23 अप्रैल 2026 को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों मणिपुर और मिजोरम से 250 से ज्यादा लोग तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरे। ये लोग बनेई मेनाशे (Bnei Menashe) समुदाय के सदस्य हैं जो खुद को बाइबिल में वर्णित ‘खोई हुई दस जनजातियों’ में से एक मनाशे जनजाति का वंशज मानते हैं। एयरपोर्ट पर उनका जोरदार स्वागत किया गया।
नीले और सफेद रंग के गुब्बारे, इजरायली झंडे और पारंपरिक यहूदी गीतों के साथ इन नए प्रवासियों (ओलिम) का स्वागत हुआ। कई लोग भावुक हो गए, क्योंकि यह उनके लिए सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पहचान और ‘घर वापसी’ का सपना पूरा होने का पल था।
बनी मेनाशे समुदाय कौन हैं?
बनी मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से मणिपुर और मिजोरम में रहता है। ये लोग मानते हैं कि उनकी जड़ें प्राचीन इजराइल की ‘मनाशे’ जनजाति से जुड़ी हैं जो हजारों साल पहले बिखर गई थी। सदियों तक वे फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होते हुए भारत के पूर्वोत्तर पहुंचे।
इस लंबे सफर के दौरान उन्होंने कुछ यहूदी परंपराएं जैसे खतना (circumcision) आज भी बनाए रखीं। ब्रिटिश काल में कई लोग ईसाई बन गए लेकिन कुछ परिवार पुरानी यहूदी परंपराओं को आज भी बनाए रखते हैं। आज भारत में इस समुदाय के करीब 10,000 सदस्य हैं।
क्यों हो रहा है यहां पलायन ?
धार्मिक और सांस्कृतिक कारण – समुदाय के लोग इजराइल को अपना ‘पूर्वजों की भूमि’ मानते हैं। वे वहां जाकर पूर्ण रूप से यहूदी जीवन जीना चाहते हैं।
परिवारों का मिलन – कई परिवार पहले ही इजराइल जा चुके हैं। अब बाकी सदस्य उनसे जुड़ रहे हैं। एयरपोर्ट पर भावुक दृश्य देखने को मिले जहां पहले पहुंचे रिश्तेदार नए आने वालों का स्वागत कर रहे थे।
भारत में चुनौतियां – मणिपुर में पिछले कई सालों से जातीय हिंसा चल रही है। इससे समुदाय के कई लोग प्रभावित हुए हैं।
इजराइल सरकार ने पिछले साल यह योजना मंजूर की थी। इसका मकसद 2030 तक बाकी बचे करीब 6,000 सदस्यों को इजराइल लाना है। 2026 में करीब 1,200 लोगों के आने की उम्मीद है। यह 250 लोगों का जत्था इजरायल सरकार की नई योजना ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’ का पहला हिस्सा है। नवंबर 2025 में इजरायली सरकार ने फैसला किया था कि बाकी बचे 4,600 सदस्यों को इजरायल लाया जाएगा।
हर साल करीब 1,200 लोग आने की उम्मीद है। 2030 तक पूरे समुदाय को इजरायल पहुंचाने का लक्ष्य है। नए आने वाले लोग मुख्य रूप से उत्तर इजरायल में बसाए जाएंगे। इजरायल के इंटीग्रेशन मंत्री ओफिर सोफेर ने एयरपोर्ट पर स्वागत करते हुए कहा, ‘यह एक ऐतिहासिक पल है। यह योजना पूरे समुदाय को यहां लाने की शुरुआत है।’
पूर्ण नागरिकता पाने से पहले उन्हें यहूदी धर्म में औपचारिक रूप से परिवर्तित होना होगा। शावेई इजराइल (Shavei Israel) संगठन 1990 के दशक से इस समुदाय की मदद कर रहा है। अब तक हजारों लोग इजराइल जा चुके हैं। यह पलायन इजरायल-ईरान और लेबनान के बीच तनाव के समय हो रहा है, फिर भी समुदाय के लोग मजबूती से इजरायल पहुंच रहे हैं। यह कहानी इतिहास, धर्म, संघर्ष और इंसानी भावनाओं से जुड़ी है। सदियों के बाद ‘खोई हुई’ जनजाति के वंशज अब अपने ‘घर’ लौट रहे हैं।
युद्ध के बीच भी क्यों आ रहे हैं ?
यह पलायन इजराइल-ईरान और इजराइल-लेबनान ( हिज्बुल्लाह ) के बीच तनाव के समय हो रहा है। कुछ इलाकों में हाल ही में मिसाइल हमले भी हुए हैं फिर भी समुदाय के लोग इजराइल को ‘घर’ मानकर आ रहे हैं। इजराइल सरकार परिवारों को एकजुट करने और समुदाय की वापसी को पूरा करने पर जोर दे रही है। यह पहला बैच है। अगले हफ्तों में और उड़ानें आने वाली हैं। कुल मिलाकर यह इजराइल की एक बड़ी योजना का हिस्सा है जो धार्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय आधार पर चल रही है।











