क्‍या पूरी होगी केजरीवाल की मांग? RSS के किन कार्यक्रमों में गई थीं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ?

Justice Swarna Kanta Sharma

नई दिल्‍ली। दिल्ली हाईकोर्ट में शराब नीति मामले में एक अनोखा और चर्चित मोड़ आया है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को खुद कोर्ट पहुंचकर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से रिक्यूजल (खुद को केस से अलग करने) की मांग की। उन्होंने दलील दी कि जज के कुछ कार्यक्रमों में भाग लेने से उन्हें निष्पक्ष सुनवाई मिलने का उचित अंदेशा नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि केजरीवाल ने पार्टी-इन-पर्सन (खुद वकील बनकर) डेढ़ घंटे से ज्यादा दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (Adhivakta Parishad) के चार कार्यक्रमों में शामिल हो चुकी हैं।

गौरतलब है कि यह संगठन आरएसएस के संस्थापक विचारकों में से एक दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा 1992 में स्थापित किया गया था और इसे आरएसएस-बीजेपी की विचारधारा से जुड़ा माना जाता है।

केजरीवाल ने किन चार घटनाओं का जिक्र किया

  • दिसंबर 2022: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में गेस्ट ऑफ ऑनर।
  • मार्च 2023: इंटरनेशनल वीमेंस डे पर ‘शक्ति पर्व’ में स्पीकर।
  • अगस्त 2024: भारतीय न्याय संहिता पर स्टडी सर्कल में चीफ गेस्ट।
  • अगस्त 2025: ‘Women Advocates की चुनौतियां’ विषय पर कार्यक्रम।

उन्होंने कहा, “मैं न्यायपालिका का सम्मान करता हूं, लेकिन मुझे वास्तविक और गंभीर आशंका है कि इस बेंच से निष्पक्ष सुनवाई नहीं होगी।” उन्होंने दावा किया कि कोर्ट में सीबीआई-ईडी की हर मांग को लगभग जजमेंट की तरह स्वीकार कर लिया गया, जिससे उन्हें दोषी करार दिए जाने जैसा महसूस हुआ।

जस्टिस शर्मा ने बीच-बीच में कहा, “आप सिर्फ रिक्यूजल पर फोकस करें।” अंत में उन्होंने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की, “आपने बहुत अच्छी दलील दी। आप वकील बन सकते हैं।” केजरीवाल ने तुरंत जवाब दिया, “मैं अपने वर्तमान व्यवसाय (राजनीति) से बहुत खुश हूं।” सीनियर वकील संजय हेगड़े ने मजाक में कहा, “केजरीवाल जी, कॉम्पिटिशन मत बढ़ाइए!”

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कौन हैं?

जस्टिस शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) इंग्लिश में टॉपर रहीं। दौलत राम कॉलेज से पढ़ाई की। 1991 में एलएलबी, 2004 में एलएलएम और 2025 में पीएचडी (विषय: न्याय की संवैधानिक कल्पना और न्यायिक शिक्षा) पूरी की। 24 साल की उम्र में मजिस्ट्रेट बनीं, 35 साल में सेशंस जज और 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट की स्थायी जज बनीं। उन्होंने सीबीआई स्पेशल जज के रूप में भी काम किया और कई फिक्शन व नॉन-फिक्शन किताबें लिखी हैं।

शराब नीति मामले का बैकग्राउंड

फरवरी 2026 में ट्रायल कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 22 लोगों को आरोप-मुक्त कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई का केस जांच में टिक नहीं पाया। सीबीआई ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां जस्टिस शर्मा की बेंच ने नोटिस जारी किया। केजरीवाल ने इसी सुनवाई में रिक्यूजल की मांग की।

CBI का जवाब

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि ये आरोप बेबुनियाद हैं। सिर्फ सेमिनार या बार एसोसिएशन के कार्यक्रम में जाना बायस (पक्षपात) नहीं साबित करता। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाईकोर्ट के कई जज (जस्टिस सूर्य कांत समेत) भी इस संगठन के कार्यक्रमों में जा चुके हैं। अगर ऐसा आधार माना गया तो कई जजों को केस से हटना पड़ेगा। मेहता ने इसे “मालाफाइड” और “जुवेनाइल आर्ग्यूमेंट” बताया तथा कुछ दलीलों पर कंटेम्प्ट की कार्रवाई की मांग की।

अब क्या?

कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। मुख्य सवाल यह है कि क्या कार्यक्रमों में जाना पर्याप्त आधार है रिक्यूजल का? या यह अनुकूल बेंच तलाशने की कोशिश है? जस्टिस शर्मा ने खुद कहा था कि रिक्यूजल दो वजहों से हो सकता है या तो जज को खुद लगे कि वह निष्पक्ष नहीं कर पाएंगी या याचिकाकर्ता का उचित अंदेशा।

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