवश्यकता तब उत्पन्न होती है, जब औपचारिक विभागीय जांच शुरू की जाए। केवल तथ्य पता करने के लिए की गई प्रारंभिक जांच पर यह प्रावधान लागू नहीं होता।

कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक तथ्य-संग्रह जांच के चरण में याचिकाकर्ता नियमित विभागीय जांच में उपलब्ध सुनवाई के अधिकार को कानूनी अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि तथ्य-संग्रह जांच और उसके आधार पर तैयार रिपोर्ट को चुनौती देना फिलहाल समयपूर्व है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी आधार पर कोर्ट ने भूपेंद्र कुलदीप की रिट याचिका निरस्त कर दी।

दानिश अनवर

दानिश अनवर, द लेंस में जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों का अनुभव है। द लेंस से पहले दैनिक भास्‍कर में इन्‍वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम में सीनियर रिपोर्टर, नवभारत में क्राइम रिपोर्टर, नईदुनिया में स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट और पत्रिका अखबार में रिपोर्टर के तौर पर 10 साल काम किया। इन सभी अखबारों में दानिश अनवर ने विभिन्न विषयों जैसे- क्राइम, पॉलिटिकल, एजुकेशन, स्‍पोर्ट्स, कल्‍चरल और स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन स्‍टोरीज कवर की हैं। दानिश को प्रिंट का अच्‍छा अनुभव है। वह सेंट्रल इंडिया के कई शहरों में काम कर चुके हैं।

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