रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी और पद्मश्री से सम्मानित अनूप रंजन पांडेय (Anoop Ranjan Pandey) को लोक एवं जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान के लिए गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति ने देशभर से आए कलाकारों को सम्मानित किया। पांडेय ने यह पुरस्कार छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया।
अनूप रंजन पांडेय पिछले चार दशक से लोक संगीत, रंगमंच और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ की मौखिक परंपराओं को सहेजते हुए करीब 2500 लोकगीत, लोकगाथाओं और लोकवार्ताओं, 150 नाचा के नकल-प्रहसनों और 175 लोकवाद्यों का संकलन किया है।
बस्तर बैंड से शांति का संदेश
पांडेय के काम का एक महत्वपूर्ण अध्याय ‘बस्तर बैंड’ है। करीब डेढ़ दशक पहले उन्होंने बस्तर के आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की। पारंपरिक और दुर्लभ लोकवाद्यों को मंच पर पहचान दिलाने के साथ बस्तर बैंड ने ‘बंदूक छोड़ो… ढोल पकड़ो’ अभियान चलाया।
इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को हिंसा से दूर कर रचनात्मक गतिविधियों और लोककला से जोड़ना था। इसके तहत 100 से अधिक कला मंडलियों को पुनर्गठित कर 5 हजार से ज्यादा कलाकारों को सक्रिय किया गया। बस्तर बैंड ने रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली समेत कई देशों में छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की प्रस्तुतियां दी हैं।
पद्मश्री समेत कई सम्मान
अनुप रंजन पांडेय को वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें वरिष्ठ अध्येतावृत्ति, टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप, दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान और राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएचडी भी की है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने समारोह में लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलते समय में कई लोककलाएं विलुप्ति के संकट से गुजर रही हैं। ऐसे में कलाकारों का दस्तावेजीकरण और परंपराओं को जीवंत बनाए रखना बेहद जरूरी है।
श्री पांडेय ने कहा कि यह सम्मान उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी कला से जुड़े हजारों कलाकारों की साधना का सम्मान है।









