लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को सदन में गिरना ही था, क्योंकि सरकार के पास विपक्ष की तुलना में संख्या ज्यादा थी। लेकिन इस पर हुई चर्चा ने दिखा दिया है कि सदन किस तरह से उर्ध्वाधर तरीके से विभाजित है।
इस प्रस्ताव से समन्वय का रास्ता निकलना तो दूर जिस तरह से गुरुवार को लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता पर टिप्पणी की वह अपने आपमें दुर्भाग्यपूर्ण है। बिरला ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता खुद को सदन से ऊपर समझते हैं! लोकसभा के अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से इस तरह की टिप्पणी की अपेक्षा नहीं की जाती। दरअसल पूरी चर्चा के दौरान जिस तरह से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित सत्ता पक्ष के सदस्यों ने राहुल गांधी को निशाना बनाया, उससे लगता है, मानो यह अविश्वास प्रस्ताव अकेले राहुल गांधी ने लाया था। जबकि हकीकत यह है कि इस प्रस्ताव को विपक्ष के सारे सदस्यों का समर्थन हासिल था।
ऐसा लगता है कि राहुल गांधी पर हमला कर सरकार विपक्ष में फूट डालना चाहती है और उन मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है, जिससे वह बुरी तरह से घिर चुकी है।
हैरत होती है कि गृहमंत्री ने सदन पर हुई चर्चाओं के दौरान विपक्ष के नेता की विदेश यात्राओं के ब्योरे तो दिए, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि आखिर इतने महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर सरकार की ओर से खुद प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में आकर जवाब देना जरूरी क्यों नहीं समझा?
वास्तविकता यह है कि इस महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी सदन में रहने के बजाय केरल और तमिलनाडु में रैलियां कर रहे थे।
सरकार की ओर से बार-बार 1954 में प्रथम लोकसभा अध्यक्ष जी वी मावलंकर और 1987 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री क्रमशः पंडित जवाहरलाल नेहरू और राजीव गांधी तक का जिक्र किया गया। याद दिलाया जा सकता है कि मावलंकर और जाखड़ के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्तावों का जवाब सरकार की ओर प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू और राजीव गांधी ने दिया था।
इस अविश्वास प्रस्ताव ने दिखाया कि मोदी सरकार और विपक्ष के बीच दूरियां कितनी बढ़ गई हैं और सरकार की ओर से इसे दूर करने का कोई इरादा भी नजर नहीं आता। यही नहीं, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस प्रस्ताव के गिरने के एक दिन बाद ही राहुल गांधी को ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमले से उपजे पेट्रोलियम संकट पर हस्तक्षेप के दौरान पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी का नाम कुख्यात एपस्टीन फाइल से जुड़ा होने का जिक्र करने से रोक दिया।
जबकि इजराइल और अमेरिका ने ऐसे वक्त पर ईरान पर हमला किया है, जब एपस्टीन फाइल में ट्रंप सहित अनेक महत्वपूर्ण लोगों के नाम उजागर हुए हैं। यही नहीं, खुद हरदीप पुरी स्वीकार कर चुके हैं जेफ्री एप्सटीन से उनके संबंध थे और उनके बीच मेल के जरिये भी पत्राचार हुए हैं।
अच्छा होता कि लोकसभा अध्यक्ष राहुल के आरोपों पर हरदीप पुरी को भी मौका देते, आखिर संसद में बहस नहीं होगी और वहां देशहित से जुड़े मुद्दे नहीं उठाए जाएंगे तो कहां उठाए जाएंगे। इससे यह भी साफ होता कि सदन के बाहर हरदीप पुरी ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिये जो दावे किए हैं, वे कितने सच्चे हैं क्योंकि सदन में उन्हें अपनी बातों के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करने पड़ते।
विदेश नीति के मोर्चे पर चौतरफा घिरी हुई सरकार का बचाव करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने पद को और छोटा कर दिया है। उनके खिलाफ आया प्रस्ताव भले ही गिर गया है, लेकिन अविश्वास और गहरा गया है।











