मौसम विज्ञान विभाग ने अप्रैल से जून के मध्य पूरे भारत में तेज लू की चेतावनी जारी की है। तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने की आशंका के बीच कई राज्यों में स्कूल समय से पहले बंद करने पड़े हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में बिजली की मांग रिकॉर्ड 256.11 गीगावॉट तक पहुंच गई है। एनसीआरबी के हवाले से एक रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2000 से 2020 तक भारत में लू लगने से 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई है।
ऐसे में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी में कहा कि वे न एसी गाड़ी में चलते हैं, न एसी कमरे में रहते हैं। बस जेब में प्याज रखते हैं। उनका कहना है कि प्याज रखो तो 51 डिग्री सेल्सियस में भी गर्मी नहीं लगेगी!
लगता है जैसे देश में होड़ सी मच गई है कि कौन कितनी अवैज्ञानिक सलाह देगा। कोई गौमूत्र से कैंसर के इलाज का दावा कर रहा है, कोई किसी बिना जांची-परखी दवा से कोरोना का इलाज कर रहा है।
हिंदुस्तान गरीबों का देश है। यहां राजा-महाराजा, बाबा, मौलवी, पादरी गरीब अशिक्षित जनता को जो समझा दें, बिचारी उसी को सच समझने लगती है। कोई चमत्कारी ताबीज दे दे तो ऐसे लोगों को लगता है कि उसी से दुनिया बदल जाएगी!
जनता तो भोली है पर ज्योतिरादित्य सिंधिया से तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे जनता को समझाएं कि गर्मियों में लू लगने पर विज्ञान की शरण में जाए, न कि ऐसे उपाय समझाएं जो चिकित्सा सम्मत नहीं हैं, जिन्हें अपनाने की सलाह कोई डॉक्टर नहीं देता।
ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कोई मंत्री जब सार्वजनिक मंच से ऐसी सलाह देता है तो उन्हें शायद ध्यान नहीं होता कि इस देश में गर्मी जिस तरह से बढ़ रही है, उसका नाता उस सम्पन्न तबके की प्राकृतिक संसाधनों की लूट और अनियंत्रित उपभोग की प्रवृत्ति से ही है, जिसके कारण देश जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों को झेल रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जलवायु परिवर्तन जैसी किसी चीज को मन का वहम ही मानते हैं। क्या सिंधिया जी भी?
ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह कहां दिखता होगा कि उनकी प्रजा दो वक्त की रोटी के लिए भरी दुपहरी में खेतों में, कारखानों में पसीना बहाती है और उसके लिए न ठीक से अस्पताल हैं, न इलाज के बहुत बेहतर इंतजाम। केंद्रीय मंत्री शिवपुरी में ही कुपोषण का हाल देख लें। इस जनता की जेब में प्याज रखवा कर कोई केंद्रीय मंत्री असली सवालों से कैसे ध्यान भटका सकता है?
जरूरी यह है कि ताली बजवाने वाले भाषणों के बजाय इस जनता से उसके ठोस सवालों पर बात की जाए, उसके सवालों के जवाब दिए जाएं। उसे बताएं कि हे जनता, प्याज मन का भरम है, जरूरी है कि उस सम्पन्न तबके की जरूरतों पर अंकुश लगाया जाए, जिसकी वजह से देश में धड़ाधड़ जंगल कट रहे हैं, औद्योगिकरण के नाम पर जल स्रोतों को कॉरपोरेट के हवाले किया जा रहा है, देश का पर्यावरण तबाह हो रहा है। संतुलित विकास के बजाय विकास के नाम पर देश को एक ऐसी अंधी सुरंग में धकेल दिया गया है जहां जनता के लिए बस प्याज ही लटके मिल रहे हैं!
अच्छा होता कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश से लेकर देश की सरकार तक के लोगों को यही सलाह देते कि एसी छोड़ो, जेब में प्याज रख कर चलो!
बात तब गंभीर और विवेकपूर्ण होती जब एक केंद्रीय मंत्री पर्यावरण को बचाने की बात करते और लोगों को समझाते कि पर्यावरण के विनाश के ही कारण तापमान 45 डिग्री पार जा रहा है।
पर जनता को शिक्षित करेंगे तो जनता सवाल करने लगेगी और सवाल करती जनता चाहिए नहीं। इससे बेहतर है कि उस जनता की जेब में प्याज रखवाओ और छुट्टी पाओ!











