कुवैत में 20 भारतीय नागरिकों की मौत और उनके शवों को विशेष उड़ान से कोच्ची एयरपोर्ट लाए जाने का मामला बेहद चौंकाने वाला है। सबसे दुखद यह है कि ये शव भारत पहुंचाए गए, लेकिन केंद्र सरकार ने देश को इसकी कोई आधिकारिक जानकारी देने की जरूरत नहीं समझी। विदेश मंत्रालय बार-बार दावा करता रहा कि मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच चल रहे युद्ध में भारतीयों की सुरक्षा के लिए उसका मिशन मजबूती से काम कर रहा है। फिर यह चुप्पी क्यों?
कोच्ची एयरपोर्ट के अधिकारियों का बयान तो और भी हैरान करने वाला है वे कहते हैं कि हर मामले में मौत के कारणों की जानकारी उनके पास नहीं है। क्या इतने भारतीयों की मौत के पीछे के कारणों का पता लगाना भी हमारी कूटनीति की प्राथमिकता नहीं है? हैरानी यह भी है कि कुवैत से भी यह समाचार नहीं आया।
यह घटना महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस मानवीय गरिमा का भी हनन है, जिसमें हमारे किसी नागरिक की मौत युद्धकाल में हो तो उसे संवेदना के साथ देश को बताया जाए।
मध्य पूर्व में लाखों भारतीय काम करते हैं। वे तेल कंपनियों, निर्माण क्षेत्रों और सेवा उद्योग में अपनी मेहनत से विदेशी मुद्रा भेजते हैं। फिर भी जब क्षेत्र में तनाव बढ़ता है चाहे ईरान के हमले हों या क्षेत्रीय संघर्ष तो विदेश मंत्रालय का रवैया ‘सब ठीक है’ वाला ही रहता है।
एक तरफ सरकार दावा करती है कि दूतावास और वाणिज्यिक मिशन 24 घंटे सक्रिय है, दूसरी तरफ शवों की वापसी में देरी का कारण हवाई उड़ान में व्यवधान बताया जाता है। सवाल यह है कि इस संकट में अतिरिक्त प्रयास क्यों नहीं किए गए?
विदेश नीति का मूल उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा, हितों की रक्षा और रणनीतिक कूटनीति होना चाहिए। कुवैत जैसे देशों में भारतीय दूतावास को पहले से ही मजबूत निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली बनानी चाहिए थी। मौत के कारणों की स्पष्ट जानकारी न होना दुर्भाग्यजनक है।
प्रधानमंत्री का ‘विश्वगुरु’ नारा तभी सार्थक होगा, जब भारतीय चाहे वह दुनिया के किसी कोने में हो उसकी सुरक्षा भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल हो।
क्षेत्रीय संघर्षों में भारतीयों की निकासी के लिए पहले से तैयार आपातकालीन योजनाएं होनी चाहिए। कूटनीति का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े सम्मेलनों में भाषण नहीं, बल्कि सीमा पार बैठे अपने नागरिकों की सुरक्षा की जवाबदेही तय करना भी है।











