गुजरात के आनंद से भाजपा सांसद मितेश पटेल ने निकाय चुनाव से तीन दिन पहले वोटरों को सीधे धमकी दी है कि उनके क्षेत्र में अगर कांग्रेस ने एक सीट भी जीती तो उस क्षेत्र को विकास के लिए एक रुपया भी नहीं मिलेगा।
क्या कोई सांसद,कोई नेता जनता को ऐसी धमकी दे सकता है? क्या ये मितेश पटेल जैसा कोई नेता तय करेगा कि जनता किसको वोट दे? क्या इस देश का संविधान नितेश पटेल जैसे किसी नेता को यह अधिकार देता है कि वो सरकारी खजाने को अपनी बपौती की तरह इस्तेमाल करे?
इस सांसद का बयान वस्तुतः सीधे जनता को धमकी है और जिस तरह यह धमकी दी गई है, वह लोकतांत्रिक मार्यादा को न सिर्फ तार-तार करती है बल्कि सत्ता का अहंकार भी दिखाती है।
एक चुनावी सभा में मितेश पटेल ने कहा था कि यदि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक भी उम्मीदवार स्थानीय निकाय चुनाव में जीतता है, तो उनके विकास फंड से उस क्षेत्र को एक भी रुपया नहीं मिलेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे खुद यह सुनिश्चित करेंगे ताकि सबक सिखाया जा सके।
क्या चुनाव आयोग को ऐसे बयान दिखाई नहीं देते?
क्या सत्ताधारी नेता के ऐसे बयान निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव का भरोसा दिलाते हैं?
कांग्रेस ने इसे मतदाताओं को धमकाने वाली कार्रवाई बताते हुए राज्य चुनाव आयोग से शिकायत की है।
लेकिन विचार इस बात पर करना चाहिए कि कोई सत्ताधारी नेता आज ऐसा हौसला पाता कहां से है?
हकीकत यह है कि ये किसी एक इलाके के किसी एक नेता की बात नहीं है। आज भारत की चुनावी राजनीति ऐसी धमकियों और ऐसे ही हथकंडों के शिकंजे में है !
हकीकत यह है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं दिल्ली से लेकर जिलों के स्तर तक अपनी विश्वसनीयता को दांव पर लगा चुकी हैं। हर रोज देश के किसी कोने से एक उदाहरण ऐसा देखने–सुनने को मिलता है जिससे यह महसूस होता है कि क्या इस देश के संसदीय लोकतंत्र की पहरेदारी एक ऐसी संस्था के हवाले है जो निष्पक्ष नहीं रह गई है ?
मितेश पटेल का ये अंदाज नया नहीं है। 2022 में भी उनका वोटर को इसी अंदाज में धमकाने वाला वीडियो वायरल हो चुका था। अगर चुनाव आयोग या उसके तंत्र की रीढ़ मजबूत बची होती तो किसी मितेश पटेल की दुबारा ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं होती ।
दरअसल आज देश में जो मूल्य सबसे ज्यादा संकट में हैं वो न्याय,निष्पक्षता,लोकतांत्रिक मर्यादाएं ही हैं। हमारा संविधान इन्हीं मूल्यों की हिफाजत ही तो करता है।किसी एक इलाके में भी यदि इन मूल्यों पर हमला होता है तो वो संविधान पर ही हमला होता है।
इस बात को समझना होगा कि ये सब सिर्फ सत्ता के अहंकार के लक्षण नहीं हैं। ऐसी प्रवृत्तियां आज देश में एक सुनियोजित कोशिशों का ही परिणाम हैं।ये कोशिशें इस देश से लोकतांत्रिक सांसों को छीन लेने की साजिश है।
हमने आजादी दुनिया के सबसे बड़े स्वतंत्रता संग्राम की बदौलत हासिल की है। जिस विकास को मितेश पटेल जैसे सांसद अपनी धमकियों के औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं उसका हक इस देश की जनता ने बलिदान की एक महान परंपरा से हासिल किया है।एक ऐसी परम्परा जहां मितेश पटेल या उनके राजनीतिक पुरखे दूर–दूर तक कहीं नहीं थे।
चुनाव आयोग को भी यह ध्यान रखना होगा कि इस देश के लोकतंत्र की हिफाजत उसके जिम्मे है।इस पर खतरा मंडराता ही तो अपराधी चुनाव आयोग और उसका पूरा तंत्र भी होगा।
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