विचारों की समरभूमि में राहुल गांधी के हाथ में वाल्तेयर का झंडा है!

Rahul Gandhi

‘मैं जानता हूँ कि तुम झूठ बोल रहे हो, पर मैं इस बोलने के अधिकार की भी रक्षा करूँगा’- इस वाक्य को फ्रांसीसी विचारक और दार्शनिक वाल्तेयर के जीवन का सारांश कहा जाता है। वाल्तेयर ने 18वीं सदी के यूरोप को तर्क, स्वतंत्रता, समानता और धर्मिक सहिष्णुता का प्रबोधन दिया था। धर्मिक कट्टरता और निरंकुश राजतंत्र पर उनका वैचारिक हमला बाद में फ़्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति का वैचारिक आधार बना। नागरिक अधिकारों को राजनीति के केंद्र में लाने के लिए वाल्तेयर को दुनिया भर में सम्मान के साथ याद किया जाता है।

वाल्तेयर के नाम से प्रचारित उसी वाक्य की गूंज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उस बयान में थी जो 13 अगस्त 2026 को रचनात्मक कांग्रेस के मंच पर उन्होंने आरएसएस को लेकर दिया। उन्होंने कहा कि ‘जिस दिन आरएसएस की अभिव्यक्ति को देश से खत्म करने की बात होगी, उस दिन मैं उनकी रक्षा करूँगा, क्योंकि अभिव्यक्ति उनकी भी है।’ उन्होंने आगे यह भी जोड़ा- “अगर बात अच्छी नहीं लगी तो हम उनसे कहेंगे कि भाई, तुम्हारी बात से मूड खराब हो गया / तुमने गलत कहा…इसको अलग तरीके से बोलो… प्यार से बोलो।”

लेकिन अचरज की बात है कि यूँ उदारवादी ख़ेमे में शामिल किये जाने वाले कई बुद्धिजीवी राहुल गाँधी की आधी बात को ले उड़े। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल आरएसएस के प्रति उदार हो गए हैं, नरम पड़ गए हैं, संघ को वैधता दे रहे हैं। इसी बहाने कांग्रेस के इतिहास को भी बाँचा जाने लगा कि कैसे आरएसएस को मिली कांग्रेस सरकारें उदार रही हैं। कुछ लोग तो ‘कांग्रेस-बीजेपी एक है’ का संपुट भी दोहराने लगे जिसने बीते दशकों में आरएसएस को कितना फ़ायदा पहुँचाया है, इस पर अलग से शोध होना चाहिए।

हालाँकि राहुल गाँधी उसी भाषण में आरएसएस को बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों का एजेंट बता रहे थे, पुराने संघ को मृत घोषित कर रहे थे और विचारधारा की लड़ाई बेख़ौफ़ लड़ने की बात कर रहे थे। वे बार-बार दोहरा रहे थे कि लड़ाई ‘ऑर्डर बनाम एक्सप्रेशन’ की है। आरएसएस और भाजपा ‘ऑर्डर’ थोपना चाहते हैं, कांग्रेस ‘एक्सप्रेशन’ की तरफ है। लड़ाई तो जारी रहेगी, लेकिन नफरत और हिंसा के बिना, प्यार और अहिंसा के साथ।

सवाल ये है कि आरएसएस ख़त्म कैसे होगा? क्या आरएसएस झंडेवालान में केशवकुंज में हालिया बनीं तीन बहुमंज़िला इमारतों का नाम है जिसे राहुल गाँधी को सरकार बदलने पर बुलडोज़र से ढहाने की घोषणा कर देनी चाहिए। और ऐसा करने से भी क्या आरएसएस ख़त्म हो जाएगा? या आरएसएस उन संकीर्णताओं का नाम है जो धर्म, जाति, लिंग, राष्ट्र आदि को लेकर समाज के बड़े हिस्से को संक्रमित कर रही हैं। ‘अन्य से नफ़रत’ और मिथ्याभिमान उनमें भी है जो शाखा नहीं जाते। यानी आरएसएस अंततः एक विचार ही है जिसे विचार के मैदान में ही हराना होगा। वाद-विवाद और संवाद की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण होगी।

इस संदर्भ में रूस की बोल्शेविक क्रांति को लेकर महात्मा गाँधी का विश्लेषण याद रखना चाहिए। 15 नवंबर 1928 को गाँधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा: “बोल्शेविक आदर्श के पीछे अनगिनत पुरुषों-महिलाओं का शुद्ध बलिदान है। लेनिन जैसे महान आत्माओं के बलिदान से पवित्र हुआ आदर्श व्यर्थ नहीं जा सकता। उनका त्याग हमेशा चमकता रहेगा और आदर्श को शुद्ध तथा जीवंत बनाएगा।” लेकिन लेनिन की महानता को स्वीकार करने के बाद गाँधी जी आगे लिखते हैं—“बोल्शेविज्म हिंसा को खुले तौर पर स्वीकार करता है। अगर ऐसा है, तो मैं बिना हिचकिचाहट कहता हूँ कि बोल्शेविक शासन अपने वर्तमान रूप में लंबे समय तक नहीं टिक सकता। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिंसा पर कुछ भी स्थायी नहीं बनाया जा सकता।”

महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सही साबित हुई। रूसी क्रांति बीसवीं सदी की महान घटना थी लेकिन वह इक्कीसवीं सदी का मुँह नहीं देख पायी। अपने तमाम महान प्रयोगों और उपलब्धियों के बावजूद विचारधारा के मैदान में तर्क नहीं बंदूक़ से हासिल जीत सोवियत यूनियन का विघटन नहीं रोक पायी। विडंबना ये है कि जिस अंतिम सम्राट ज़ार निकोलस द्वितीय को पूरे ख़ानदान समेत ख़त्म कर दिया गया था आज उसी रूस में उसके अवशेष ढूँढकर ‘संत निकोलस’ के रूप में पुनर्स्थापित किया गया है। ज़ारशाही के दौर में होने वाले शोषण और अत्याचार को भुला दिया गया है।

भारत की स्थिति इस मामले में विशिष्ट रही है। नेहरू जी के नेतृत्व में बने पहले मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे अंग्रेज़ों का साथ देने वाले व्यक्ति को शामिल करके ये संदेश दिया गया था कि आज़ादी सिर्फ़ उनके लिए नहीं है जो इसके लिए लड़े। जो नहीं लड़े, आज़ादी का फल उन्हें भी मिलेगा। किसी को देशद्रोही करार नहीं दिया गया। न कांग्रेस कमेटियों को ज़िला प्रशासन में बदला गया। विपक्ष को पूरी छूट दी गयी कि वह जनता के बीच अपनी विचारधारा को प्रचारित करके कांग्रेस को ग़लत साबित करे। एक खूनी बँटवारे की पृष्ठभूमि में शासन-सत्ता सँभालने के लिए किसी नफ़रत या उन्माद को अपनी राजनीतिक शक्ति में नहीं बदला गया। उल्टा ‘हिदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई’ जैसे नारों को कॉमन सेंस का हिस्सा बनाने का प्रयास किया गया। ऐसा नहीं है कि नफ़रत, पाखंड, रूढ़ियाँ, भेदभाव आदि का अस्तित्व नहीं रहा, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के नायक जानते थे कि इनका नाश करने के लिए कई पीढ़ियों तक वैचारिक संघर्ष करना पड़ेगा।

कांग्रेस के बनाये इसी परिवेश का नतीजा था कि ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाने वालों को भी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए बरी कर दिया था कि देशद्रोह का मामला तब तक नहीं बनता जब तक कि कोई एक्शन न हो। किसी को विचारधारा के कारण दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निश्चित ही इसका फ़ायदा आरएसएस ने भी उठाया। लेकिन लोकतंत्र का यह तक़ाज़ा है कि लोकतांत्रिक अधिकार सबके होते हैं। अपने विचार के पक्ष में जनमत तैयार करने का अधिकार सबको है।

भारत इस मुसलसल संघर्ष के ख़ास पड़ाव पर है। इस दौर में कॉरपोरेट पूँजी के साथ नत्थी होकर नफ़रत की ताक़तें प्रबल हो गयी हैं। राहुल गाँधी इस बात को समझते हैं इसलिए उनके निशाने पर दोनों हैं। लेकिन मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने जिस तरह संविधान के तमाम संकल्पों को उलटने का अभियान शुरू किया है उससे निपटने के लिए व्यापक एकजुटता की ज़रूरत है। छात्र-युवाओं ने जिस तरह सड़क पर निकलकर इस सरकार की साख की धज्जियाँ उड़ा दी हैं, उसने बड़ी संभावनाओं को जन्म दिया है। लेकिन ‘आयडिया ऑफ़ इंडिया’ की निर्णायक जीत के लिए राहुल गाँधी का रास्ता ही प्रभावी होगा जो आरएसएस के ख़तरे से निपटने के लिए किसी ‘शॉर्टकट’ नहीं पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले वैचारिक संघर्ष की माँग करता है।

रिपब्लिक बनाने की लड़ाई महत्वपूर्ण थी, लेकिन ‘रिपब्लिक बचाने’ की लड़ाई कहीं ज़्यादा श्रमसाध्य है और लंबी है जिसे राहुल गाँधी उसी तरह लड़ना चाहते हैं जो उनकी परंपरा की पहचान है-अहिंसा और सत्याग्रह।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now